Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

by आचार्य ब्रह्मगुप्त

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished737 pages

About this granth

The Brahmasphuta Siddhanta (ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त) is the great astronomical and mathematical treatise of Brahmagupta (born 598 CE), completed in 628 CE at Bhillamala (modern Bhinmal, Rajasthan) when he was thirty. It holds a special place in the history of mathematics as the first text to treat zero as a number, with rules for adding, subtracting and multiplying with it, and to set out rules for positive and negative quantities. It also gives the formula for the area of a cyclic quadrilateral and the bhavana method for square-nature equations.

Its chapters deal with the mean and true motions of the planets, the three problems of time, place and direction, lunar and solar eclipses, risings and settings, the moon's crescent, planetary and stellar conjunctions, arithmetic and the kuttaka, shadows, the sphere and instruments.

This scan is Volume I of the 1966 edition from the Indian Institute of Astronomical and Sanskrit Research, New Delhi, with the Vasana, Vijnana and Hindi commentaries, prepared by an editorial board led by Acharya Ram Swarup Sharma, with a foreword by Dr. Sampurnanand and an introduction by Dr. Satya Prakash. It has 737 pages.

Page 636Permalink

( २५२ )
अंशक शेषेण युता स्त्रित्प्ता शेषात्र तदंतरादथवा ।
भानोर्ज्ञदिने द्युगुणं यः कथयति कुटकज्ञः सः ॥ ५५ ॥
अंशक शेष त्रियुतं लिप्ता शेषं कदा रवेर्ज्ञ दिने षट् ।
सप्ताष्टोन वा कुर्वन्नावत्सराद्गणकः ॥ ५६ ॥
अंशसम मंशके कलासमं वा कला कदा शेषम् ।
दिवसकरस्येष्ट दिने कुर्वन्नावत्सराद्गणकः ॥ ५७ ॥

५५. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५६ है)
१. लिप्ता (ग) (च) for (स्त्रिप्ता) ३. द्युगणं (च) (ङ) for (द्युगुणं)
२. शेषात्तदंतरा (ग) (च) for (शेषात्रतदंतरा)
४. कुट्टकज्ञ (ग) कुट्टकज्ञः for (कुटकज्ञः)
(ग) ५. हता for (युता) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ५५ है)
(च) ४. कुदफ्ज्ञः for (कुटकज्ञः) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५६ अंकित है)
(ङ) ५. युतात् for (युता) लिप्ता for (स्त्रिप्ता)
२. शेषात् for (शेषात्र)
५६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५७ है) १. नं वा (ग) नावां for (नवा)
(ग) २. शेषं (ङ) for (शेष)
३. 'षट्' दूसरी पंक्ति का प्रथम पद है (ङ)
४. सप्ताष्टौ for (सप्ताष्टो)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या ५६ है)
(च) १. सप्ताष्टोनं for (सप्ताष्टोन)
५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५७ अंकित है)
(ङ) १. नव वा for (न वा) ४. सप्ताष्टौ for (सप्ताष्टो)
५७. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५८ है)
१. मंशशकज्ञा for (मंशके) २. कदा (ग) for (कला)
६. कला (ग) for (कदा) ४. दिवसस्येष्ट for (दिवसकरस्येष्ट)
५. त्सराद्गणकः for (त्सराद्गणकः)
(ग) ६. अंशयुगमंशशेषं for (अंशसममंशके) ७. कलासमांश for (कलासमं)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ५८ है, संख्या ५७ अंकित करना भूल गया)
(च) १. मंशशे for (मंशके) २. ३. कदा कलाशेषं for (कलाकदाशेषम्)
४. दिवसस्येष्ट दिने for (दिवसकरस्येष्ट दिने)
५. स्वराद्गणकः for (सराद्गणकः)
(ङ) १. मंशशेषं for (मंशके) ३. 'कदा' लुप्त
Page 637Permalink

धिको (ग) अल्पेधिकल्पः for (अल्पाधिकोधिकल्पे)Wait! Look at the word inside the parenthesis at the end of line 14: Is it(अल्पाधिकोधिकल्पे)or(अल्पाधिकोधिकोल्पे)? Let's read the characters in (अल्पाधिकोधिकल्पे): अ, ल्पा, धि, क, ो, धि, क, ो, ल्पे ? Wait, look at the third-to-last character: Is there a 'को' or just 'क'? Wait! Look at verse line 7: अल्पाधिकेधिकोल्पेक्षेपौWait! Main text has: अल्पाधिकेधिकोल्पे... Wait, let's look at note 2 in line 14:२. अल्पधिकोऽधिको (ग) अल्पेधिकल्पः for (अल्पाधिकोधिकोल्पे)Wait, in line 14, look at the word:अ ल्पा धि के धि को ल्पे क्षे प्तौ- wait, in line 14:(अल्पाधिकोधिकोल्पे)or(अल्पाधिकोधिकल्पे)? Wait, look at line 20: २. अल्पेऽधिकोऽधिकेऽ

Page 638Permalink

( २५४ )
भानोराय शवधा² त्रिचतुर्गुणितान्वशोध्यराश्यंशात्³ ।
नवर्ति¹ दृष्ट्वा सूर्य⁴ कुर्वन्नावत्सराद्गणकः⁵ ॥ ६१ ॥
भावितके³ तद्घातो विनष्ट¹ वर्णेन तत्प्रमाणानि ।
ऋत्वेष्टानि² तदाहत वर्णाक्यं⁴ भवति रूपाणि⁵ ॥ ६२ ॥
वर्णप्रमाणभावितघातो⁴ भवतीष्ट¹वर्णासंख्यैवम्² ।
सिध्यति विनापि भावितसमकरणात्³ किंकृतं तदतः⁵ ॥ ६३ ॥
मूलं¹ द्विधेष्ठ³ ⁶वर्गगुण²गुणादियुत⁷विहीनाच्च⁸ ।
आद्यवधो³ गुणक गुणः संहात्पवातेन⁴ पमंत्यम्⁵ ॥ ६४¹⁰ ॥

६१. (घ) (वि० इस श्लोक की क्रमसंख्या ६२ है) १. नवर्ति (ग) नर्ति for (नवर्ति)
(ग) २. वधात्रि (ङ) for (वधात्रि) ३. राश्यंशान् for (राश्यंशात्)
(च) १. नर्वति for (नवर्ति) ४. दृष्ट्वा (ङ) for (दृष्टवा)
५. (वि०—यहां क्रमसंख्या ६२ अंकित है) (ङ) १. नर्वति for (नवर्ति)
६२. (घ) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ६३ है) १. विनष्टे (च) for (विनष्ट)
२. कृतवेष्टानि (ग) (च) (ङ) for (ऋत्वेष्टानि)
(ग) ३. भाविक यद्धातो for (भावितके तद्घातो)
(च) ५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६३ अंकित है)
(ङ) ६. यद्घातो for (तद्घातो)
६३. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६४ है)
(ग) १. भवतीष्ट for (भवतीष्ट) २. संख्यैक्यम् for (संख्यैवम्) ३. काम for (सम)
(च) ४. घातो for (घातो) ५. (वि० इसकी क्रमसंख्या ६४ अंकित है)
६४. (घ) (वि०—इस श्लोक की क्रम संख्या ६५ है)
१. मूलं (ग) for (मूल) २. वर्गाद्गुण (ग) वर्गात् गुणक for (वर्गगुण)
३. आद्य (ग) (च) (ङ) for (आद्यवधो)
४. सहांत्यघातेन (ग) संहृत्य घातेन for (संहात्पवातेन)
५. पमंत्यम् (ग) मन्त्यम् for (पमंत्यम्)
(ग) ३. द्विधेष्ठ for (द्विधेष्ट) ७. गुणादिष्टयुत for (गुणादियुत)
८. विहिनाच्च for (विहीनाच्च) ६. गुण for (गुणः)
(च) २. वर्गाद्गुण for (वर्गगुण) ४. सहांत्यघातेन for (संहांत्यवातेन)
५. पमंत्ययं for (पमंत्यम्) १०. (वि०—इसकी क्रम संख्या ६५ अंकित है)
(ङ) श्री —+ अथ वर्ग प्रकृतिः +
२. वर्गाद् गुणक for (वर्गगुण) ७. गुणादिष्ट for (गुणादि)
४. सहान्त्यघातेन for (संहांत्यवातेन) ५. कृतमन्त्यम् for (पमंत्यम्)
Page 639Permalink

curve: it's 'व्ये', not 'त्ये'!
Yes, "अंत्यपदकृतिव्येका"!
And footnote says:
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) - wait, why does footnote say for (व्येको)?
Wait, look at footnote 2:
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) or for (व्येका)?
Wait, in line (च):
७. व्यैका for (व्येका)!
In (ग):
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) - wait, is the last letter inside parenthesis 'व्येका'?
Look at (व्येको): is it (व्येका)?
Wait, the main text definitely has "व्येका": अंत्यपदकृतिव्येका.

Let's check the apparatus lines:
(blank or decorative line)
Wait, the decorative line is a wavy border:
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Then:
६५. (घ) (वि०-इस श्लोक की क्रम संख्या ६६ है)
१. वज्रवधैक्यं (ग) वज्रमधैक्यं for (वज्ञावाधैक्यं)
२. हृते (ग) तुहृते for

Page 640Permalink

( २५६ )
चतुरुनैन्यपद कृताञ्येकयुतेवधदलं पृथग्वे२कम् ।
व्येकाध्व्यह्तमंत्यं पदवधगुण मन्यदाद्यहृ५दम् ॥ ६८ ॥ १
वर्गं३ गुणकः४ क्षेप; केनचिदुद्धत युतोन५ को दलितः ।
प्रथमो॑त्ये६ मूलमन्यो गुणरपदोऽद्भु७त प्रथमम् ॥ ६९ ॥२
गुणके५ वर्गच्छिन्ने६ छेदपदे यो धृतपदं१ प्रथमवर्गः२।३
क्षेत्रे४ क्षेपे तन्मूले छेदपद गुणिते ॥ ७० ॥७

६८. (घ) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ६६ है) १. त्र्येक for (श्रोक)
२. पृथग् (ग) for (पृथग्) (च) ३. ध्याह (ग) (ङ) for (ध्व्यह)
(ग) ४. चतुरूनोंत्यपदक्रतित्येकयुते for (चतुरुनैन्यपदकृता श्रोकयुते)
५. मन्याद्याद्यपदम् for (मन्यदाद्यपदम्)
(च) १. त्र्येकयुते for (श्रोकयुते) ३. च्छाहत for (ध्व्यहत)
(ङ) ७. कृती for (कृता) १. त्र्येकयुते for (श्रोकयुते)
२. पृथग्यन्येकम् for (पृथग्वे कम्) ५. माद्यमान्त्य for (मन्यदाद्य)
६९. (घ) (वि०-क्रम संख्या ७० है) १. गुणकार (ग) (ङ) for (गुणर)
२. पदोद्धूतः प्रथमम् (ग) धृतप्रथमः for (पदोद्भुत प्रथमम्)
(ग) ३. वर्गेण for (वर्ग) ४ गुणके (च) (ङ) for (गुणकः)
५. दुद्धतो नितोदलतः for (दुद्ध तयुतोनको दलितः)
६. प्रथर्मोत्ये (ङ) for (प्रथर्मोत्ये)
(च) २. पदोद्धूतः for (पदोद्भूत) ७. (वि०-क्रम संख्या ७० अंकित है)
(ङ) ७. युतोनितोदलितः for (युतोनको दलितः)
२. पदोद्धृतः प्रथमः for (पदोद्भुत प्रथमम्)
७०. (घ) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ७१ है)
१. घृतं for (घृतपदं) २. प्रथमं for (प्रथम)
३. 'वर्ग' (यह शब्द दूसरी पंक्ति का आरंभिक पद है) ४. छिन्ने for (क्षेत्रे)
(च) ६. वर्गच्छोन्ने for (वर्गच्छिन्ने) १. द्वतपदं for (घृतपदं)
३. वर्ग for (वर्गः) ४. छेन्ने for (क्षेत्रे)
७. (वि०-यहाँ क्रम संख्या ७१ अंकित है)
(ङ) 'वर्गच्छिन्ने गुणके प्रथमं तन्मूलभाजितं भवति ।
वर्गच्छिन्ने क्षेपे तत्पदगुणिते तदा मूले ॥ ७० ॥
for
गुणके वर्गच्छिन्ने छेदपदे यो धृतपदं प्रथमवर्गः।
क्षेत्रे क्षेपे तन्मूले छेद पद गुणिते ॥ ७० ॥
Page 641Permalink

(line 11): ६. सैकं for (सैक)
Look at that ६: it is open at the top-left, curves down, loops at the bottom and curves up to the right.
Now look at line : the digit in १९०२:
It has a closed loop on the left, curving up and then down to the right: that is precisely ९!
Wait, look at it: yes, it is ९! So the year is १९०२!
1902 AD is when Sudhakara Dvivedi's edition was printed in Benares!
"यह श्लोक १९०२ में बनारस से मुद्रित प्रति में ७८ संख्या पर है"
Wait, let's re-examine that digit:
Could someone read it as १६०२? At first glance, a modern reader might mistake it for ६, but it's clearly १९०२ (1902)!
Wait, let's look closely at १९०२:
Top loop on the left, stroke goes up, then loops down to the right. Yes, that is 100% Devanagari ९.

Let's check the line markers and match the layout line by line.

Line 1: ( २५७ )
Line 2: शशिलिप्ता शेषकृतिर्द्विनवति गुणिता अशिति गुणितं वा ।

Page 642Permalink

( २५८ )
भगणादिशेष वर्गं त्रिभिर्गुणं संयुक्तं शतैर्नवभिः¹ ।
³वर्गोऽष्टशतोनां वा कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ।। ७४ ।।²
अधिमासशेषवर्गं³ त्र्योदशगुणं¹ त्रिभिर्युक्तम्⁴ ।
त्रिघनोनां वा वर्गं⁵ कुर्वन्नात्सराद्² गणकः ।। ७५ ।।
अवमावशेषवर्गं द्वादशगुणितं शतेन संयुक्तम् ।
त्रिभिरूनं वा वर्गं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः¹ ।। ७६ ।।

७४. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७५ है)
(ग) १. शनैन्नवभिः for (शतैर्नवभिः)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ७८ है)
(च) २. (वि०—क्रमसंख्या ७५ अंकित है)
(ङ) ३. कृतिमष्ट for (वर्गोऽष्ट)
७५. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७६ है)
१. त्रयोदश (ग) for (त्र्योदश)    २. कुर्वन्नावत् (ग) (ङ) for (कुर्वन्नात्)
(ग) ३. वग्र° for (वर्गं)    ४. त्रिभिः शतैर्युक्तम् (ङ) for (त्रिभिर्युक्तम्)
५. वग्रं for (वर्गं)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ७६ है)
(च) १. त्रयोदश (ङ) for (त्र्योदश)
६. (वि०—यहां क्रमसंख्या ७६ अंकित है)
७६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७७ है)
(च) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७७ है)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८२ है)
(ग) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८० है)
७६. संख्या पर अंकित निम्नांकित अतिरिक्त श्लोक है—
सूर्यादि¹ विलिप्ताशेषं पंचभिरूनादुगतं² तथा दशभिः ।
वर्गो³ बृहस्पति दिने कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ।। ७६ ।।
(वि०—यह श्लोक इस प्रति में क्रमसंख्या ७६ पर है)
१. सूर्ये for (सूर्यादि)    २. रूनाहतं for (रूनादुगतं)
३. वर्गे for (वर्गो)
Page 643Permalink

( २५६ )
गुणकयुतिरष्टगुणिता गुणिकांतरवर्गभाजिता राशिः ।
गुणकौ त्रिगुणौ व्यस्ताधिकौ हतावंतरेण पदे ॥ ७७ ॥
इन्दुविलिप्ताशेषं सप्तदशगुणं च यो दशगुणं च ।
पृथगेयुतं वर्गं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥ ७८ ॥
वर्गोनकृतियुतो नानगास्तत्संयोंतराद्वैकृतिभक्तः ।
तद्गुणकौ युतिवियुतौ वर्गौ घाते च रूपयुते ॥ ७९ ॥
७७ (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७८ है)
१. गुणाकांतर (ग) (ङ) (च) for (गुणिकांतर)
३. हतावतरेण (ग) हतावंतरेण (च) (हतावंतरेण)
(ग) (वि०—यह श्लोकसंख्या इस प्रति में ७० पर, तथा बनारस में मुद्रित प्रति
में ७१ पर अंकित है)
(च) (वि०—यहां क्रमसंख्या ७८ अंकित है)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७१ है)
७८. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७६ है)
१. त्रयोदशं for (चयोदश) (ग) 'च'से 'च' तक लुप्त
(ग) ३. गुणितं वा for (गुणं च) ३. पृथगेक (ङ) for (पृथगे)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ८१ है)
(च) १. त्रयोदश (ङ) for (चयोदश)
४. (वि०—क्रमसंख्या ७६ अंकित है)
(ङ) ५. चापि for (च)
७९.(घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८० है)
१. नगांस्तत्संयांतराद्धं (ग) नस्तत् संयोगांतराद्धं for (नानगास्तत्संयोतराद्धं )
(ग) २. न्यकृति for (नकृति) ३. कृतिर्भक्तः for (कृतिभक्तः)
४. तद्गुणितौ (ङ) for (तद्गुणकौ)
(च) २. वर्गोन्यकृति for (वर्गोनकृति)
१. नगांस्तत्संयोतराद्धं for (नानगास्तत्संयोतराद्धं)
४. तद्गुणको for (तद्गुणकौ)
५. (वि०—यहां क्रमसंख्या ८० है)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ७२ है)
२. वर्गोऽन्यकृति for (वर्गोनकृति) १. नस्तत् for (नानगास्तत्)
५. वर्गो for (वर्गौ) ६. संयोगान्तरार्ध for (संयोंतराद्धं)

Page 644Permalink

( २६० )
यैरूनो यैश्चयुतो रूपैर्वर्ग¹स्तदैक्यमिष्टहूतम्² ।
इष्टोनं तद्दलकृतिरूनाभ्यधिका भवन्ति³ राशिः⁴ ॥ ८० ॥⁵
याभ्यां कृतिराधिकोनस्तदंतरं हूत³युतो न मिष्टेन ।
तद्दलकृतिराधिके¹ न्यूनाभ्यधि⁵ भवति राशि² ॥ ८१ ॥⁷
ज्ञदिनेऽर्कं¹ कलाशेषं गुरू दिन²विकलावशेष युक्तोनम् ।
वर्गोविधं³ च संकं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥ ८२ ॥⁴
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
८०. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८१ है)
१. वर्गं (ग) (ङ) for (वर्ग) २. हृतं (ग) (ङ) for (हूतम्)
३. भवति (ग) (च) (ङ) for (भवन्ति)
४, राशिम् (च) for (राशि:)

Page 645Permalink

( २६१ )
विकलाशेषं$^३$ सहितं त्रिवत्याऽङ्डे सप्तषष्टिहीनं$^२$ च
भानोर्ज्ञदिने वर्गं कुर्वन्नाबत्सराद् गणकः ॥ ८३ ॥$^४$
ज्ञदिनेऽर्कं$^१$ कलाशेषं$^२$ वर्गो$^३$ द्वादशभिः संयुतं त्रिषष्टचा च ।
षष्टचाष्टाभिश्चोनं कुर्वन्नात्सराद् गणकः ॥ ८४ ॥
इन्दु$^२$ विलिप्ता शेषं$^१$ मंत्राशेषं वा ।
अथवा मध्यमिष्टं$^३$ कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥ ८५ ॥$^४$
जौवविलिप्ता शेषा$^२$ कुजमिंदुं$^१$ भौमलिप्तिका$^३$शेषात् ।
रवि$^१$मिंदभाग$^४$शेषा$^५$ कुर्वन्नावत्सराद् गणकः$^६$ ॥ ८६ ॥

८३. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८४ है)
१. ६३ (च) for (८३) २. +६७+ (च)
[
Page 646Permalink

( २६२ )
इष्टग्रहेष्टशेषा^५ द्युगणो गतनिरप॑२र्वर्तयं॑१ संगुणितैः॑३ ।
छेददिनैरधिकोस्मादन्यग्रहशेषमिष्टो वा ॥ ८७^४ ॥
निश्छेदभागहारौ ग्रहयोर्भंगणादि शेषयोर्द्यु^३गुणात्॑१ ।
यस्मात्तं॑४ निश्छेदेनोद्धृतयोर्लब्धयोर्युगुणितौ॑२ ॥ ८८^६ ॥
निच्छेदभागहारौ विपरीतो तद्युतातफलस्तस्मात्॑१ ।
शेषेषु॑४ गुणादेवं॑२ त्र्यादिनां॑३ प्राग्वदिष्टदिने ॥ ८६^५ ॥

८७. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८८ है)
१. 'यं' यह मूलपाठ में उपलब्ध नहीं (ग)
(ग) २. निरवर्तं for (निरपवर्तयं) ३. संगुणतः for (संगुणितैः)
(च) २. निरपवर्त्तंसंगुणितः for (निपवर्तयं संगुणितैः)
४. (वि०—क्रमसंख्या ८८ है)
(ङ) ५. शेषाद् for (शेषा)
८८. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ८६ है)
१. क॑र्गणात् for (द्युगुणात्) २. द्वृ॑तयो (ग) धृताया for (हृतयो)
(ग) ३. शेषवो द्युगणात् for (शेषयोर्द्युगणात्)
४. यस्मात्तन्न for (यस्मात्तं)
५. लब्धस॑ंगुणितौ for (लब्धयोर्गुिणतौ)
(च) १. द्यु॑गणात् (ङ) for (द्युगुणात्) २. नोद्धृ॑तयो for (नोद्धृतयो)
६. (वि०—क्रमसंख्या ८६ अंकित है)
(ङ) ७. निश्छेद for (निच्छेद) १. निश्छेदे for (निच्छेदे)
८. विपरीतो for (भंगणादि)
५. लब्धस॑ंगुणितौ for (लब्धयोर्गुणितौ)
३. ग्रहयो for (शेषयो)
८६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६० है)
१. पुन (ग) पुनः शेषे for (फलस्तस्मात्)
२. द्युगणादेवं (च) (ङ) for (द्युगुणादेवं)
३. त्र्यादीनां (ग) (ङ) for (त्र्यादिना)
४. ३ द्युगणादैवत्त्र्यादीनां for (शेषेषु गुणादेवं त्र्यादिना)
(ग) (वि०—दूसरी पंक्ति "द्युगणा" से आरम्भ होती है)
(च) १. पुनस्तस्मात् (ङ) for (फलस्तस्मात्)
५. (वि०—क्रमसंख्या ६० अंकित है)
(ङ) ६. निश्छेद for (निच्छेद)
Page 647Permalink

( २६३ )
द्युगु१णमवशेषाद्रविचन्द्रौ मध्य२मौ स्फुटा३दथवा ।
एवं तिथिं ग्रहं वा कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥ ६०४ ॥
एक३दिनावमशेषं षट्१गणमेकरविचन्द्रभगणोनम्२ ।
शुध्यति भूदिनभक्तं४ व्येकं चांद्रं स्तदुक्तिरियम्५ ॥ ६१ ॥
इषु४शरकृताष्टदिग्भिः १०८४५५ संगुणितादवमशेषा१द् भक्तात् ।
रूपाष्ट२रसवेदरसशून्यशर६गुणैः ३५०६४८१ दिनगणः३ शेषम् ॥ ६२५ ॥

६०. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६१ है)
१. गण for (गुण) (ग) द्युगणमवमासशेषा for (द्युगणमवशेषा)
२. मध्यमौ (च) for (मध्यमौ)
(ग) ३. स्फुटावथवा for (स्फुटादथवा)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६० है)
(च) १. द्युगण for (द्युगुण)
४. (वि०—क्रमसंख्या ६१ अंकित है)
(ङ) १. गुणमवमावशेषा for (गुणमवशेषा)
६१. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६२ है)
(ग) १. चद्गुण for (षट्गुण)    २. सगणोना for (भगणोनम्)
३. एकादिना for (एकदिना)    ४. भूदिभक्तं for (भूदिनभक्तं)
(च) ५. (वि०—यहां क्रमसंख्या ६२ अंकित है)
(ङ) ३. एकदिनमवशेषं for (एकदिनावमशेषं)
१. यद्गुणमेक for (षट्गणमेक)
६२. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६३ है)
१. दवमवशेषकाद् for (दवमशेषाद्भक्तात्)
२. रूपाष्ट वेदरसशून्य (ग) for (रूपाष्टरसवेदरसशून्य)
३. दिनगणः (ङ) (च) for (दिनगणः)
(ग) ४. इष्टशरकृताष्टदिग्भिः for (इषुशरकृताष्टदिग्भिः)
५. देवमशेषाकभक्तात् for (दवमशेषाद् भक्तात्)
६. रगुणैः for (शरगुणैः)
(च) १. दवमवशेषकाङ्कक्तात् for (दवमशेषाद्भक्तात्)
२. वेदरस (ङ) for (रसवेदरस)
८. (वि०—क्रमसंख्या ६३ अंकित है)
(ङ) १. शेषेकाङ्कक्तात् for (शेषाद्भक्तात्)
Page 648Permalink

( २६४ )
जिनरस गोब्धिरदृग्गुणा^१ ३२४६६२४^४ छशि^५ वसुकृत रसखभुत^२रामहूतान्^३ ।
इष्टावमशेषाद्यच्छेषं^६ रविभगण शेषं तत् ॥ ६३ ॥
गोर्गेंदुखेश^३ ११०१७६ गुणिताद्भूक्तानन्खपक्षयम^१ रसेषु^५ गुणैः^७ ३५६२२२०^२ ।
^६शेषमवमावशेषात्तित्थयो वमशेषकाद्विकलम् ॥ ६४ ॥
भागकलाविकलैक्यं दृष्ट्वा विकलांतरं न^१ के शेषैः^६ ।
ऐक्यं द्विधांतराधिकहीनं^३ द्विविभाजितं^४ शेषम्^२ ॥ ६५^५ ॥

६३. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६४ है)
१. रदगुणा (ग) रसगुणा for (रद्गुणा)
२. भूत (ग) (ङ) for (भुत)
३. हूतान् । ३५६४८१ (ग) राहूतात् for (रामहूतान्)
(ग) ४. (वि०—संख्या के अंक लुप्त हैं) ५. शशि (ङ) for (छशि)
५. शेषाद्या for (शेषाद्य)
(च) १. रदगुणा for (रद्गुणा)    २. भूत for (भुत)
३. रामहतान् for (रामहूतान्) ७. वि०—यहां क्रमसंख्या ६४ अंकित है)
(ङ) १. गोऽब्धिरद ३२४६६२४ गुणात् for (गोब्धिरदृग्गुणा ३२४६६२४)
३. हूतात् for (हूतान्)    ६. शेषाद्यशेषं for (शेषाद्यच्छेषं)
६४. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६५ है)
१. गुणिताद्भक्ता (ग) (च) (ङ) for (गुणिताद्भूक्ता)
२. '३५६२२२०' दूसरी पंक्ति का आरंभ (य) संख्या लुप्त
(ग) ३. गोगेंदुशेख for (गोर्गेंदुखेश)    ४. संख्या के अंक लुप्त हैं
५. नाख for (न्नख)    ६. शेषावमाव for (शेषमवमाव)
(च) ७. गणैः for (गुणैः)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ६५ अंकित है)
(ङ) ३. गोऽगेंदु for (गोगेंदु)
६५. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६६ है)
१. वके शेषे (ग) च के शेषे for (नके शेषैः)
२. शेषे (ग) (ङ) for (शेषम्)
(ग) ३. द्विघातरा for (द्विधांतरा)    ४. द्विभाजितं for (द्विविभाजितं)
(च) १. वकेशेषे for (नके शेषैः)    २. शेषे for (शेषम्)
(वि०--क्रमसंख्या ६६ अंकित है)
(ङ) १. च for (न)    ६. शेषे for (शेषैः)
३. द्विधान्तरा for (द्विधांतरा)    ४. च द्विभाजितं for (द्विभाजितं)
Page 649Permalink

( २६५ )
तद्वर्गांतरमाद्यं तदंतरं चांतरीद्धृतयुतोनम् ।
वर्गांतरं विभक्तं ताभ्यां शेषोन्यतो द्युगणः ॥ ६६ ॥
कृतिसंयोगाद्विगुण छेद्ययुतिकृति विशोध्य मूलेन ।
शेष युतियुत हीनाद्विहता शेषे पृथक् युक्त्या ॥ ६७ ॥
शेषवधाद्विऋतिति गुणा छेषांतरवर्गसंयुतान्मूले ।
शेषांतरीनैयुक्तं दलितं शेषे पृथगभीष्टे ॥ ६८ ॥

६६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६७ है)
१. चांतरोध्दृत (ग) (ङ) for (चांतरीद्धृत)
२. द्वा द्वाभ्यां for (ताभ्यां) ३. शेषे ततो (ग) (ङ) for (शेषोन्यतो)
(च) १ चांतरोद्धृत for (चांतरीद्धृत) ४. (वि०—क्रमसंख्या ६७ है)
३. शेषो ततो द्युगणः for (शेषोन्यतो द्युगणः)
(ङ) ५. माद्यं for (माद्यं) २. द्वाभ्यां for (ताभ्यां)
६७. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६८ हैं)
१. द्विगुणा (ग) (च) for (द्विगुण)
२. छष for (छेष) (ग) छेष कृतियुति for (छेषयुतिकृति)
३. विहृता (ग) विज्ञता for (द्विहता)
(ग) ४. कृत संयोगा for (कृतिसंयोगा) ५. पृथग्युक्त्या for (पृथक् युक्त्या)
(च) ६. द्विहता for (द्विहता)
६. (वि०—क्रमसंख्या ६८ अंकित)
(ङ) कृतिसंयोगाद् द्विगुणाद्युतिवर्गं प्रोह्य शेषमूलं यत् ।
तेन युतोनो योगो दलितः शेषे पृथगभीष्टे ॥ ६८ ॥
for
(कृतिसंयोगाद्विगुण छेद्ययुतिकृति विशोध्य मूलेन
शेष्युतियुतहीना द्विहता शेषे पृथक् युक्त्या ॥ ६७ ॥)
६८. (घ) (वि—इसकी क्रमसंख्या ६६ है)
१. विकृति (ग) for (द्विऋतिति) मूलम् (ग) (ङ) for (मूले)
३. शेषांतरोन (ग) (ङ) for (शेषांतरीन युक्तं)
४. पृथगभीष्टे (ग) (ङ) for (पृथगभीष्टे)
(ङ) १. कृति for(ऋति) २. मूलं for (मूले)
४. पृथग्भीष्टे for (पृथगभीष्टे)
५. (वि०—क्रमसंख्या ६६ अंकित है)
(ङ) १. वधाद् द्विकृतिगुणात् for (वधाद्विऋतिगुणा) ६. शेषांतर for (छेषान्तर)
Page 650Permalink

( २६६ )
^२सुखमात्रममी ^६प्रश्ना ^१प्रश्नान्यात्सहस्रशः कुर्यात् ।
^३अन्यैर्दत्तात्प्रश्नानुक्तै^४र्वा साधयेत्करणैः^४ ॥ ^५९९ ॥
जन संसदि दैवविदां तेजो नाशयति भानुरिव^२ भानाम् ।
^३कुट्टाकार^४प्रश्नैः पठितैरपि किं पुर्नर्जातैः^१ ॥ १०० ॥
प्रतिसूत्रममी^४ प्रश्नाः पठिताः सोद्देशकेषु सूत्रेषु ।
^१आयाणां ^२त्र्यधिकशते ^२कुट्टकोष्टादशोऽध्यायः ॥^५१०१॥
^३इति श्री ब्रह्मगुप्ते अष्टादशोऽध्यायः ।
९९ (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०० है)
१. प्रश्नानन्या (ग) प्रश्तानन्यान् (ङ) for (प्रश्नान्यात्)
(ग) देव्यात्र for (सुखमात्र) ३. दंत्तान् for (दंत्तात्) ४. त्करणैः for (करणैः)
(च) १. प्रश्नानन्यान्सहस्रशः (प्रश्नान्यात्सहस्रशः)
(वि०—इसकी क्रम संख्या १०० अंकित है)
(ङ) २. हृदि घात्रममी for (सुखमात्रममी) ६. प्रश्नाः for (प्रश्ना)
३. अन्यैर्दत्तान् for (अन्यैर्दत्तात्) ७. प्रश्नानुक्त्यैवं for (प्रश्नानुक्तैर्वा)
४. करणैः for (करणैः) (वि०—३. 'हृतान्मात्रममी' इति सुधाकरः)
१००. (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०१ है)
१. पुनर्जातैः (ग) (च) for (पुर्नर्जातैः) २. भारिव for (भानुरिव)
३. कुदाकारं for (कुट्टाकार) ४. प्रस्नैः for (प्रश्नैः)
(च) ३. कुदाकार प्रश्नैः for (कुट्टाकार प्रश्नैः)
५. (वि०—यहाँ क्रम संख्या १०१ अंकित है)
(ङ) १. पुनः शतशः for (पुर्नर्जातैः)
१०१. (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०२ है)
१. आर्याणाम् (ग) आर्या for (आयाणां) २. शतेन कुष्ट for (शते कुट्ट)
३. 'इति' से 'अध्यायः' तक अंकित नहीं है ।
(ग) २. समी प्रश्नाः for (ममी प्रश्नाः) २. शतेन for (शते)
३. इति श्रीब्रह्मसिद्धांते कुट्टकाध्यायाष्टदशमः ॥ १८ ॥ for (इति श्रीब्रह्मगुप्ते-
अष्टादशोऽध्यायः)
(च) १. आर्याणां for (आयाणां)
३. "इति" से "अध्यायः" लुप्त (केवल "श्री" अंकित है)
५. (वि०—क्रमसंख्या १०२ अंकित है)
(ङ) १. आर्या for (आयाणां) २. त्र्यधिकशतेन for (त्र्यधिकशते)
६. कुह्रश्चाष्टादशो for (कुट्टकोष्टादशो)

Page 651Permalink

( २६७ )
अथ शंकुच्छायादिज्ञानाध्यायः
एकोनविंशः
दृष्ट्‌वा दिनार्द्धघटिका योर्कजो$^१$ क्षांशकान्वीजा$^३$नाति$^२$ ।
उदयांतरघटिकाभिर्ज्ञाता$^४$ ज्ञेयं स तन्त्रज्ञः ॥ १ ॥
अस्तांतर्घटिकाभिर्यो$^१$ ज्ञाताज्ज्ञेयमानयति$^६$ तस्मात् ।
मध्यगति$^२$ ग्रहभगणाननयति$^३$ तया$^४$ स तन्त्रज्ञः ॥ २ ॥
आनयति यस्तमो रविशशांक मानानि दिपं$^१$ कौच्च्यतलात् ।
शंकुतलांतरभूमिं$^२$ ज्ञाने छायां स तन्त्रज्ञः ॥ ३ ॥
छायाद्वितीयाग्रांतर$^१$ विज्ञाने$^४$ वेत्ति$^२$ दीपोच्च्ये ।
शंकु छायाज्ञो$^५$ वा$^३$ यच्छायाैच्च्ये स तंत्रज्ञः ॥ ४ ॥

१. (घ) १. ऽर्कज्ञो (ग) (ङ) for (योर्कजो) २. विजानाति (ग) for (वीजानाति)
(च) १. योऽर्क्कजो for (योर्कजो) २. विजानाति for (वीजानाति)
(ङ) ३. ऽक्षांशकान् for (क्षांशकान्) २. विजानाति for (वीजानाति)
४. ज्ञाताज्ज्ञेयं for (ज्ञाता ज्ञेयं)
२. (घ) १. अस्तांतर (ग) for (अस्तांतर्) २. मध्यगतिं (च) (ङ) for (मध्यगति)
(ग) ३. युगम (ङ) for (ग्रहभ) ४. नानयति (च) (ङ) for (ननयति)
५. ततः (ङ) for (तया) (वि०—इसकी क्रम संख्या १ लिखी है)
(च) १. अस्तांतर घटिकाभिर्यो (ङ) for (अस्तांतर्घटिकाभिर्यो)
(ङ) ६. ज्ञाताज्ज्ञेय for (ज्ञाताज्ज्ञेय)
३. (घ) १. दीपाक्चे क्वच्यतलात् (ग) दीपक शिखोन्याः for (दिपकौच्च्यतलात्)
(ग) २. भूमि (ङ) for (भूमिं) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २ लिखी है)
(ङ) १. दीपकशिखोच्च्यात् for (दिपकौच्च्यतलात्)
४. (घ) १. छायाद्वितया (ग) for (छायाद्वितीया)
२. भूमिदीपोच्च्ये (ग) दीप्त्यौच्च्ये for (दीपोच्च्ये)
(ग) ३. परभूमेच्छायां for (यच्छायाैच्च्ये) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ५ है)
(च) १. द्वितया for (द्वितीया)
(ङ) १. छायाद्वितीयभाग्रान्तर for (छायाद्वितीयाग्रांतर)
४. विज्ञानेन for (विज्ञाने) २. दीपोच्च्यम् for (दीपोच्च्ये)
५. शङ्कुच्छायाज्ञो for (शंकुच्छायाज्ञो) ३. भूमेश्च्छायां for (यच्छायाैच्च्ये)
Page 652Permalink

( २६८ )
दृष्टि⁴ गृहौच्च्यज्ञो यः स्तदन्तरज्ञो⁶ नराक्रते¹ तुजले² ।
गृहभित्यग्रे³ दर्शयति दर्पणे⁵ वा स तंत्रज्ञः ॥ ५ ॥
हग्ग्रहतलांतरजले¹ यो⁴ दृष्ट्वाग्रं⁵ गृहस्य² भूमिज्ञः ।
वेत्ति गृहौच्च्यं³ दृष्ट्वा तैलस्थं वा⁶ स तंत्रज्ञः ॥ ६ ॥
वीक्ष्य⁶ गृहाग्रं¹ सलिले प्रसार्य सलिलं पुनश्चभूज्ञाने⁴ ।
आनयति जलाद्भू²मि गृहस्य³ चौच्च्यं⁵ स तंत्रज्ञः ॥ ७ ॥
ज्ञातै⁴ छाया पूरुषे⁵ विज्ञातै⁶ तोय कुद्ययो¹ विवरे ।
कुद्देर्कं² तेजसो यो वेत्थारूढेः³ स तंत्रज्ञः ॥८॥

५. (घ) १. नरात्कृते (ग) for (नराक्रते) २. तु (ग) (ङ) for (तु)
३. गृहभित्यगं (ग) गृहभित्यग्र (ङ) for (ग्रहभित्यग्रे )
(ग) ४. इष्टग्रहौच्च्यज्ञो for (दृष्टिगृहौच्च्यज्ञो) ५. दर्पणो (ङ) for (दर्पणे)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ४ है)
(च) १. नराकृते for (नराक्रते)
(ङ) ४. इष्टगृहौच्च्यज्ञो for (दृष्टिगृहौच्च्यज्ञो) ६. यस्तदन्तरज्ञो for (यः स्तदंतरज्ञो)
१. निरीक्ष्यते for (नराक्रते)
६. (घ) १. नृगृह हग्ग्रहनलांतर (ङ) for (हग्ग्रह तलांतर)
२. गृहस्य (ग) (च) (ङ) for (ग्रहस्य)
३. गृहोच्च्यं (ग) गृहौच्च्यं (च) (ङ) for (गृहौच्च्यं)
(ग) ४. जलयो for (जले यो) ५. दृष्ट्वाग्रं (ङ) for (दृष्ट्वाग्रं )
६. व for (वा)
(च) १. दृग्ग्रहतलांतर for (हग्ग्रहतलांतर)
(ङ) १. दृष्ट्वा गृहतलान्तर for (हग्ग्रहतलांतर) ४. जालभो for (जले यो)
७. (घ) १. गृहाग्रं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं) २. भूमिं (ग) (च) (ङ) for (भूमि)
३. गृहस्य (ग) (च) (ङ) for (ग्रहस्य)
(ग) ४. पुनः स्वभूज्ञाने (ङ) for (पुनश्च भू ज्ञाने) ५. वोच्च्यं for (चौच्च्यं)
(ङ) ६. वीक्ष्य for (वीक्ष)
८. (घ) १. कुडद्ययोर्विवरे (ङ) for (कुद्ययोर्विवरे)
२. कुडद्येऽर्कं (ग) कुधेर्का for (कुद्देर्कं)
३. वेत्त्यारूढिं (ग) वेत्त्यारूढेः for (वेत्थारूढः) (ग) ४. ज्ञाते for (ज्ञातै)
५. पुरुषे (ङ) for (पूरुषे) ६. विज्ञाते for (विज्ञातै)
(च) १. कुडद्ययो for (कुद्ययो) २. कुद्देऽर्कं for (कुद्देर्कं)
(ङ) १. ज्ञातैश्छाया for (ज्ञातै छाया)
२. कुडद्ये ऽर्क for (कुद्देर्क) ३. वेत्यारूढ़ि for (वेत्थारूढः)
Page 653Permalink

( २६६ )
इष्ट दिवसाद्धं घटिका घटिका च ^१द^२शकांतंर प्राणाः ।
तद्दिवसचरप्राणास्तैरक्षं साधयेत्प्राग्वत्^३ ॥ ६ ॥
ज्ञातः सार्द्धा उदयैरस्तांतरनाडिकाभिरधिको नः ।
ज्ञातात्पूर्वापरयोर्ज्ञेयो ^२भार्द्धोनके ^३ज्ञयः ॥ १० ॥
^२ज्ञात^३ज्ञेयग्रहयोरुदयंतरनाडिकाभिरधिकोनः^४ ।
उदयैर्ज्ञातो^५ ज्ञाताज्ञेये^६ प्रागधरयोर्ज्ञेयः^७ ॥ ११ ॥
ज्ञातं कृत्वा मध्यं भूयोन्यदिने तदंतरं भुक्तिः ।
त्रैराशिकेन मुत्तचा^१ कल्पग्रहमंडलानयनम् ॥ १२ ॥
स्थित्यर्द्धाद्विपरीतं तमः प्रमाणं स्फुटं ग्रहणे^१ ।
मानोदयाद्र्वौद्धोर्घटिकावयवेन भोदयतः ॥ १३ ॥

६. (घ) १. पंचदशकांतंर for (चदशकांतंर)
(ग) २. दशांतर for (दशकांतंर)
३. प्रास्नात् for (प्राग्वत्)
(ङ) शी० + अथोत्तराणि +
१. २. पंचदशांतंर for (चदशकांतंर)
१०. (च) (वि०— यह श्लोक यहां ११ वीं क्रमसंख्या पर अंकित है)
१. ज्ञेये for (ज्ञेयो) २. भार्द्धोनको for (भार्द्धोनके)
३. ज्ञेयः (ङ) for (ज्ञयः)
(ङ) (वि०— यहां इसकी क्रमसंख्या ११ है)
११. (घ) १. परयो for (धरयो) (ग) प्रागंपरो for (प्रागधरयो)
(ग) २. स्थान रिक्त है, ३. 'ज्ञेय' अक्षर लुप्त है ४. नम् for (नः)
५. ज्ञातो for (ज्ञांतो) ६. ज्ञाताज्ञेय for (ज्ञाताज्ञेये)
७. ज्ञेयः for (ज्ञैयः)
(वि०— इसकी क्रमसंख्या १० है)
(च) १. प्रागपरयो for (प्रागधरयो)
८. (वि०— इसकी क्रमसंख्या १० अंकित है)
(ङ) ६. ज्ञाताज्ज्ञेयः for (ज्ञाताज्ञेये)
१२. (घ) १. भुत्तचा (ग) (च) (ङ) for (मुत्तचा)
१३. (घ) १. शशिग्रहणे for (स्फुटं ग्रहणे)
Page 654Permalink

तातदन्तर" - "हता तदन्तर". If the variant connects them as "हन्तर"?
Wait, look at the letter: it's definitely 'ह' (हन्तर)!
Wait, look at footnote: "५. हन्तर for (तदन्तर)". Yes, it is हन्तर!

Line-by-line mapping:
( २७० )
दीपफलशंकुतलयोरंतरमिष्टप्रमाणशंकुगुणम् । (Wait, दीपफल or दीपफल? No, दीप"तल"! दीप-तल-शंकु-तलयोः. Yes, दीपफल? No, दीप-त-ल! It's दीप-तल: दी, प, त, ल).
दीपशिखौ⁴च्याच्छं¹कुं विशोध्य शेषो²द्धृतं छाया³ ॥ १४ ॥
शंकुवंतरेण गुणिता छाया छायांतरेण भक्ता भूः ।
स³ छाया शंकुगुणा दीपोच्च्यं¹ छायाया भक्ता² ॥ १५ ॥
ज्ञात्वा शंकुच्छाया³ मनुपातात्²साधयेत्समुच्छ्रायान्⁴ ।
गृहचैत्यतरु नगानामौच्च्यं⁵ विज्ञायव¹च्छायाम् ॥ १६ ॥
दृष्टि⁴ गृहौच्च्यैवच¹ हतातदन्तर⁵धरादगौच्च्य² गुणि

Page 655Permalink

(ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं)? No, the first word is the variant from (ग) (च) (ङ)! Wait: २. गृहाग्रं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं)? Wait, look at line 2 of the text: Does it say गृहाग्रंorग्रहाग्रं? Look at the foot of 'ग' in line 2: it has ृ! So it is गृहाग्रं! Wait, then what is in parentheses? for (ग्रहाग्रं)! Why would the footnote say that? Wait, in some editions: variant_reading (manuscripts) for (text_reading)ORmanuscript_reading for (base_text)? Look at footnote 20: ८. च्छिन्नं for (छिन्नं)-> in main text, is itच्छिन्नंorछिन्नं? Main text: छाया पुरुषच्छिन्नं! Look at it: it has च्छि! Wait! It has च्छिin the main text! And in parentheses in the footnote is(छिन्नं)! Look at line 20: २. कुडचान्तर for (कुधांतर)-> in main text, it isकुधांतरं! Look at footnote: for