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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 793 में से

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पृष्ठ 33

थे। वहाँ के एक फिरंगी मुनार को दो रत्नहार बनाने का काम दिया था। "
"तो?"
"बाकी कुछ नहीं, परन्तु परन्तु ऐसा मालूम पडा है कि आज वे लोग
आकर भूल से आपसे मिलकर गये।" यह कहते-कहते सोमाजी का गला सूख
गया।
"सोमाजी बाबा! आप जैमा कह रहे हैं उमी तरह से वह चीज यहाँ पहुँच
गयी है। आपकी बात मच है।"
"वाह! बहुत अच्छा।"
"लेकिन वह चीज यहाँ फिरंगी सुनार ने नहीं भेजी है। वह लेकर
पुर्तगालियों के वकील रामजी ठाकुर के आदमी यहाँ आये थे। हमारी समझ में यह
नहीं आ रहा है कि गाँव के सुनार अपनी चीजों को पहुँचाने के लिए वाइसराय के
कर्मचारियों को कब से काम में लगाने लगे।"
शम्भुराजा की कठोर और हृदय को भेद देने वाली पूछताछ से सोमाजी बाबा
हड़बड़ा गये। वे अपने माथे का पसीना उनरीय के छोर से पोंछने लगे। शम्भुराजा
अधिक क्रुद्ध होकर बोले, "जाकर बोलो अण्णाजी चाचा को, बोलो कि सारी बात
हमें मालूम है। स्वराज्य के छत्रपति हमारे पिताजी नियम के अनुसार स्वयं अपने
उपहारों अथवा भेंट वस्तुओं को सरकारी रत्नशाला में जमा कराते हैं। क्योंकि यहाँ
का प्रत्येक कण हिन्दवी स्वराज्य का है, राजा का नहीं है। ऐसी हमारी धारणा है।
आप कर्मचारी लोग जबरदस्ती जो उपहार मँगाते हो उसे कहाँ जमा करते हो। बस
इतना ही हमें बता दो।"
सोमाजी दत्तो बिना कुछ बोले, सिर नीचा किये निकल गये। बाद में
अण्णाजी के यहाँ से वह उपहार माँगने कोई नहीं आया। चार दिनों बाद ही
राजमहल में किसी कारण से बड़े महाराज ने अष्टप्रधान और अन्य कर्मचारियों के
लिए भोजन का आयोजन किया था। भोजन में महाराज के साथ अण्णाजी, शाहूजी,
सोमनाथ, बालाजी और शम्भुराजा थे। बालाजी और आवजी शिवाजी महाराज के
सबसे करीबी थे। महाराज उन्हें बहुत मानते थे। अण्णाजी पन्त साँवले, मजबूत
हड्डियों वाले ही नहीं बहुत हट्टे कट्टे भी थे। मोरोपन्त लम्बे चेहरे और लम्बी
नाक वाले थे। उनकी आँखें छोटी छोटी और मोती जैसी चमकदार थीं। मस्तक पर
चन्दन की ऊँची सीधी रेखा। वाणी कुछ कुछ खरज में। बुढ़ापे की शरीर पर स्पष्ट
छाया। पीठ थोड़ी झुकी हुई दिखती थी। किन्तु उनके शरीर में उत्साह की कमी न
थी। बच्चों जैसे उत्साह से भरे वे दरबार में घूमते थे।
महाराज ने इससे पहले मोरोपन्त और अण्णाजी पर बहुत से जिम्मेदारो के
काम सौंपे थे। दोनों ही महाराज के पुराने बुद्धिमान और कर्तव्यपरायण साथी थे।
किन्तु उन दोनों में मनोमालिन्य और मनमुटाव बहुत था। राज्य के कार्यव्यापार कम-
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