संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७०- दधीचिका योगद्वारा प्राण-त्याग
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
हड्डियोंमें मिल गये हैं। अतः उन हड्डियोंको ही ले जाओ।' उस समय प्रिय वचन बोलनेवाली दधीचिकी पत्नी प्रातिथेयी उनके पास नहीं थीं। देवता उनसे बहुत डरते थे। उन्हें न देखकर दधीचिसे बोले—'विप्रवर! जो कुछ करना हो, शीघ्र करें।' दधीचिने अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग करते हुए कहा—'देवताओ! तुम सुखपूर्वक मेरा शरीर ले लो। मेरी हड्डियोंसे प्रसन्नता प्राप्त करो। मुझे इस देहसे क्या काम है।'
यों कहकर दधीचि पद्मासन बाँधकर बैठ गये। उनकी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर स्थिर हो गयी। मुखपर प्रकाश और प्रसन्नता विराज रही थी। उन्होंने हृदयाकाशमें स्थित अग्निसहित वायुको धीरे-धीरे ऊपरकी ओर उठाकर अप्रमेय परम पद ब्रह्मके स्वरूपमें स्थापित कर दिया। इस प्रकार महात्मा दधीचिने ब्रह्मसायुज्य प्राप्त किया। उनका शरीर निष्प्राण हो गया। यह देख
देवताओंने विश्वकर्मासे उतावलीपूर्वक कहा—'अब आप अभी बहुत-से अस्त्र-शस्त्र बना डालिये।' विश्वकर्माने कहा—'देवताओ! यह ब्राह्मणका शरीर है। मैं इसका उपयोग कैसे करूँ। जब केवल इनकी हड्डियाँ रह जायेंगी, तभी उनका अस्त्रनिर्माण करूँगा।' तब देवताओंने गौओंसे कहा—'हम तुम्हारा मुख वज्रके समान किये देते हैं। तुम हमारे हितके लिये अस्त्र-शस्त्र निर्माण करनेके उद्देश्यसे दधीचिके शरीरको क्षणभरमें विदीर्ण कर डालो और शुद्ध हड्डियाँ निकालकर दे दो।' देवताओंके आदेशसे गौओंने वैसा ही किया। उन्होंने दधीचिके शरीरको चाट-चाटकर हड्डियाँ निकाल लीं और देवताओंको दे दीं। देवता उत्साहके साथ अपने लोकमें चले गये और गौएँ भी अपने स्थानको लौट गयीं।
तदनन्तर बहुत देरके बाद दधीचिकी सुशीला पत्नी हाथमें जलसे भरा हुआ कलश ले फल और फूलोंसे पार्वती देवीकी अर्चना और वन्दना करके अग्नि, पति तथा आश्रमके दर्शनकी उत्सुकतासे शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाती हुई आयीं। उस समय उनके गर्भमें बालक आ गया था। आश्रमपर पहुँचनेपर जब उन्होंने अपने स्वामीको नहीं देखा, तब बड़े विस्मयमें पड़कर अग्निसे पूछा—'मेरे पतिदेव कहाँ चले गये?' अग्निने जो कुछ हुआ था, सब सुना दिया। पतिकी मृत्युका दुःखद समाचार सुनकर वे दुःख और उद्वेगसे पृथ्वीपर गिर पड़ीं। उस समय अग्निदेवने ही उन्हें धीरे-धीरे आश्वासन दिया।
प्रातिथेयी बोलीं—मैं देवताओंको शाप देनेमें समर्थ नहीं हूँ, अतः स्वयं ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। अब जीवन रखकर क्या होगा। संसारमें जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह सब नश्वर है; अतः उसके लिये शोक नहीं होना चाहिये। परंतु मनुष्योंमें वे ही पुण्यके भागी होते हैं जो गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका