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सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 793 में से

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महाराज की माता जीजाबाई के शब्दों का जो आदर और प्रभाव था, वही
उत्तराधिकार येसूबाई के पास अपने आप चला आया था।
शम्भूराजा से वे एक-डेढ़ वर्ष छोटी थीं। किन्तु, उनके ममतांलु, कर्तव्यपरायण
और सर्वसमावेशक व्यक्तित्व ने एक अलग ऊँचाई प्राप्त कर ली थी। कद से ऊँची,
लम्बोतरे चेहरे वाली, देखने में सुन्दर नाक नक्श वाली, तन्वंगिनी, झुमकेदार नथ
पहनने वाली, उत्साही तरुणी येसूबाई रायगढ़ के अन्तःपुर में आकर्षण का केन्द्र थीं।
शम्भ्रूराजा की सोयराबाई जैसी अनेक मातायें वहाँ रह रही थीं। परन्तु येसूबाई जैसी
चमक और आदर किसी के भी व्यक्तित्व को नहीं मिल पाया था।
संगमेश्वर नगर के पास, कुछ ही कोसों की दूरी पर अन्दर पहाड़ियों में
श्रृंगारपुर की बस्ती थी। वहाँ के सूर्यराव सुर्वे स्वयं को श्रृंगारपुर का शाहंशाह मानते
थे। उनका व्यवहार भी उसी तरह निरंकुश था। दाभोल और संगमेश्वर जैसे बड़े दो
बन्दरगाह उनके अधिकार में थे। अनुमानतः सौ सौ से अधिक बड़े जहाज सूर्यराव
ने बनवाये थे या चुराकर प्राप्त किये थे। रत्नागिरी, दाभोल से लेकर हरिहरेश्वर तक
के समुद्र तट पर उनका शासन था। विशेषरूप से मक्का-मदीना जाने वाले यात्रियों
और विदेशी जहाजों को लूटकर सारी सम्पत्ति हड़प लेना सूर्यराव का मुख्य कार्य
था। यही सूर्यराव येसूबाई के नाना थे।
येसूबाई के पिता पिलाजी शिर्के एक प्रमुख सरदार के रूप में सूर्यराव के
दरबार में सेवारत थे। वे वहीं समीप के कुटरे गाँव के निवासी थे। पिलाजी राव
शिर्के भी शिवाजी महाराज के पराक्रम को वर्षों से सुनते आये थे। किन्तु महाराज ने
जब से स्वराज्य की स्थापना की, तभी से महाराष्ट्र के मुसलमान और मुसलमानों का
पक्ष लेने वाले जागीरदार मराठे उनका घोर विरोध कर रहे थे। ये तथाकथित
जागीरदार एक ओर तो विदेशियों के जूते पोंछते थे और दूसरी ओर जाति और कुल
के आधार पर स्वयं को शिवाजी महाराज से श्रेष्ठ मानते थे। सूर्यराव भी उसी जाति
कुल के थे। शिवाजी महाराज के साथ सूर्यराव का द्वेष इतना बढ़ गया था कि वे
महाराज के विरोध में ऐन मौके पर उनके विरोधी जावलीकर मोरे से जा मिले और
महाराज के विरोध में लड़े थे। सिद्धी और जौहर ने जब पन्हाला पर घेरा डाला था
तब भी सूर्यराव जौहर की सहायता के लिए दौड़े थे।
कुछ साल पहले शिवाजी महाराज कोंकण की लड़ाई के लिए गये थे। तभी
उन्होंने सूर्यराव के सारे अपराध क्षमा करके सूर्यराव को सुधरने का एक अवसर दिया
था। किन्तु अपने स्वभाव के अनुसार सूर्यराव साँप के तरह उन्हीं पर उलट पड़ा।
उसने महाराज के सैनिकों को बहुत कष्ट दिया ही, महाराज के बुलाने पर भी
पालवण में उनके सामने हाजिर नहीं हुआ। सूर्यराव के स्वराज्यद्रोह से महाराज
बहुत क्रुद्ध हुए। एक बार इस संकट को मिटा देने का निश्चय करके महाराज ने
34 • सम्भाजी