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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

by कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल

DevanagariHindipublished793 pages

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कूदती थी। बचपन में कभी हमारी पीठ पर भी बैठती थी। लड़कियाँ जवान होने
लगती हैं तो तीन-चार सालों में ही बहुत बड़ी दिखने लगती हैं। एक कीट का
रूपान्तर तितली के रूप में कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। बड़ी होने पर हंसा
को मैं टालने लगा। अण्णाजी पन्त तो हमारे पिताजी के बड़े भाई जैसे हैं।"
"इसका मतलब भविष्य के परिणामों की कल्पना स्वामी को थी?"
"हमें ही नहीं अण्णाजी पन्त को भी हंसा के पागलपन का अनुमान हो गया
था। इसीलिए उन्होंने आनन-फानन में उसकी शादी निश्चित कर दी। शादी के बाद
वह पहली बार पाचाड़ अपने मायके आयी थी।"
उसी समय वसंत पंचमी का दुर्भाग्यपूर्ण त्योहार आया। दोपहर के समय उस
पार के महल में महिलाओं और लड़कियों की हुड़दंग मची थी। उस समय येसू
आप भी वहीं पर थीं। यह पागल लड़की उस भीड़ से बाहर निकल आयी। मैं उस
समय अपने महल में कविताएँ रचने में विभोर था। मैंने पहरेदारों को आदेश दिया था
कि वे किसी को भी अन्दर न आने दें। परन्तु हंसा यह झूठ बोलकर मेरे महल मे
घुस आयी कि मैंने ही उसे बुलाया है। प्रेम के ज्वर ने उसे इतना उन्मत्त कर दिया था
कि पीछे से आकर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। वह अपने प्यासे ओठों से
मेरे मस्तक को चूमने लगी। हमने उसके कान के नीचे एक जोर का तमाचा मारा
और चिल्लाकर कहा, "शर्म नहीं आती तुम्हें? पन्त काका की बेटी हो तुम! किसी
की विवाहिता पत्नी हो तुम!" मेरी बात सुनकर वह पागल की तरह हँसी और
घायल पंछी की तरह हमारे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली, "हमारी देह से
जवानी फूटी पड़ रही है। उसका अभिषेक तुम पर कराने के लिए मैं आयी हूँ,
राजा।" मैंने उसको दूर धकेल दिया और उससे कहा, "मूर्ख लड़की! तेरी इस
मूर्खतापूर्ण हरकत से महल में सुरंग लग जाएगी।" तब भी वह जाने को तैयार न
थी, हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। तब मैंने उसे दो तीन तमाचे लगाये। हमने
उससे पूछा, "तुम पागल हो गयी हो क्या?" वह जोर हँसी और बोली, "राजा
प्रेम में जो पंछी अन्धा हो जाता है उसे तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए तो
परवाना शमा पर झपट पड़ता है और आग में मिट जाता है।"
अन्त में मैंने हंसा को समझाते हुए पूछा, "तुमको क्या चाहिए?" वह फिर से
हँसने लगी। उसकी हँसी बहुत ही रहस्यमयी और भयानक थी। वह बोली,
"आपकी पौरुषेय सुन्दरता के सामने मुझे मेरा पति एकदम लल्लू लगता है, राजा।
पिछले तीन सालों से मैं आपके लिए मशाल की तरह दिन-रात जल रही हूँ सिर्फ
एक बार मुझे अपनी बाँहों में ले लो।"
वह किसी भी तरह मुझे छोड़ने को तैयार न थी। मेरी कमर को उसने
मगरमच्छ की तरह लपेट रखा था। उसके इस पागलपन और पन्त के महल के साथ
38 :: सम्भाजी