छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
४. पुर्तगाली-सिद्दी दमन, कवि कलश मित्रता, संगमेश्वर घटना एवं अमर धर्मवीर बलिदान
का आदेश दिया था। आलमगीर के मन में क्या योजना चल रही थी। इसका अनुमान
किसी को नहीं लग रहा था। इतना स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था कि वे किसी कारण से
बहुत चिन्तित हैं।
दरबार में बैठा बादशाह अपने हरकारों और गुप्तचरों के पत्रों को बड़ी
बारीकी से पढ़ रहा था। शहजादा आजम की सेना बीजापुर क्षेत्र में उधम मचा रही
थी। उसने नागोठणे के किले को घेर लिया था। शेख उल इस्लाम साहब को
दक्षिण के दोनों राजाओं को बादशाह का क्रोध पसन्द नहीं था। शिया हो या सुन्नी,
दोनों अल्लाह के बच्चे हैं। आज बादशाह संतृप्त था फिर भी उसके चेहरे पर चमक
थी। शेख साहब ने यह देखते हुए साहस करके कहा, "किबलाए आलम, आखिर
तो बच्चे ही हैं। उनकी बात को मन पर इतना क्यों लेना?"
"कौन बच्चे हैं?"
जहाँपनाह, वह हैदराबाद का कुतुबशाह एक अय्याश है और बीजापुर के
सिकन्दर आदिलशाह की उम्र अभी पन्द्रह सोलह की"
बौखलाये बादशाह ने शेखसाहब से स्पष्ट शब्दों में कहा "इन दोनों को नष्ट
करने से ही मराठों की कमर हमेशा के लिए टूटेगी। मैसूर का चिक्कदेवराज इस
प्रकार की सूचना मुझे बार बार दे रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों की उम्र से हमें
कुछ लेना देना नहीं है। उनकी मूर्खता और मूर्खता की राजनीति खुदा को भी
पसन्द नहीं आएगी। हैदराबाद गोलकुंडा का वह शाह भरे दरबार में सारंगी बजाता
है, सुनने वालों से वाहवाही लूटता है। हर शुक्रवार को चारमीनार चौक पर बीस
हजार लड़कियाँ, बाजारू औरतें, नर्तकियों को इकट्ठा करके नचाने गवाने का नंगा
नाच करता है। वह प्रजा की और खुदा की सेवा कैसे करेगा?"
बादशाह को अचानक कुछ याद आया। उसने तुरन्त बरामदखान को
बुलवाया, "बरामद, इसके पहले हमने उस बदमाश आदिलशाह के सामने अपनी
कुछ माँगें रखी थीं। उसका कोई जवाब आया कि नहीं?"
बरामदखान घबरा गया। बादशाह शेख उल इस्लाम की भाव भंगिमा का
निरीक्षण करने लगा। खान से आदिलशाह का कटु जवाब पढ़ा नहीं जा रहा था।
बादशाह की भौंहें टेढ़ी हो गयीं। खान घबराकर पत्र पढ़ने लगा- "बीजापुर के क्षेत्र
में नयी चौकियाँ बनाने की इजाजत क्यों माँग रहे हो? इसके पहले बिना हमारी
इजाजत के तुमने बना ली हैं उन्हें तुरन्त नष्ट कर दो। शाहंशाह को यदि सम्भाजी पर
चढ़ाई करनी है तो खुशी-खुशी अपने या सम्भाजी के क्षेत्र से होकर जाएँ। उसके
लिए हम अपने क्षेत्र की डेढ़ बीता जमीन भी देने वाले नहीं हैं। इसके अतिरिक्त
शिवाजी और सम्भाजी का प्रदेश भी मूलरूप से आदिलशाह का ही है इसलिए
सम्भाजी :: 519
बादशाह को उस पर भी नजर नहीं डालनी चाहिए।"
इस जवाब से वहाँ के सभी लोग चकित हो गये। बादशाह के विरुद्ध किसी
ने इतनी हिम्मत दिखाई हो ऐसा बादशाह को स्मरण नहीं था। बादशाह ने
बरामदखान से पूछा, "हमारी दूसरी माँग क्या थी आदिलशाह से? वह भी
पढ़िए।"
"सर्जाखान नाम के अपने सेनापति को नौकरी से निकालकर उसे बीजापुर से
बाहर निकालिए।"
"हूँ, उस पर उस मूर्ख ने क्या जवाब दिया है?"
"...यह हमारा व्यक्तिगत मामला है। इसके अतिरिक्त सर्जाखान हमारे
सिपाहसालार हैं। यह औरंगजेब साहब को मालूम नहीं है क्या? वे आज जिस पद
पर हैं कल भी उसी पद पर रहेंगे। उल्टे हम उनकी तनख्वाह बढ़ाने का विचार कर
रहे हैं।"
"...बसऽ!" औरंगजेब के धैर्य का बाँध टूट गया। दरबार के सभी लोग चुप
थे। औरंगजेब का सन्ताप उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। तीव्र ज्वर से
ग्रस्त कोई व्यक्ति जैसे बड़बड़ाने लगता है वैसी ही मनःस्थिति औरंगजेब की थी।
वह अपने को न सँभाल पाने के कारण गरजा, "आदिलशाह हो या कुतुबशाह दोनों
ही हरामजादे हैं। यह कुतुबशाह अल्ला की सल्तनत में कभी भी ईमानदार नहीं
रहा। उस नापाक सम्भा के साथ मैसूर वालों से लड़ने के लिए दस हजार की फौज
भेजता है। अपने दरबार में मादण्णा और आकण्णा नाम के दो हिन्दू पंडितों को
प्रधान बनाया है। इस्लामी हुकूमत और हिन्दू प्रधानमन्त्री कैसी बेवकूफ राजनीति है
वह? बोलो शेख साहब?"
"'तौबाऽ तौबाऽऽ'"। बाकी लोगों ने भी बादशाह की हाँ में हाँ मिलाई।
"यह कुतुबशाह तानाशाह इतना मक्कार है कि क्या बताऊँ? कुछ वर्ष पूर्व
वह शिवाजी भोंसला इससे मिलने के लिए गया था। उस समय इसी गधे ने
शिवाजी के घोड़े को रत्नों का हार पहनाया था। घोड़े के गले में रत्नों का हार
पहनाकर उनका स्वागत किया था। साथ ही एक लाख की राशि सालाना तनख्वाह
देना भी स्वीकार किया। उन मादण्णा और आकण्णा जैसे हेलकट वैष्णव ब्राह्मणों के
हाथ में राज्य का सारा कार्यभार सौंपने वाला कुतुबशाह इस्लाम के नाम पर एक
धब्बा है।"
बादशाह के असीम सन्ताप, उसके चढ़ते हुए स्वर को देखकर वजीर
असदखान, बरामदखान और विशेष रूप से शेख उल-इस्लाम सभी चुप थे।
"काफिर सम्भाजी की रक्षा करने वाले दोनों हरामखोर अपना मन नहीं बदलते तो
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आलमगीर की तलवार में कितनी धार है ? यह इन जहन्नमियों को दिखाना ही
पड़ेगा।"
बादशाह के इस वक्तव्य से दरबार में सन्नाटा छा गया। इसी समय कोने का
पर्दा हिला। काँच की दंडियों की खनक के साथ एक कोमल और आवाज सुनाई
पड़ी। "लेकिन खाविन्द आज सारी दुनिया में एक ईरान के बादशाह को छोड़कर
आपके अतिरिक्त इस्लाम का रखवाला दूसरा है कौन ?"
"कौन ?"
सभी की दृष्टि उसी ओर घूम गयी। बादशाह की लाडली शहजादी
जीनतउन्निसा वहाँ खड़ी थी। उसके जालीदार घूँघट में उसका गोरा और तेजस्वी
चेहरा दमक रहा था।
बादशाह तुरन्त उठकर खड़ा हो गया। अपने दरबारी कामकाज में घर की
बहू बेगमों और शहजादियों की दखलन्दाजी उसे बिलकुल पसन्द न थी। लेकिन
उसकी प्रिय शहजादी के अचानक ऐसी भूल करने से वह बहुत दुखी हुआ। वह
दरबार में रुका नहीं। क्रोध से पैर पटकते हुए वह अपने निजी कक्ष में पहुँच गया।
शेख काजी जैसे धर्मात्मा को टक्कर देने वाला बादशाह अपनी शहजादी की मूर्खता
से बहुत दुखी हो गया था। उसके पीछे-पीछे जीनतउन्निसा भी घबराई हुई भागी
भागी आयी। उदयपुरी बेगम और औरंगाबादी बेगम के साथ सभी बेगमे घबरा गयी
थीं। बादशाह के चेहरे का रंग एकदम बदल गया था। रात को खाना खाते समय
बादशाह ने पूछा, "बेटी, आज दोपहर को तुम्हें क्या हो गया था ?"
"अब्बाजान, मैं तो अपने मजहब के लिए बोली थी।"
"बेटी जीनत, तुम्हें मालूम है कि नहीं, जेबुन्निसा मेरी कितनी प्रिय शहजादी
थी ? पर उस मूर्ख शहजादा अकबर के बहकावे में आकर हमेशा के लिए उस
सलीमगढ़ की अँधेरी कोठरी में कैद हो गयी। शहजादी होकर भी राजनीति के
कार्यक्षेत्र में दखलन्दाजी क्यों करती हो ?"
किसी अज्ञात भय के कारण बादशाह के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने कातर
स्वर में कहा, "बेटी जीनत, आज मैं सिर्फ इतना बताना चाहता हूँ कि मैं अपनी एक
और शहजादी हमेशा के लिए खोना नहीं चाहता।"
"रहम करो। अब्बा रहम करो।" शहजादी ने हाथ जोड़ लिये।
"मुझे लगा आपको मुहब्बत हो गयी है।"
"कैसी मुहब्बत, अब्बाजान ?"
"उस काफिर के लिए, सम्भा के लिए।" बादशाह ने अपनी नजरें शहजादी
पर गड़ा दीं।
"वह तो मुझसे पन्द्रह-बीस साल छोटा है, मेरे भाई जैसा है।"
सम्भाजी : 521
औरंगजेब ने कुछ अधिक नहीं कहा। किन्तु बादशाह के इस आक्षेप से
शहजादी बहुत पीड़ित हुई। उसने सुबक-सुबक कर रोना शुरू कर दिया। बादशाह
का हृदय द्रवित हुआ। अपनी शहजादी के सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए उसने
भावुक होकर कहा, "बेटी तुम्हारी सच्ची मुहब्बत अपने अब्बा की तरह अपने
मजहब—इस्लाम—से है। वह मुझे भी अच्छी तरह पता है। लेकिन जिन दो
इस्लामी राज्यों के लिए तुम्हें दया आती है, जिनके लिए हमारे शेख काजी भी
नाराज होते हैं, वे दोनों हुकूमतें काफिर की दोस्त और अल्लाह की दुश्मन हैं।"
जीनतउन्निसा ने कुछ अविश्वास से अपने पिता की ओर देखा। उसी समय
बादशाह ने एक पत्र निकाला। उसे शहजादी के सामने करते हुए बोला, "देख बेटी
यह कुछ दिन पहले हैदराबाद के उस मूर्ख कुतुबशाह द्वारा बीजापुर के आदिलशाह
को लिखा गया पत्र है। इसे हमारे जासूसों ने प्राप्त किया है। इसके मजमून को
पढ़ो।"
शहजादी की दृष्टि पत्र पर घूमने लगी।
'भाईजान सिकन्दर आदिलशाह,
औरंग बादशाह ने शहजादा आजम को आपके राज्य में दबाव डालने के लिए
भेजा है। किन्तु आप उसकी जरा भी चिन्ता न करें। मैं शीघ्र ही चालीस हजार की
कुतुबशाही फौज आपकी सहायता के लिए भेज रहा हूँ। सम्भाजी राजा के हंबीर
मामा, मिरज, अथणी, बारूगढ़, महिमानगढ़ से जत तक के प्रदेश में तहलका मचा
रहे हैं। बादशाह की फौज को हैरान करके आपकी मदद कर रहे हैं, यह हमें भी
मालूम है। दक्खन देश हमारी तीनों हुकूमतों को औरंगजेब को हैरान करके निश्चित
रूप से यमुना के तट पर भगाना है। देखें यह दिल्ली का बूढ़ा हमारे दक्खिनी दिमाग
के आगे कब तक टिकता है? आप जरा भी न घबराएँ। मैं और सम्भाजी राजा पूरी
शक्ति से आपके पीछे खड़े हैं।
आपका भाई
तानाशाह अबुल हसन कुतुबशाह
उस पत्र को पढ़कर शहजादी को असलियत समझ में आ गयी। समय से
अपनी आँख खोल देने के लिए उसने अपने अब्बा बादशाह का आभार माना।
शहजादी के समझ लेने पर बादशाह आनन्दित हुआ और रात को उसे बहुत देर से
नींद आयी। किन्तु वह रात बादशाह के लिए सुखकर नहीं सिद्ध हुई। सवेरे सबेरे
उसका मुख्य जासूस दरवाजे पर दस्तक देने लगा। बादशाह आँख मलते हुए उठा तो
दरवाजे पर असदखान और बरामदखान को खड़ा पाया। बादशाह ने परिस्थिति की
गम्भीरता का अनुमान कर लिया। उनको लेकर वह स्नानगृह में चला गया। घबराया
हुआ वजीर बताने लगा, "बादशाह सलामत, बहुत बुरी खबर है।"
522 :: सम्भाजी
“क्या हुआ?”
“अपना पाँच हजार घुड़सवारों का एक दल, हमारे साथ गद्दारी करके रात को
भाग गया।”
“कहाँ? सम्भा के पास?”
“खबर उतनी बुरी तो नहीं है।” वजीर ने सँभलते हुए कहा।
“वे सभी बैजापुर की ओर से दिल्ली, आगरा की ओर भाग गये।”
“क्यों? उन्हें तनख्वाह नहीं मिली?”
“दक्खन उन्हें आये आज पाँच वर्ष हो गये। उन्हें तनख्वाह मिलती है।
खाने-पीने की भी कोई कमी नहीं है। किन्तु उन पागलों को अपने बाल-बच्चों की
बहुत याद आ रही थी। जहाँपनाह अपनी जिन्दगी में उन्होंने इतनी लम्बी लड़ाई
कभी देखी ही नहीं थी।”
“यह बात ठीक नहीं, वजीर। आज पाँच हजार गये, कल दस हजार जाएँगे,
बाद में पाँच लाख जाएँगे। इस प्रकार एक-एक करके सारी शाही फौज टूट
जाएगी।”
“फिर क्या हुक्म है, मेरे मालिक?”
चाहे तो चौगुनी फौज उनके पीछे भेजो, किन्तु उनकी मुस्कें चढ़ाकर खींचते
हुए उन्हें पीछे ले जाओ।” बादशाह कहते-कहते रुक गया। बहुत गम्भीर होकर
कहने लगा-“राजमहल में सौ खम्भे हैं। उनमें यदि एकाध आड़ा-तिरछा हो गया
तो क्या बिगड़ेगा? ऐसा सोचने की मूर्खता न करो। इस प्रकार के घमंड और ऐसी
मूर्खता का जिन्दगी में कोई उपयोग नहीं है। यह विनाश की शुरुआत है। बुद्धिमान
व्यक्ति को इससे सीख लेनी चाहिए।”
पाँच
औरंगाबाद से दिल्ली की ओर भागती अपनी सेना को पकड़ने में औरंगजेब सफल
हो गया। औरंगजेब उन सभी भगोड़े सैनिकों को समाप्त कर देने का विचार बना
रहा था। किन्तु इस प्रकार के कठोर निर्णय लेने का वह समय नहीं था।
बादशाह बहुत देर तक बेचैनी के साथ बैठा रहा। अन्त में उसने वजीर से
कहा, “शरीर से थकी फौज को नयी रसद पहुँचाकर तरोताजा किया जा सकता है।
सम्भाजी :: 523
किन्तु मन से थकी हुई फौज चिन्ता का विषय बन जाती है। हमें एक बात बताओ,
अनाज, लिबास, तनख्वाह छोड़कर इन मूर्खों को और क्या चाहिए।"
"एक विजय।"
"मतलब!"
"आलमपनाह, पिछले पाँच-छः वर्षों में अपनी फौज ने एक लड़ाई जीती
नहीं है। वह नन्हा-सा रामशेज आज भी हमारे क़ब्जे में नहीं आ रहा है। अगले
कुछ महीने अथवा वर्ष में सम्भाजी पराजित होगा, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। हजरत,
सम्भा के किले सचमुच फौलाद के बने हैं।"
"फिर उसी सम्भा और उसकी फौज की तारीफ?" बादशाह ने घूरा।
"तारीफ नहीं हजरत, यह हकीकत है।" बरामदखान बीच में बोल पड़ा।
"मराठों की फौज एक अद्भुत चमत्कार है, जिल्लेसुभानी। अपनी विजय बिना
निश्चित किये वह सम्भा और हंबीरराव मैदान में आते ही नहीं। हथियार से हथियार
भिड़ाते ही नहीं।"
"तो बड़ी फौज लेकर जाओ।"
"बड़ी फौज की गन्ध पाते ही मराठे छूमन्तर हो जाते हैं। भूतों की तरह पेड़ों
और पहाड़ों में कहाँ अदृश्य हो जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। पीछा करना बन्द
किया कि तूफानी गति से हमारे ऊपर आक्रमण करते हैं। हवा और पानी की लहरों
की तरह उठते हैं।"
"किन्तु आज अपनी फौज की दिमागी हालत बिगड़ी है। उसका क्या?"
औरंगजेब ने महत्त्वपूर्ण मुद्दा उपस्थित किया।
बादशाह के प्रश्न पर सभी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। असदखान ने
स्वीकारोक्ति में कहा, "जहाँपनाह, इसमें कोई शक नहीं कि अपनी सेना का दिल
टूट गया है रामदरा घाट में इन मराठों ने खड़ी घास जला दी लेकिन हमारे घोड़ों को
घास-दाना खाने नहीं दिया। हजरत, रामशेज का किला तो भूतखाना ही है।"
दरबार उठ गया। बादशाह के माथे से चिन्ता की लकीरें मिट नहीं रही थीं।
अपना ओंठ चबाते हुए बादशाह ने कहा, "वजीरे आजम, इन सभी बातों का एक
ही मतलब है। सम्भा, गोलकुंडा के कुतुबशाह और बीजापुर के आदिलशाह की
मित्रता को पहले तोड़ना होगा। यदि मराठों के प्रदेश पर जीत सम्भव नहीं हो पाती
तो और कहीं सही। हमारी फौज को विजय की जरूरत है—जरूरत है।"
"जी, जहाँपनाह।"
"इन दोनों इस्लामी हुकूमतो मे मराठों को मिलने वाली गुप्त सहायता तुरन्त
बन्द होनी चाहिए। इसके लिए पहले इन दोनों इस्लामी हुकूमतो को नेस्तनाबूद
करना है। उसके बाद पहाड़ के उस चूहे के बच्चे को पकड़कर कुचल देने के
अलावा हमारे हाथ में बचा ही क्या है?"
524 सम्भाजी
छह
गोलकुंडा और भागानगरी का ऐश्वर्य और वैभव ऐसा था कि उसकी तुलना स्वर्ग से
की जाती थी। पास के हैदराबाद शहर की शानो शौकत भी बेजोड़ थी।
हमेशा की तरह कुतुबशाह अबुल हसन सन्ध्या समय से ही नाच गान
आनन्द में डूबा हुआ था। भरे दरबार में सारंगी बजाना उसे बहुत अच्छा लगाता था।
गुणीजन उसकी प्रशंसा करते थे। किन्तु शुष्क राजनीति में उसका मन जरा भी नहीं
लगता था।
भागानगर के क्षेत्र में असंख्य तालाब थे। उस क्षेत्र में अनेक छोटे मोटे बाँध
बाँधे गये थे। भरपूर फसलों और फलों के बगीचों के कारण गोलकुंडा की
कुतुबशाही में कमाल की समृद्धि आ गयी थी। मूसी नदी के किनारे बसे हैदराबाद
नगर में चौड़ी चौड़ी सड़कें बनी थीं। औरंगजेब को गद्दी पर बैठे तेईस-चौबीस वर्ष
हो चुके थे। इतनी लम्बी अवधि में कुतुबशाही पर कोई भी आक्रमण नहीं हुआ था।
इसलिए यहाँ की समृद्धि निरन्तर बढ़ती गयी।
आज भी महफिल में बड़ी रौनक आयी थी। ऊँची नक्षीदार ईरानी वेशभूषा
और पट्टेदार किमाँश में तानाशाह का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक लग रहा था। उसके
किमाँश के तुर्रे में जड़े माणिक्य के चाँद सितारों की चमक विलक्षण आभा से मंडित
थी। स्वर्ग की अप्सराओं की भाँति सुन्दर युवतियाँ उसके आसन के सामने नृत्य कर
रही थीं। तानाशाह का काल साहित्य, सौन्दर्य, नृत्य आदि की दृष्टि से स्वर्णकाल
लग रहा था। हैदराबाद और भागानगरी में बीस हजार से अधिक गणिकाएँ, तवायफे
और नर्तकियाँ रहती थीं। प्रत्येक शुक्रवार को राजमहल के भव्य चौक में हजार
हजार नर्तकियाँ अपनी कला प्रदर्शित करती थीं। अलिन्द में बैठकर तानाशाह इस
स्वर्ग सुख का आनन्द लूटता था। पूरे हैदराबाद का वातावरण रसीला और नशीला
था। पिछले अनेक वर्षों से तोपों और बन्दूकों की आवाज सुनाई नहीं पड़ी थी। वहाँ
तबले, हारमोनियम की आवाज और घुँघरुओं की छनक रोज सुनाई पड़ती थी।
गन्धक और तोप गोले बारूद के व्यापारी विनाश के कगार पर थे। लेकिन मोगरे की
बेड़ियाँ बेचने वालों ने अपने महल खड़े कर लिये थे।
हर रोज की तरह आज भी तानाशाह राजमहल की सन्ध्या महफिल में नशे
से बेहोश हो रहा था। उसी समय मजबूत कदकाठी के, गौर कान्तियुक्त प्रशस्त
भाल पर चन्दन का तिलक किये मादण्णा ने वहाँ प्रवेश किया। जरीदार वस्त्रों में
सुशोभित मादण्णा हैदराबाद के प्रधानमन्त्री थे। जाति से एक दक्खिनी वैष्णव ब्राह्मण
सम्भाजी 521
होने पर भी वे इस्लामी राज्य के प्रधानमन्त्री बने थे। राज्य में उनका पद यद्यपि दूसरे
क्रम पर था फिर भी व्यवहार में वे कुतुबशाह के सारे अधिकार का उपयोग करते थे।
इसलिए मुसलमान प्रजा उनसे बहुत नाराज रहती थी। अपनी बौद्धिक कुशलता के
कारण ही मादण्णा इतनी ऊँचाई तक पहुँचे थे हिन्दी, तेलगू और पर्शियन भाषाओं
पर उन्हें पूर्ण अधिकार था।
सोने की पालकी में मादण्णा हैदराबाद में घूमते थे। उनकी पालकी को दूर से
ही देखकर, शहर के बड़े व्यापारी, विद्वान हिन्दु और मुसलमान सभी उनके आगे
आदर से झुक जाते थे। तानाशाह ने अपने एक सामान्य किन्तु बहुत होशियार
गेशकार को प्रधानमन्त्री बनाया था। अपने प्रभाव का फायदा उठाकर मादण्णा ने
इस्लामी सल्तनत की आय से अनेक हिन्दू देव देवियों के मन्दिर बनवाये थे।
गोलकुंडा कुतुबशाह से मिलने आये। शिवाजी महराज के साथ अनेक फिरंगी
वकीलों की भी पूरी खातिर की गयी थी। विगत तेरह चौदह वर्षों में भूलकर भी
रंगमहल में पैर न रखने वाले मादण्णा को वहाँ आया देखकर सारी नृत्य सभा स्तब्ध
रह गयी। सारंगियाँ बन्द हो गयीं। सभी नृत्यांगनाओं के छनकते घुँघरू भी मौन हो
गये।
तानाशाह भी कुछ आश्चर्यचकित होकर अपने प्रधान की ओर देखने लगा।
हुक्के की नली मुँह से बाहर निकालते हुए नशे की स्थिति में ही प्रश्न किया—
“क्यों मादण्णा आपको किसलिए प्रधानमन्त्री बनाया है? हमारी नृत्य-संगीत और
इश्कबाजी की गतिविधियों में किसी भी प्रकार की अडचन न आए, इसीलिए न?”
“खाविन्द, यदि इस बन्दे से कोई भूल हुई तो दया करें। परन्तु बिना कोई
बहुत जरूरी काम पड़े मैं आपको कष्ट देने का साहस कैसे करता?”
“बोलो।”
“हजरत, दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की ओर से एक जरूरी फरमान
आया है।”
“क्या कहता है वह बुड्ढा?” तानाशाह हड़बड़ी में बोला, “जल्दी
बताइए। ये नटखट शर्मीली लड़कियाँ अपने तोड़े को तोड़कर किस प्रकार रुक गयी
हैं। उधर तबले की लय के साथ मेरे हृदय की लय भी बीच में ही किस प्रकार
बिगड़ गयी है खुद ही देखिए। यह जरूर है कि यहाँ के गायन, वादन और यहाँ की
गमिकता वह औरंगजेब क्या समझेगा?”
“हुजूर! हुजूर! उनका कहना है कि—बीजापुर के आदिलशाह की मदद
करने का गुनाह आपने यदि किया, तो...”
“तो? ऐसे घबराते क्यों हैं? बताइए।”
“अगर बीजापुर वालों की थोड़ी-सी भी मदद करोगे तो आपका तख्त और
526 सम्भाजी
ताज गन्दी नाली में फेंक दिया जाएगा।"
यह खबर सुनाते हुए मादण्णा बहुत घबरा गये थे। किन्तु तानाशाह ने मजाक
में लेते हुए अपनी आँखें उठाईं। मादण्णा पर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बादशाह के
फरमान का उन पर कोई प्रभाव नहीं है। अपनी अय्याशी में विघ्न पड़ने से तानाशाह
बेचैन हो गया था। एक गुलाम ने तानाशाह को एक पान का बीड़ा दिया। सुदूर
मछली पट्टम की एक विशिष्ट पनवाड़ी से हरे पीले रंग के पान तानाशाह के लिए
लाये जाते थे। उस कोमल पान बीड़े को चबाते हुए सोने के पीकदान में पीक थूकी।
उसने एक सोलह सत्रह साल की रूपवती लड़की को अपने पास बुलाया। उसके
प्रत्येक अंग से यौवन झलक रहा था। तानाशाह उसके सिर को अपनी जाँघ पर
रखकर उसकी रेशमी अलकों में उँगलियाँ फेरने लगा। उसने पुनः पूछा- "क्या
कहता है वह तुम्हारा औरंगजेब ?"
मादण्णा ने डरते-डरते उसी पैगाम को फिर से दुहराया। तब तानाशाह ने
पूछा- "मादण्णा, हैदराबाद और गोलकुंडा में अपनी कितनी फौज तैनात है?"
"लगभग एक लाख।"
"ओह ! तो ऐसा करो, आज ही बीस हजार घुड़सवार सेना बीजापुर की मदद
के लिए भेज दो। वह बेचारा सिकन्दरशाह, अभी उसकी पन्द्रह वर्ष की नाजुक उम्र,
अपने इस पड़ोसी की हर कीमत पर मदद करना हमारा फर्ज है।"
इसी समय वहाँ कुतुबशाह की बेगम सरोभाजानी आ गयीं। बेगम के खुद
वहाँ अचानक आ जाने से तानाशाह के अगल बगल बैठी एवं हाथ-पैर दबाती
नर्तकियाँ तितलियों की तरह उड़कर निकल गयीं। बेगम को वहाँ देखकर तानाशाह
गुर्राया, "क्या चाहती हो बेगम ?"
"फर्याद।" अपने नीले घूँघट से सामने देखते हुए बेगम ने कहा, "माफ
कीजिए हजरत, इस सल्तनत के इतने बुरे दिन आ गये हैं कि अपने राज्य और
परिवार की ओर ध्यान देने के लिए कुतुबशाह को एक क्षण की भी फुर्सत नहीं है।
इसीलिए अपने पति को मिलने के लिए बेगम को भी बेशर्म होकर इस रंडीखाने में
आना पड़ता है।"
"सिर्फ काम की बात करो, सुनाओ अपनी फर्याद।"
सरोभाजानी बेगम रुकी ! वहाँ पर खड़े मादण्णा पंडित की ओर जलती हुई
दृष्टि डालकर बोली, "यह फर्याद सुनाते ही यहाँ की वेश्याएँ चली गयीं किन्तु यह
मांदण्णा पंडित यहीं बना है।"
"यह कैसे मुमकिन है बेगम ? मादण्णा कैसे जा सकता है? मादण्णा हमारी
छाया है, हमारी जान है।"
"वही आपकी जान ले रहा है।" बेगम ने व्याकुल होकर कहा, "आपने
सम्भाजी :: 527
अपना सारा कारोबार अन्धे की तरह इस मादण्णा पंडित को सौंप दिया है। वही
आपका गला घोंट रहा है। अपने भाई आकण्णा को इसने प्रधान सेनापति बनाया है।
इसका भतीजा राजकर्मचारियों का प्रधान है। राज्य के सभी बड़े ओहदे इसने अपने
लोगों में बाँट रखे हैं। इसीलिए हैदराबाद की सारी इस्लामी प्रजा विरोध कर रही
है। इस सारी विपत्ति के मूल कारण आप हैं। स्वामी इसका ध्यान आपको है कि
नहीं?''
तानाशाह ने अपनी वक्रदृष्टि मादण्णा की ओर घुमाई। मादण्णा से पूछा,
"दीवान मादण्णा, दरबार के सारे उमराव और राज्य के सभी उलेमा आपकी यही
शिकायत करते रहे हैं। मैं जब से इस राजगद्दी पर आया हूँ, पिछले तेरह-चौदह
वर्षों में कभी एक भी सवाल आपसे नहीं किया। आज सिर्फ एक सवाल—
"जैसी आपकी आज्ञा महाराज।" थरथर काँपते मादण्णा बोला।
"हमारी बेगम साहिबा ने भरे दरबार में आप पर जो इल्जाम लगाए हैं, उनमें
कौन-सा इल्जाम गलत है?"
तानाशाह के इस धारदार सवाल से मादण्णा की जबान रुक गयी। वह घुटने
के बल बैठते हुए बोला, "हुज़ूर इसमें कुछ भी गलत नहीं है। परन्तु हुज़ूर यही एक
प्रश्न पिछले पन्द्रह वर्षों में एक बार पूछकर मेरे कान ऐंठे होते तो हमें अकल आ
गयी होती। मैं पहले गरीब ब्राह्मण। उसके हाथ में आ गयी इतनी बड़ी सत्ता—फिर
क्या था? रिश्तेदारों के पंख उग आए। यहीं सारी गड़बड़ी हुई।"
तानाशाह बहुत मर्माहत हुआ। पास में रखी सुराही से उसने मदिरा के कई
घूँट एक साथ पिये। उसने विषादपूर्ण स्वर में कहा, "यार मादण्णा, तुम्हारा भी क्या
दोष? सत्ता एक बहता दरिया है। पानी की इस खलखलाहट को सत्ताधीश को ही
रोकना होता है। तुम्हारे इस मालिक ने यदि बीच बीच में इस रंडीखाने से अलग
होकर अपने दरबार में बैठने का गुनाह किया होता तो हमारी मूर्ख जिन्दगी को यह
दिन क्यों देखने पड़ते?"
सात
बादशाह की विशाल छावनी रात के अँधेरे में सोई पड़ी थी। केवल पहरे पर खड़े
सिपाही जाग रहे थे। कुतुबशाह और आदिलशाह का नशा उतारने के लिए बादशाह
ने सोलापुर के पास, भीमा नदी के किनारे में डेरा डाल रखा था। उसने मुअज्जम को
528 :: सम्भाजी
कुतुबशाही को और आजम को आदिलशाही को विनष्ट करने की जिम्मेदारी सौंपी
थी। सम्भव हो तो युद्धभूमि के समीप रहकर दोनों फौजों को लड़ाते रहने का
उसका विचार था। बीजापुर पर घेरा डाले शहजादे आजम को एक वर्ष बीत चुका
था। किन्तु निकट भविष्य में जीतने के कोई भी संकेत दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इससे
औरंगजेब बहुत नाराज हो रहा था। उसी समय उसका खान ई जहान नामक
सरदार मंगलबेडा और सांगोला जैसी आदिलशाह की चौकियों को जीतकर उस पर
दबाव बढ़ा रहा था। इससे औरंगजेब को कुछ सन्तोष हुआ।
पहरे के सिपाही इधर उधर गश्त लगा रहे थे। लालबाग में थोड़ा दूर पर
असदखान का डेरा था। अपने चाचा वजीर असदखान पर बादशाह का बहुत क्रोध
आ रहा था। वजीर के साथ में उसकी एक सौ आठ बेगमें भी फौज के साथ थीं।
अपने अय्याश स्वभाव के कारण असदखान राजकीय कार्यों में ध्यान नहीं दे पाता
था। शाहंशाह की यही शिकायत थी।
वजीर के तम्बू के पास अचानक दस बारह घोड़ों का एक दल आया। कुछ
बहुत आवश्यक सूचना लेकर ये दूत आये थे। वजीर जल्दी जल्दी तैयार हुआ और
दूतों को लेकर लालबारी के बीच वाले चौक में आया। बादशाह की शय्यागृह वाले
विशाल तम्बू में पूरी निस्तब्धता देखकर वे सभी वापस लौटे। किन्तु इसी समय
बादशाह दरवाजे पर आ गया। उसके नौकर ने असदखान को पुकारा। डेरे के बाहर
घोड़ों के दबे पाँव चलने पर भी उनकी आवाज से बादशाह जाग गया इसका सभी
को आश्चर्य हुआ।
घबराये दूत बादशाह के निजी बैठक में आये। उन्हें बोलने की हिम्मत नहीं
हो रही थी। अन्त में असदखान ने बताना आरम्भ किया—‘‘जहाँपनाह रहम करें।
अपने दिन ही इतने बुरे आ गये हैं। किया भी क्या जाय? कल रात सांगोला की
अपनी छावनी पर मरगट्ठों ने डाका डाला। वे जत की ओर दौड़ते हुए आये थे।
आपका खजाना लूट लिया, शाही तबले से पाँच सौ घोड़े भगा ले गये। जहाँपनाह
अँधेरे और हो हल्ले का फायदा उठाकर उन लोगों ने बहुत ऊधम मचाया।‘’
‘‘मराठों के इस आक्रमण मुखिया कौन था?’’
‘‘हंबीरराव मोहिते।‘’
इस नाम को सुनते ही बादशाह ने आसमान की ओर देखते हुए सिर ऊपर
उठाया। बादशाह ने वाकेनवीस और अन्य लोगों को बाहर जाने के लिए कहा। अब
अपने ऊपर कौन सी आफत आएगी, यह सोचते हुए असदखान सिकुड़कर बैठ
गया। आश्चर्यचकित बादशाह पीडा भरे स्वर में बोला, ‘‘आजकल मैं एक बात के
लिए खुदा की आयतें पढ़ता हूँ कि कुछ ऐसे दिन आएँ जब सम्भा और हंबीर का
नाम कान पर न आये और परोसा हुआ भोजन मीठा लगे।‘’
सम्भाजी . 529
"हुजूर!"'
"आखिर कौन है यह हंबीर?"'
"सम्भा का मामा—"
"वह बात नहीं। मेरा सवाल अलग है। हमारी पाँच लाख की फौज में ऐसा
कोई एकाध खंबीर-हंबीर क्यों नहीं पैदा होता? कैसी है हमारी फौज—नामर्दों और
हिजड़ों की बारात।"
असदखान इस प्रकार सिर झुकाए बैठा था जैसे उसके गले की हड्डी ही टूट
गयी हो। वह सिर उठाने के लिए तैयार नहीं था। तब बादशाह अपनी कठोर
आवाज में बोला, "वजीरे-आजम अब आप को तीन ही बातें करनी हैं। पहली बात
यह कि उस हंबीर पर करोड़ों की दौलत उड़ा दो। नहीं तो ऐसा करो—उसे
नियन्त्रित करो। उससे कहो कि तुम्हारे जैसा बहादुर बलिष्ठ मर्द मुझे मिले तो तुम्हें
ही हम रायगढ़ का राजा बना दें। उस काफिर सम्भा को हमेशा के लिए कारागार में
डाल दें।"
"क्या बात है आका? ऐसा कुछ तो हमने सोचा भी नहीं था।" उस कल्पना
मात्र से असदखान आनन्द से भरकर खड़ा रहा गया।
"वह हंबीर हमारे पास आता है तो उसके रास्ते में फूल बिछा दो, नहीं आता
तो धारदार खंजर तैयार रखो—किन्तु वह जिन्दा या मुर्दा हमें नहीं मिला तो इस
दक्खन की मिट्टी से कोई ऐसे शेर ढूंढ़ो जो इस हंबीर नाम के सिर दर्द से हमेशा
के लिए हमें मुक्त कर दें।"
बादशाह ने असदखान के साथ बहुत देर तक विचार विमर्श किया। उस
बैठक में ही हंबीरराव के लिए एक लुभावना पत्र तैयार किया गया। बादशाह ने
कहा, "बारूगढ़ जाकर हमारे नागोजी माने से मिलो। वही नेक इनमान हमारी मदद
करेगा। यदि सीधे यह पैगाम ले जाने की भूल करोगे तो हंबीर ले जाने वाले को
कच्चा चबा जाएगा।" औरंगजेब ने मुस्कराते हुए कहा, "अब हमें अपनी फौज के
आदमियों पर विश्वास नहीं रहा। अब तो दक्षिण के गद्दारों को लेकर ही काम
चलाना पड़ेगा। उस सर्जाखान को भी किसी न किसी प्रकार मिलाने की कोशिश
करो वजीर ए आजम।"
"लेकिन जहाँपनाह, इससे पहले आपने ही उसे बीजापुर से बाहर निकालने
के लिए दबाव डाला था।"
"इसका कारण यह है कि सर्जाखान ही उसकी सच्ची लड़ाकू शक्ति है।
एक कारगर हथियार है। ऐसा हथियार यदि आदिलशाह की बजाय हमारे शाही
अस्त्रागार में आ जाय तो उसकी जरूरत हमें क्यों न होगी?"
530 :: सम्भाजी
आठ
अहमदनगर किले का चाँदनी बाग केवल महिलाओं के उपयोग के लिए था।
बादशाह की शहजादियाँ, छोटे बच्चे, नाती-पोते एवं छोटी बच्चियाँ इसमें खूब
आनन्द लूटते थे। विशेष रूप से बादशाही बेगम जीनतउन्निसा इस बाग में मनचाहा
आनन्द उठाती थी। जीनतउन्निसा और कमलजा में बड़ा प्रेम था। कमलजा बादशाह
के कट्टर दुश्मन सम्भाजी की कन्या होने पर भी शहजादी की प्रिय सहेली थी। यह
बात किले के सभी लोगों को और फौज को भी मालूम थी।
जीनतउन्निसा ने उत्तर में ही अच्छी घुड़सवारी सीख ली थी। घोड़ा देखते ही
कमलजा की बाँहें भी फड़कने लगती थीं। राजबन्दियों के बच्चो को घुड़सवारी
सिखाना, बादशाही फौज के अनुसार अपराध था। किन्तु कमलजा के साथ जीनत के
प्रगाढ़ प्रेम के कारण नियम का उल्लंघन किया जा रहा था। जीनत अपने साथ
कमलजा को घोड़ा दौड़ाने देती थी। कमलजा भी केवल उसी के साथ लड़कियों
वाले खेल खेलती थी।
एक दोपहर को लड़कियाँ चाँदनी बाग में खेल रही थीं। कमलजा जोर से
घोड़ा दौड़ा रही थी। बाकी सहेलियाँ चिल्ला-चिल्लाकर उमे प्रोत्साहित कर रही
थीं। उसका घोड़ा अर्धचन्द्राकार घूम रहा था। चौथाई कोस की दूरी तय करके वापस
आता था। उस ओर के बुलन्द दरवाजे पर 500 की सेना तैनात थी। वे भी आज
शिथिल हो गये थे। स्वयं शहजादी और उसकी सहेलियों का खेल चालू रहने से वे
भी निश्चिन्त थे। फूलों के पौधों की ओट से उन्हें लड़कियों की तालियाँ सीटियाँ
सुनाई दे रही थीं।
इसी बीच कमलजा के घोड़े ने बाग के बाहर छलाँग लगाई। पलक झपकते
झपकते घोड़ा तेजी से पहरेदारों की आँख से ओझल हो गया। उसके पीछे 'भागोऽ
भागोऽ, पकड़ोऽ पकड़ोऽ' की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। घुड़सवार सैनिक
सावधान हुए। सैनिकों की टोली दरवाजे से बाहर निकली। जनानखाने का मुख्य
रक्षक जैनुद्दीन बहुत साहसी और हट्टा कट्टा योद्धा था। उसने घोड़े की लगाम
ढीली छोड़कर उसे खूब तेज दौड़ाया।
कमलजा का घोड़ा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। जैनुद्दीन हैरान हो गया।
कमलजा की आँखों के आगे रायगढ़ का शिखर और अपने पिता शम्भूमहाराज के
महल का कलश दिखाई पड़ रहा था। इन्हीं दोनों चीजों को देखने के लिए कितनी
रातें जागती रही थी। इसी के लिए वह बेचैन थी। जैनुद्दीन समझ गया कि
सम्भाजी :: 531
कमलजा का घोड़ा रुकने वाला नहीं है। उसने कमर के पट्टे से अपनी कटार
निकाली और कमलजा के घोड़े को मारा। कटार चक्र की तरह घूमती हुई घोड़े के
अगले पैर में जा लगी। घोड़े के पैर में कटार के चुभते ही वह जोर से हिनहिनाकर
मुँह के बल गिरा और कमलजा भी बगल में दूर जा गिरी। उसके पैर में मोच आ
गयी। वह उठे उससे पहले ही अनेक सैनिकों ने उसे घेर लिया। कमलजा कैद हो
गयी।
ज़ीनतउन्निसा बहुत होशियार और बुद्धिमती थी। उसने जैनुद्दीन को तुरन्त
बुलवाया और कहा, "यह घटना किसी को मत बताना।" उसने अपने दरबारियों
और जासूसों में किसी को धमकाया किसी को बख्शीस दी। घटित प्रसंग को दोहराते
हुए शहजादी ने जैनुद्दीन से कहा, "जो घटित हुआ यह भी हमारी खेल कूद का
ही एक हिस्सा है। ऐसा ही समझना। नहीं तो यदि यह समाचार हमारे अब्बा के
कान तक गया तो कमलजा भी हमारी दीदी जेबुन्निसा की तरह अँधेरी कोठरी के
बाहर कभी दिखेगी नहीं।"
उस रात को महल के पास गिरकर जख्मी हुई मानकर हकीम द्वारा कमलजा
का इलाज शुरू हुआ। उसकी खाट के पास ज़ीनत बैठी थी। वह वहाँ आधी रात तक
जागती रही। एकान्त देखकर शहजादी ने कहा, "कमलजा, तुममें और मुझमें एक
विलक्षण समानता है। तुम और मैं ही अपने पिता से अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रेम
करते हैं।"
अपने पैर के दर्द को दबाते हुए कमलजा ने प्रश्न किया— "शहजादी दीदी
पिता और पुत्री के बीच के प्रेम को ठीक-ठीक समझने का आपका दावा गलत है।
यदि सचमुच ऐसा होता तो आज दोपहर को मेरा घोड़ा क्यों रोका जाता ? एक
अभागी लड़की जन्म से अपने कभी न देखे पिता से मिलने जा रही थी। इस बात में
तो आपको आनन्द का अनुभव करना चाहिए था। क्या मैं आपके खजाने में डाका
डालकर जा रही थी।"
"कमलजा तू कोई ऐरी गैरी लड़की नहीं है। तुम्हारे शरीर में तुम्हारे दादा
जान शिवाजी महाराज और पिता सम्भाजी महाराज का रक्त भरा है।"
"लेकिन मैं तो खाली हाथ निकली थी। मेरे अकेले के चले जाने से शाही
फौज को क्या फरक पड़ने वाला था ?"
"बहुत खूब।"
"अं?"
"हाँ, पिछले सात आठ साल से तुम्हारा बचपन अहमदनगर और बहादुरगढ़
किले में बीता है। इन दोनों किलों के कोने कोने का नक्शा तुम्हारी आँखों में उतर
आया है। कलेजे पर अंकित हो गया है। रायगढ़ जाकर अपने पिता की आँखों के
532 सम्भाजी
सामने नक्शा फैला दिया होता तो? तो हमारे अब्बाजान औरंगजेब साहब की मौत
पाँच दस वर्ष पहले आ जातीऽ। इसीलिए तो ''
नौ
"येसू, हमारे मराठी प्रदेश को किसी की नजर लग गयी है। आज औरंगजब का
दबाव थोड़ा दक्षिण की ओर सरका है, थोड़ी साँस लेने का अवकाश मिला तो
अकाल दम तोड़ रहा है।"
"सच है स्वामी, पिछले दो तीन वर्षों में अकाल की जो करालता रही है
ऐसा तो कभी किसी ने नहीं देखा। ऐसा बूढ़े लोग भी कहते हैं।" इस प्रकार
येसूबाई ने अपनी सहमति प्रकट की।
"येसू, अकाल ने फसलें नष्ट कर दीं, जमीन बंजर हो गयी, इसका तो कुछ
नहीं, यह मुझे स्वीकार है किन्तु किसानों की गोशालाएँ और तबेले नष्ट हो रहे
यह बड़े दुःख की बात है।"
"स्वामी, कल यदि हमारे पास अश्वधन नहीं रहेगा तो यदि कहीं लड़ाई या
चढ़ाई करनी होगी तो किसके बल पर करेंगे?"
पिछले कई वर्षों से पड़ने वाले अकाल ने 1686 87 में उग्र रूप धारण कर
लिया था। हिन्दवी स्वराज्य की कमर टूटने का समय आ गया था। किन्तु इस दैवी
आपदा का सामना करने में येसूबाई और शम्भूमहाराज सफल हुए। अकाल से
पीड़ित प्रजा के लिए उन्होंने रायगढ़ पर एक विशेष कचहरी खोली थी। नीलोपन्त
पेशवा की ओर से किलेदारों और अमलदारों को आदेश भेजे गये थे। यह सन्देश
था—
'नयी बुआई और सिंचाई के लिए प्रजा की सहायता करो। इसके लिए
सरकारी खजाने से आर्थिक सहायता दी जाए।'
जनवरी 1686 में सतारा के पूर्वी हिस्से में—माणदेश, खटाव औंध, कोरेगाँव
आदि क्षेत्रों में भयंकर अकाल पड़ा था। पुणे के आसपास चिंचवड़, खेड़, चाकण
आदि में भयंकर सूखा पड़ा था। कई महीनों तक अकाल की मार झेलते झेलते कई
गाँवों के लोग गाँव छोड़कर अन्यत्र चले गये थे। प्रजा की अवस्था अत्यन्त दयनीय
हो गयी थी। शत्रुओं से निरन्तर लड़ते रहने के कारण सरकारी खजाना भी खाली हो
सम्भाजी 533
गया था। तब भी शम्भूमहाराज ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने राजापुर और गोवा के
पुर्तगालियों से अनाज की माँग की थी। किन्तु पिछले अनेक वर्षों में मराठों और
औरंगजेब की बीच दक्षिण के पठारों और सह्याद्रि की पहाड़ियों में युद्ध चल रहा
था। सूखे के कारण नदियाँ सूख गयी थीं, कुओं में कहीं भी पानी नहीं था, गाँवों के
तालाबों में पानी की जगह सिर्फ मिट्टी बची थी। मनुष्यों को ही पीने का पानी
उपलब्ध नहीं था तो पशुओं के लिए कहाँ से आता।
रायगढ़ पर चारों ओर से खबरें आती थीं। सामान्य जनता का दुख सुनकर
शम्भूमहाराज का कलेजा हिल जाता था। महाराज ने सबसे पहले प्रजा से होने वाली
कर वसूली रोक दी। ऐसे भयानक अकाल के समय प्रजा से कर वसूलना गरीब प्रजा
की लाज ढकने वाली लँगोटी उतारने जैसा था। प्रजा के लिए राजा ने अनेक
सुविधाएँ भी प्रदान कर रखी थीं।
शम्भूमहाराज ने रायगढ़ पर अपने अष्ट प्रधानों और सेना के अधिकारियों की
एक विशेष बैठक बुलाई। पेट का विकट प्रश्न था। शम्भूमहाराज ने सबसे पहले
प्रश्न किया, “सभी मनुष्य और पशु समाप्त हो जाएँगे तो राज्य किसके लिए
करना ?” उन्होंने म्हालोजी घोड़पड़े से पूछा।
“बताइये घोड़पड़े काका, इस भयंकर अकाल का इलाज क्या है?”
वृद्ध म्हालोजी ने आकाश की ओर देखा। वरुण देवता को प्रणाम किया। फिर
कहा, “यह सच है कि वर्षा हमसे रूठ गयी है। परन्तु हमारे लोग भी निष्ठापूर्वक
हमारी मदद कहाँ कर रहे हैं?”
“मतलब ?” महाराज ने प्रश्न किया।
दक्षिण से हरजीराजा की ओर से आने वाली रसद बीच-बीच में निरन्तर
खंडित होती रही है। जिस उद्देश्य से महाड़िक को दक्षिण की सूबेदारी दी गयी थी
उसकी पूर्ति वे नहीं कर रहे हैं।”
“चिक्कदेवराजा की ओर से निश्चित की गयी वसूली आयी नहीं। उन्होंने
सालाना द्रव्य भेजना उन्होंने स्वीकार किया था।” रामचन्द्रपन्त ने स्मरण दिलाया।
“रसद की बात तो अलग रही, चिक्कदेवराजा हमारे शत्रु से मिला हुआ है।
बीजापुर को घेरने के लिए आलमगीर की मदद के लिए उसने सेना भेजी है।
चौदह-पन्द्रह हजार अच्छे घुड़सवार औरंगजेब की विजय के लिए बीजापुर वालों
का रक्त बहा रहे हैं। बीजापुर के सिकन्दर आदिलशाह के इस पत्र को पढ़िए न
महाराज!” खंडो बल्लाल ने ध्यान आकर्षित करते हुए कहा।
सम्भाजी महाराज ने वह लिफाफा तुरन्त नहीं खोला। उन्होंने बड़ी बेचैनी से
कहा, “दक्षिण के चिक्कदेवराजा को मुगलों की इतनी चिन्ता क्यों है? इतनी
सहायता यदि किसी दक्षिण वाले ने दक्षिण वाले की होती तो? तो इतिहास चक्र
५०४ सम्भाजी
बदल गया होता।"
खंडो बल्लाल और येसूबाई ने दक्षिण की आय का अंदाजपत्रक महाराज के,
सामने प्रस्तुत किया। सत्रह वर्ष का सन्ताजी घोडपड़े व्यग्रता से लड़खड़ाते हुए बोल
पड़ा, "महाराज दक्षिण की खबरों को ठीक नहीं कहा जा सकता।"
"क्यों? क्या हुआ?"
"पिछले महीने जिंजी के किले पर आठ दिन तक रोशनी सजाई गयी थी।"
"किसलिए?"
"हम स्वतन्त्र हो गये हैं। महाराज की पदवी धारण करने क लिए दरबार
बुलाया था। हमारे हरजी राजा ने।"
"हमारे कानों तक भी वे बातें आयी हैं।" कहते-कहते शम्भूमहाराज रुक
गये। फिर वे उदास होकर बोले, "जीजाजी झूठ बोल रहे हैं। यह मुझे भी पता है।
जिंजी में ऐसा कुछ नहीं है।"
बहुत समय तक विचार विमर्श हुआ। महाराज ने सभी के विचारों को
समझा।
"आज औरंगजेब ने बीजापुर को घेर लिया है। कल वह गोलकुंडा की ओर
मुड़ जाएगा। और फिर पहला, दूसरा और तीसरा हम मराठों को समाप्त किये बिना
वह चुप नहीं बैठ सकता।"
सभी ने आश्चर्यचकित भाव से महाराज की ओर देखा। महाराज ने जोर देकर
कहा, "बादशाह के विरुद्ध दक्षिण के राज्यो का एक संघ बनाने का हमने पहले ही
बीड़ा उठाया है। मैसूर और तमिल प्रदेश में शान्ति बनाए रखने के लिए हमे एक बार
पुनः दक्षिण पर आक्रमण करना ही होगा। इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय ही नहीं
है।"
"शम्भूमहाराज युद्धों से घिरे होने पर यह तरीका ज्यादा खतरनाक हो सकता
है।" म्हालोजी बाबा ने कहा।
"चुपचाप बैठे रहने पर भी औरंगजेब से आने वाला संकट टलेगा नहीं। दो
चार महीने में ही कृष्णा में नयी बाढ़ आएगी। तब तक बादशाह निश्चित रूप मे
बीजापुर में उलझा रहेगा। इसी बीच दक्षिण में कूद जाना चाहिए।" शम्भूमहाराज
ने कहा।
अपनी चौदह हजार की घुड़सवार सेना लेकर शम्भूमहाराज दक्षिण की ओर
निकल गये। शम्भूमहाराज के दक्षिण आगमन से चिक्कदेवराजा को पसीना छूटने
लगा। उसने अपनी सबसे अच्छी फौज औरंगजेब की सहायता के लिए भेजी थी।
इससे उसकी चिन्ता और भी बढ़ गयी। उसे बच-बचकर लड़ाई करनी पड़ रही
थी। महाराज ने चिक्कदेवराजा द्वारा जीता गया बीजापुर का क्षेत्र अपने कब्जे में कर
सम्भाजी 535
लिया।
मैसूर, धर्मपुरी, श्रीरंगपट्टनम के क्षेत्र से शम्भूमहाराज के घोड़े दौड़ रहे थे।
उन्होंने अपने हरजी जीजा पर भी दबाव बढ़ाया। उन्होंने हरजी को जिंजी से फौज
के साथ श्रीरंगपट्टनम आने का आदेश भेजा। कोडक, म्लेय, तिगुड और मोरस के
नायक शम्भूमहाराज की सहायता के लिए आ गये थे। श्रीरंगपट्टनम की चौकी
जीतने के लिए जोरदार लड़ाई चल रही थी। वहाँ के किले के संरक्षण के लिए
बड़ी बड़ी खाइयाँ खोदी गयी थीं। उस खाई पर छलाँग लगाने के लिए सैनिक और
घोड़े दोनों हिचक रहे थे। लड़ाई हाथ से जाने की स्थिति आ गयी। उसी समय
शम्भूमहाराज ने अपना घोड़ा खाई के उस पार कुदा दिया। खाई तो पार हो गयी
किन्तु घोड़ा नोक के बल गिर गया। उसने उसी जगह पर रक्त के फौवारे छोड़ते हुए
और पैर पटकते हुए प्राण त्याग दिये। शम्भूमहाराज के दाहिने कन्धे की हड्डी भी
मुचक गयी। उसमें पीड़ा होने लगी। यह पीड़ा धीरे धीरे असह्य होने लगी।
दक्षिण में पाँच-छः महीने बीत गये। निर्णायक जीत न तो चिक्कदेवराजा की
हो रही थी और न ही शम्भूमहाराज की। गोलकुंडा जीतने के बाद बादशाह की
सह्याद्रि क्षेत्र में प्रवेश करने की सम्भावना थी। इसलिए लड़ाई को बीच में ही
छोड़कर शम्भूमहाराज ने महाराष्ट्र वापस चले आने का निर्णय लिया।
वहाँ से आते समय महाराज ने अपनी दीदी अम्बिकाबाई और जीजा हरजी
को समझाते हुए दुखी स्वर में कहा, "जीजाजी, हमें मिली विश्वस्त खबर के
अनुसार प्रमुख सत्ता से अलग होकर अपने को स्वतन्त्र राजा बनाने का आपका
विचार है। इस प्रकार आप मुख्य सत्ता का विरोध कर रहे हैं।"
"ऐसा हो भी तो इससे क्या बिगड़ता है? एक और मराठा राज्य निर्मित
होगा।" अपनी आँखों के भाव को छुपाते हुए हरजी ने कहा।
"वैसे बिगड़ता तो कुछ नहीं। किन्तु जीजाजी, इस बात का ध्यान दीजिए कि
यदि मन्दिर का हर एक खम्भा अपने सिर के भार को छोड़कर, स्वयं को कलश
समझने लगे तो राजमन्दिर खड़ा किस प्रकार रह सकेगा।" बोलते बोलते
शम्भूमहाराज बहुत गम्भीर हो गये।
कर्नाटक से वापस आते समय शम्भूमहाराज, दस हजार बैलों की पीठ पर
लादकर रसद और बहुत सा द्रव्य ले आये थे। कुछ समय के लिए रायगढ़ और
काल नदी के क्षेत्र में लोगों को कुछ राहत मिली। किन्तु अकाल की भीषणता इतनी
अधिक थी कि थोड़े ही दिनों में वह रसद भी समाप्त हो गयी। दो वर्ष बीत जाने पर
भी स्वराज्य के ऊपर से अकाल की काली छाया उठ नहीं रही थी।
जगह जगह पर जमीन में दरारें फट गयी थीं, वृक्ष पत्रहीन हो गये थे
५३० सम्भाजी
तालाब सूख गये थे। स्वराज्य के अनेक भागों की दशा अत्यंत शोचनीय हो गयी
थी। अकाल के कारण चिंचवड़ हवेली क्षेत्र के लोगों ने अपने गाँवों को छोड़ दिया
था। वे पानी की खोज में अन्यत्र चले गये थे। घरों में ताले लगाकर दरवाजों पर
बबूल और करौंदे के झाँखर रूँध दिये थे। बारह बलूतेदारों और अठारह प्रजावर्ग के
निम्नलोगों की स्थिति तो कुत्तों से भी बदतर थी। कुछ लोग जंगलों में चूहे
पकड़कर उन्हें भूनकर खाते थे। कहीं कोई चूहे की बिल में पड़े अनाज को
निकालकर खाता था।
अपने राज्य में महाराज जब घोड़े पर निकलते थे तो प्रजा की दुर्दशा देखकर
उनका मन कराह उठता था। ग्रामपंचायत में सरकार की ओर से थोड़ा बहुत अनाज
मिल जाता था। किन्तु राज्य का भंडार भी समाप्त हो रहा था। शम्भूमहाराज गाँव के
देशमुख देशपाण्डे लोगों को एकत्र करके उनसे कहते थे, "जिनके पास जो भी
अनाज है उसे बाहर निकालो। अपने कोठारों में चुराकर अनाज मत रखिए।"
महाराज बहुत व्याकुल हो रहे थे।
महाराज, हमारी गोठें खाली हो गयीं। हमारे पशु नहीं रहे "
"बाबा, मुझे सब कुछ मालूम है। यह सच है कि हमें पशुओं को भी बचाना
चाहिए। परन्तु उसके पहले मनुष्यों को बचाओ। किसी प्रकार अपनी रक्षा कीजिए।
समय हमेशा ऐसा ही नहीं रहने वाला है।" शम्भूमहाराज घूम घूमकर लोगों का
धीरज बँधा रहे थे।
अनेक स्थानों पर ब्राह्मण अनुष्ठान कर रहे थे। बहुत से लोग महादेव के
मन्दिर में मूर्ति को घेरकर बैठे थे। कुछ लोग सहायता के लिए हनुमानजी की प्रार्थना
कर रहे थे। "कुछ भी कीजिए। जो मुट्ठीभर अनाज मिलता है उसके साथ घास
पात खाइए। किन्तु मनुष्यों को किसी प्रकार बचाइए।" इस प्रकार की घोषणा
महाराज कर रहे थे। एक ओर मराठी सेना बीजापुर और गोलकुंडा की सहायता के
लिए जा रही थी। उसके लिए शम्भूमहाराज और कवि कलश को पन्हाला और
मलकापुर में ठहरना पड़ता था। औरंगजेब गोलकुंडा और बीजापुर की ओर था।
कुछ समय के लिए उसका संकट टल गया था। किन्तु भीषण अकाल से प्रजा की
रक्षा करना अत्यन्त आवश्यक हो गया था।
रसद और अनाज जुटाने के उपाय खोजे जा रहे थे। हिन्दवी स्वराज्य के सभी
अच्छी पैदावार देने वाला केवल जिंजी का क्षेत्र था। वहाँ की समृद्धि निरन्तर बढ़
रही थी। अपना विश्वस्त मानकर ही महाराज ने हरजी को वहाँ नियुक्त किया था।
इस समय स्वराज्य की सहायता जिंजी और कर्नाटक से ही हो सकती थी।
अकाल ने मनुष्यों और पशुओं का भाग्य फोड़ दिया था। चारा पानी के
अभाव में घोड़े अपनी जगह पर ही प्राणहीन होकर गर्दन लटका दिये थे। महाराष्ट्र
सम्भाजी 537
की मिट्टी स्वराज्य पर आये घोर संकट को जानती थी। पिछले सात वर्षों से उसका
लाड़ला युवराज कलिकाल से जूझ रहा था। इस व्यथा का उसे पूरा ज्ञान था। अकाल
की भीषणता ने सामान्य व्यक्तियों की कमर तोड़ दी थी। किन्तु षड्यन्त्रकारी
कर्मचारी उत्साहित थे। महाराष्ट्र के जमींदार जागीरदार औरंगजेब से मिल रहे थे।
उन्हें सिर पर उठाकर औरंगजेब नाच रहा था। जिनमें कोई पात्रता नहीं थी, उन्हें भी
बड़ा सम्मान दे रहा था। जागीर के झूठे कागजपत्र बनाने में उसके बाप का क्या
बिगड़ता था ?
राजधानी रायगढ़ पर भी पानी का संकट उपस्थित हो गया था। पहले ही
किले पर नीचे से परवालों में ढोकर पानी लाया जाता था। किले की विशेष जरूरत
के लिए कुछ घोड़े छोड़कर शेष घोड़े पाचाड़, रायगढ़वाड़ी और छत्री निजामपुर ले
जाये गये थे। समीप की काल नदी भी पूरी तरह सूख गयी थी। उसकी बीच धारा
में बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर उसमें अपने अपने घड़े और मसकें भरकर लोग ले जाते
थे। पानी भरी पखाल लेकर सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते भिश्तियों की कमर टेढ़ी हो रही
थी। काला हौद, पुष्करिणी और गंगासागर भी सूख गये थे।
शम्भूमहाराज और महारानी येसूबाई बहुत चिन्तित थे। चिन्ता के कारण
महाराज का शरीर सूखता जा रहा था। व्याकुल होकर महारानी ने कहा, "हे
भगवान, हे जगदीश्वर, हे माँ भवानी, कब बदलेगा यह दिन?"
लोगों की दशा देखकर महाराज का कलेजा विदीर्ण हो रहा था। भारी मन से
उन्होंने कहा, "येसूरानी हमारी जनता छः-सात वर्ष तक मुगलों का सामना करती
रही किन्तु उससे बच गयी। वह लड़ाई भी जानलेवा थी। आज हमारे सामने कितना
बुरा दिन आया है। लोगों के तबेले नष्ट हो रहे हैं। स्वराज्य में पानी नहीं। अब तो
हमारी आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है। अब एक बूँद आँसू भी नहीं निकलते,
माँ भवानी अपने बच्चों की कैसी परीक्षा ले रही हैं?"
"महाराज थोड़ा धैर्य धारण करें। जिंजी से हरजाँ राजा की अनाज मे भरी
गाड़ियाँ आ जाएँगी।" येसूबाई ने धीरज बँधाते हुए कहा।
"किन्तु महारानी, बार-बार स्मरण कराने पर भी उनकी ओर से सहायता
क्यों नहीं आ रही है?"
"दूर की यात्रा है रसद आने में देर तो लगेगी।"
"नहीं येसूरानी, मुझे सन्देह हो रहा है। अकाल तो अब आया है किन्तु हमारे
अपने घर के लोगों ने तो मुझे कब से पराया समझ लिया है। हमारे दो बहनोइयों ने
जो किया है, हरजी राजा भी वही करेंगे।"
"धीरज रखें महाराज! ऐसी कुशंका मन में क्यों ले आना?"
चार ही दिन में राजा के विश्वस्त सहयोगी का पत्र आया। दुर्दैव से महाराज
538 :: सम्भाजी