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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

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६१८ । भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

वायुके द्वारा गर्भाशय अथवा गर्भस्थ सन्तानके शुष्क होजानेपर मिश्री, मुलहठी, कुम्भीर इनके साथ दूधको पकाकर गर्भिणीको पान कराना चाहिये ॥ १७ ॥

शिरोगत-वातकी चिकित्सा।

शिरोगतेऽनिले वातशिरोरोगहरी क्रिया ॥ १८ ॥
शिरमें वातरोग होनेपर वातज शिरोरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १८ ॥

व्यादितकी चिकित्सा।

व्यादितास्ये हनुं स्विन्नमङ्गुष्ठाभ्यां प्रपीड्य च ।
प्रदेशिनीभ्यां चोन्नम्य चिबुकोन्नमनं हितम् ॥ १९ ॥
वातरोगमें मुखके फैलजानेपर गण्डस्थलोंमें स्वेद देकर अँगूठोंके द्वारा ठोडीको दबावे फिर तर्जनी और मध्यमा अँगुलीयोंके द्वारा ठोडीको ऊपरको उठावे। इस प्रकार करनेसे मुखका विकृतभाव दूर होताहै ॥ १९ ॥

अर्दितकी चिकित्सा।

रसोनकल्कं नवनीतमिश्रं खादेन्नरो योऽर्दितरोगयुक्तः ।
तस्यार्दितं नाशयतीह शीघ्रं वृन्दं घनानामिव मातरिश्वा ॥
यदि अर्दितरोगी लहसुनके कल्कको नैनीघीमें मिलाकर सेवन करे तो उसका अर्दितरोग इस प्रकार शीघ्र नाश होजाता है, जैसे वायुका वेग मेघोंके समूहको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ २० ॥

अर्दिते नवनीतेन खादेन्माषण्डरीं नरः ।
क्षीरमांसरसैर्भुक्त्वा दशमूलीरसं पिबेत् ॥ २१ ॥
अर्दितरोगमें नैनीघीके साथ उडदकी बाडियें भक्षण करे। पश्चात् दूध और मांस-रसके साथ भोजन करके दशमूलका क्वाथ पान करे ॥ २१ ॥

स्वेदाभ्यङ्गशिरोवस्तिपाननस्यपरायणः ।
अर्दितं सजयेत्सर्पिः पिबेदौत्तरभक्तिकम् ॥ २२ ॥
अर्दितरोगमें स्वेद, तैलमर्दन, घृतपान, शिरोवस्ति और नस्य इन क्रियाओंका यथाविधि प्रयोग कर भोजनके बाद घृत पान करानेसे अर्दितरोग नष्ट हो ॥

मन्यास्तम्भकी चिकित्सा।

पञ्चमूलीकृतः क्वाथो दशमूलीकृतोऽथवा ।
रूक्षः स्वेदस्तथा नस्यं मन्यास्तम्भे प्रशस्यते ॥ २३ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६१९

मन्यास्तम्भरोगमें बृहत्पञ्चमूल अथवा दशमूलका क्वाथ पान करना एवं रूक्ष स्वेद और नस्य देना चाहिये ॥ २३ ॥

ग्रीवास्तम्भकी चिकित्सा ।

कटुतैलेनाभ्यक्ते लिप्ते कल्केन वाजिगन्धायाः ।
शाम्येद्ग्रीवास्तम्भशूलं महदप्यनायासम् ॥ २४ ॥

कडुवे तेलकी मालिश और असगन्धकी जडको पानीमें पीसकर लेप करनेसे अत्यन्त प्रबल ग्रीवास्तम्भकी शूलभी सहजमें ही दूर होजाता है ॥ २४ ॥

जिह्वास्तम्भकी चिकित्सा ।

वाताद् वाग्धमनीदुष्टौ स्नेहगण्डूषधारणम् ॥ २५ ॥

वायुसे वाणीको बहानेवाली नाडीके विकृत होजानेपर वातनाशक तेल अथवा घृतके गण्डूषधारण करने चाहिये ॥ २५ ॥

कुब्जकी चिकित्सा ।

वातघ्नैर्दशमूल्या च नरं कुब्जमुपाचरेत् ।
स्नेहैर्मांसरसैर्वापि प्रवृद्धं तं विवर्जयेत् ॥ २६ ॥

वायुके द्वारा मनुष्यके शरीरमें कुब्ज (कुबडापन) होजानेपर वातनाशक भद्रदार्वादिगणकी ओषधियोंका क्वाथ या दशमूलका क्वाथ अथवा वातनाशक तैल घृतादि और मांसरस सेवन आदि उपचार करे । किन्तु बहुत पुराने स्थायी कुब्जको असाध्य जानकर छोडदेवे ॥ २६ ॥

आध्मानकी चिकित्सा ।

आध्माने लंघनं पाणितापश्च फलवर्त्तयः ।
दीपनं पाचनं चैव बस्तिश्चाप्यत्र शोधनः ॥ २७ ॥

आध्मान (अफारा) रोगमें लंघन करना; हाथको अग्निपर तपाकर स्वेद देना, फलवर्त्ति क्रिया, अग्निदीपक और पाचक ओषधियोंको प्रयोग करनी और वस्तिक्रिया करनी चाहिये ॥ २७ ॥

अष्ठीला और प्रत्यष्ठीलाकी चिकित्सा ।

प्रत्यष्ठीलाष्ठीलिकयोरन्तर्विद्रधिगुल्मवत् ॥ २८ ॥

अष्ठीला, प्रत्यष्ठीलारोगमें अन्तर्विद्रधि और गुल्मरोगकी समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २८ ॥

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६२०भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

गृध्रसीकी चिकित्सा ।

तैलमेरण्डजं वापि गोमूत्रेण पिबेन्नरः ।
मासमेकं प्रयोगोऽयं गृध्रस्यूरुग्रहापहः ॥ २९ ॥
अण्डीके तेलको गोमूत्रके साथ एक महीनेतक सेवन करनेसे गृध्रसी और ऊरुस्तम्भ दूर होता है ॥ २९ ॥

शेफालिकादलक्वाथो मृद्वग्निपरिसाधितः ।
दुर्वारं गृध्रसीरोगं पीतमात्रं समुद्धरेत् ॥ ३० ॥
मन्दमन्द अग्निके द्वारा सिद्ध किया हुआ निर्गुण्डीके पत्तोंका क्वाथ पान करतेहीं दुस्साध्य गृध्रसीरोगको नष्ट करता है ॥ ३० ॥

पिष्टैरण्डफलं क्षीरे सविश्वं वा फलं रुबोः।
पायसो भक्षितः सिद्धो गृध्रसीकटिशूलनुत् ॥ ३१ ॥
छिलकेरहित अण्डके बीजोंको पीसकर अथवा अण्डके बीज और सोंठको एकत्र पीसकर उनकी दूधमें खीर बनाकर भक्षण करनेसे गृध्रसी और कमरका शूल नष्ट होता है । ( इसमें अण्डके बीजोसे चौगुने चावल और चावलोंसे चौगुना दूध लेना चाहिये ) ॥ ३१ ॥

वातकण्टककी चिकित्सा ।

रक्तावसेचनं कार्य्यमभीक्ष्णं वातकण्टके ।
पिबेदेरण्डतैलं वा दहेत्सूचीभिरेव वा ॥ ३२ ॥
वातकण्टकरोगमें बारंबार रक्तमोक्षण करावे अथवा अण्डीके तेलका पान करें या गरम सुईके द्वारा व्याधिस्थानको दग्ध करे ॥ ३२ ॥

खल्लीकी चिकित्सा ।

खल्व्यां स्निग्धाम्ललवणैः स्वेदोन्मर्दपनाहनम् ॥ ३३ ॥
स्निग्ध, अम्ल और लवणयुक्त द्रव्योंके द्वारा स्वेद देना, मर्दन और प्रलेप करना आदि क्रियायें खल्ली ( एक प्रकारका कम्प ) रोगमें उपयोगी हैं ॥ ३३ ॥

शिराग्रहकी चिकित्सा ।

शिराग्रहे तु कर्त्तव्या शिरागतमरुत्क्रिया ।
दशमूलीकषायेण मातुलुङ्गरसेन च ॥
शृतेन तैलेनाभ्यङ्गः शिरोबस्तिश्च युज्यते ॥ ३४ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२१


शिराग्रहरोगमें शिराओंमें स्थित वायुकी वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये एवं दशमूलके क्वाथ और बिजौरे नींबूके रसकें साथ पकायेहुए तेलकी मालिश करना और शिरमें वस्ति ( पिचकारी ) का प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४ ॥

अपतानककी चिकित्सा ।

अथापतानकेनार्त्तमस्रुताक्षमवेपनम् ।
अखट्वापातिनं चैव त्वरया समुपाचरेत् ॥ ३५ ॥

अपतानकरोगसे आक्रान्त रोगीकी जिसके नेत्रोंमें आँसू न निकले हों, शरीरमें कम्प न हुआ हो और वह खाटपर न पडा हो तो उसकी बहुत शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिये । कारण, चिकित्सा में देर करनेसे रोग असाध्य होता है ॥ ३५ ॥

पक्षाघातकी चिकित्सा ।

पक्षाघातसमाक्रान्तं सुतीक्ष्णैश्च विरेचनैः ।
शोधयेद्वस्तिभिश्चापि व्याधिरेवं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥

पक्षाघातवाले रोगीको तीक्ष्ण औषधियोंके द्वारा विरेचन कराकर और वस्ति-क्रियाके द्वारा शोधन करे । इस प्रकार करनेसे रोग शमन होता है ॥ ३६ ॥

दशमूलीबलामाषक्वाथं तैलाज्यमिश्रितम् ।
सायं भुक्त्वा पिबेन्नस्यं विश्वाच्यामवबाहुके ॥ ३७ ॥

विश्वाची और अवबाहुक रोगमें दशमूल, खिरेंटी और उडंद इनके क्वाथको तिलका तैल और घी मिलाकर शामको भोजन करनेकें पश्चात् नासिका द्वारा पान करे ॥ ३७ ॥

अपतन्त्रककी चिकित्सा ।

अथापतन्त्रकेनार्त्तमातुरं नापतर्पयेत् ।
निरूहवस्तिवमनं सेवयेन्न कदाचन ॥ ३८ ॥
श्वसनाः कफवाताभ्यां रुद्धास्तस्य विमोक्षयेत् ।
तीक्ष्णैः प्रधमनैः संज्ञां तासु मुक्तासु विन्दति ॥ ३९ ॥

अपतन्त्रकरोगसे ग्रसित रोगीको लङ्घन, निरूहवस्ति और वमन कदापि नहीं करानी चाहिये । इसमें कफ और वायुके द्वारा श्वास प्रश्वासको बहानेवाली सब नाडियें रुक जाती हैं, इसलिये तीक्ष्ण प्रधमन क्रिया करके उनको खोलदेवे । नाडियोंके खुलजानेपर रोगी चैतन्यताको प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥

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६२२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

खञ्ज और पंगुताकी चिकित्सा ।

उपाचरेदभिनवं खञ्जं पङ्गुमथापि वा ।
विरेकास्थापनस्वेदगुग्गुलुस्नेहवस्तिभिः ॥ ४० ॥
विरेचन, निरूहवस्ति, स्वेद, गूगल और स्नेहवस्ति इन क्रियाओंके द्वारा नवीन खञ्ज और पंगु रोगीकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४० ॥

क्रोष्टुशीर्षकी चिकित्सा ।

गुग्गुलुं क्रोष्टुशीर्षे तु गुडूचीत्रिफलाम्भसा ।
क्षीरेणैरण्डतैलं वा पिबेद्वा वृद्धदारकम् ॥ ४१ ॥
रसैस्तित्तिरिमांसस्य पीतैर्गुग्गुलुसंयुतैः ।
वातरक्तक्रियाभिश्च जयेज्जम्बुकमस्तकम् ॥ ४२ ॥
क्रोष्टुशीर्ष वातरोगमें गिलोय और त्रिफलेके क्वाथके साथ शुद्ध गूगल या गौके दूधके साथ अण्डीका तैल अथवा दूधके साथ विधारेका चूर्ण सेवन करना चाहिये । तीतरके मांसरसके साथ गूगलको मिलाकर पान करनेसे और वातरक्ताधिकारमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनेसे क्रोष्टुशीर्ष रोग नष्ट होता है ॥ ४१ ॥ ॥ ४२ ॥

कलायखञ्जकी चिकित्सा ।

क्रमः कलायखञ्जस्य खञ्जपङ्ग्वोरिव स्मृतः ।
विशेषात्स्नेहनं कर्म कार्यमत्र विचक्षणैः ॥ ४३ ॥
खञ्ज और पंगुरोगकी समान कलायखञ्जरोगकी चिकित्सा करनी । इसमें विशेषकर स्नेहकर्म अर्थात् वातनाशक तैल घृतादिका मर्दन व पान करना ॥ ४३ ॥

बाह्यान्तरायामकी चिकित्सा ।

बाह्यायामेऽन्तरायामे विधेयाऽर्दितवत्क्रिया ॥ ४४ ॥
बाह्यायाम और अन्तरायामरोगमें अर्दितरोगकी समान चिकित्सा करनी ॥ ४४ ॥

त्रिकशूलकी चिकित्सा ।

कारयेद्वालुकास्वेदं त्रिकशूले प्रयत्नतः ।
यद्वाऽधस्तात्करीषाग्निं धारयेत्सततं नरः ॥ ४५ ॥
त्रिकशूलरोगमें बालूके द्वारा विधिपूर्वक स्वेद देवे अथवा कमरके नीचे आरने उपलोंकी अग्निको रखकर बार बार सेंके ॥ ४५ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२३


पाददाहकी चिकित्सा ।

वातरक्तक्रमं कुर्यात्पाददाहे विशेषतः ।
मसूरविदलैः पिष्टैः शृतशीतेन वारिणा ॥ ४६ ॥
चरणौ लेपयेत्सम्यक् पाददाहप्रशान्तये ।
नवनीतेन संलिप्तौ वह्निना परितापितौ ॥
मुच्येते चरणौ क्षिप्रं परितापात्सुदारुणात् ॥ ४७ ॥

पाददाहरोगमें विशेषकर वातरक्तकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । मसूरकी दालको पीसकर जलके साथ पकाकर शीतल होजानेपर पैरोंमें लेप करनेसे पावोंकी दाह शान्त होती है । अथवा पाँवोंमें नैनी घी लगाकर अग्निपर तपानेसे पैरोंकी दारुण दाह शीघ्र दूर होती है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥

पादहर्षकी चिकित्सा ।

पादहर्षे तु कर्तव्यः कफवातहरो विधिः ॥ ४८ ॥

पादहर्षरोगमें कफ और वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४८ ॥

दशमूलादिक्वाथ ।

दशमूलीकृतः क्वाथः पञ्चमूल्याऽपि कल्पितः ।
मन्यास्तम्भं निहन्त्याशु कम्पवातं विशेषतः ॥ ४९ ॥

दशमूल अथवा बृहत् पञ्चमूलका काढा बनाकर पान करनेसे मन्यास्तम्भ रोग और विशेषकर कम्पवातरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ४९ ॥

बलादिक्वाथ ।

बलामूलशृतं तोयं सैन्धवेन समन्वितम् ।
बाहुशोषकरे वाते मन्यास्तम्भे च शस्यते ॥ ५० ॥

बाहुशोष और मन्यास्तम्भ वातरोगमें खिरेंटीकी जडका क्वाथ बनाकर उसको सैन्धानमकके साथ सेवन करना चाहिये ॥ ५० ॥

एरण्डादिक्वाथ ।

एरण्डमूलं बिल्वं च बृहती कण्टकारिका ।
कषायो रुचकोपेतः पीतो वङ्क्षणवस्तिजम् ॥
गृध्रसीजं हरेच्छूलं चिरकालानुबन्धि च ॥ ५१ ॥

अण्डकी जडकी छाल, बेलकी छाल, बडी कटेरी और कटेरी इनके काढेमें काला-नमक डालकर पान करनेसे वंक्षण और वस्तिगत शूल और पुरानी गृध्रसीका शूलरोग दूर होता है ॥ ५१ ॥

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६२४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

सिंहास्यादिक्वाथ ।

सिंहास्यदन्तीकृतमालकानां पिबेत्कषायं रुबुतैलमिश्रम् ।
यो गृध्रसीनष्टगतिः प्रसुप्तः स शीघ्रगः स्याद्धि किमत्र चित्रम्॥
जो गृध्रसीरोगीकी गतिशक्ति नष्ट होगई हो और जडता होगई हो तो उसको अडूसा, दन्तीकी जड और अमलतास इनका क्वाथ अण्डीका तेल मिलाकर पान कराना चाहिये इससे रोगी शीघ्र चलने लगता है ॥ ५२ ॥

रास्नासप्तकक्वाथ ।

रास्नामृतारग्वधदेवदारुत्रिकण्टकैरण्डपुनर्नवानाम् ।
क्वाथं पिबेन्नागरचूर्णमिश्रं जंघोरुपृष्ठत्रिकपार्श्वशूली ॥५३॥
रायसन, गिलोय, अमलतास, देवदारु, गोखुरू, अण्डकी जड और पुनर्नवा इनके मन्दोष्ण क्वाथको सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे जङ्घा, ऊरु, पीठ, त्रिक और पार्श्वशूलवाला रोगी आरोग्य होता है ॥ ५३ ॥

माषादिक्वाथ ।

माषात्मगुप्तावातारिव्याघ्रकजटाशृतम् ।
हिङ्गुसैन्धवसंयुक्तं पक्षाघातं विनाशयेत् ॥ ५४ ॥
उडद, कौंचके बीज, एरण्डमूल, खिरैंटी और बालछड इनके क्वाथमें हींग और सेंधानमक डालकर पीनेसे पक्षाघात रोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥

गोक्षुरादिक्वाथ ।

गोक्षरमेरण्डमूलं वचा रास्ना पुनर्नवा ।
कषाय एष शस्तस्तु वाते सर्वाङ्गमाश्रिते ॥ ५५ ॥
गोखुरू, अण्डकी जड, वच, रायसन और पुनर्नवा इनका क्वाथ सर्वाङ्गगत वातरोगमें हितकारी है ॥ ५५ ॥

माषबलादिक्वाथ ।

माषबलाशुकशिम्बीकत्तृणरास्नाश्वगन्धोरुबूकानाम् ।
क्वाथो यस्य निपीतो रामठलवणान्वितः कोष्णः ॥
अपहरति पक्षाघातं मन्यास्तम्भं सकर्णनादरुजम् ।
दुर्जयमर्दितवातं सप्ताहाज्जयति चावश्यम् ॥ ५६ ॥
उडद, खिरैंटीकी जड, कौंचके बीज, रोहिषतृण, रायसन, असगन्ध और अण्डकी जड इनके मन्दोष्ण क्वाथको हींग और सेंधानमक मिलाकर पान

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२५


करनेसे पक्षाघात, मन्यास्तम्भ, कर्णरोग और दुस्साध्य अर्दितरोग सात दिनमेंही अवश्य नाश होता है ॥ ५६ ॥

कल्याणलेह ।

सहरिद्रा वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।
अजाजी चाजमोदा च यष्टीमधुकसैन्धवम् ॥ ५७ ॥
एतानि श्लक्ष्णचूर्णानि समभागानि कारयेत् ।
तच्चूर्णं सर्पिषाऽऽलोड्यं प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ५८ ॥
एकविंशतिरात्रेण नरः श्रुतिधरो भवेत् ।
मेघदुन्दुभिनिर्घोषो मत्तकोकिलनिस्वनः ॥
जडगद्गदमूकत्वं लेहः कल्याणको जयेत् ॥ ५९ ॥

हल्दी, वच, कूट, पीपल, सोंठ, कालाजीग, अजमोद, मुलहठी और सैंधानमक इन सबको समान भाग लेकर बारीक पीसकर वस्त्रमें छानलेवे । इस चूर्णको घीमें मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करनेसे मनुष्य इक्कीस दिनमें सुनतेही बातको धारण करता है । मेघ और दुन्दुभीकी समान घोर शब्द करनेवाला और मदोन्मत्त कोयलकी समान कण्ठस्वरवाला होता है । यह कल्याण लेह जिह्वाकी जडता गद्गद्-पन और मूकताको दूर करता है ॥ ५७–५९ ॥

शाल्वणस्वेद ।

काकोल्यादिः सवातघ्नः सर्वाम्लद्रव्यसंयुतः ।
सानूपमांसः सुस्विन्नः सर्वस्नेहसमन्वितः ॥ ६० ॥
सुखोष्णः स्पष्टलवणः शाल्वणः परिकीर्त्तितः ।
तेनोपनाहं कुर्वीत सर्वदा वातरोगिणाम् ॥ ६१ ॥

काकोल्यादिगणकी समस्त ओषधि, भद्रदार्वादिगणकी सब ओषधि, सर्व प्रकार के अम्लपदार्थ, सर्व प्रकारके स्नेह ( तैल, घृत, चर्बी, मज्जा ) द्रव्य और सर्व प्रकारके अनूपदेशके जीवोंका मांस इन सबको एकत्र उत्तम प्रकारसे पकावे फिर उसमें नमक डालकर उससे सुहाता २ स्वेद देनेको शाल्वणस्वेद कहते हैं । इसके द्वारा वातरोगियोंको सदा उपनाह स्वेद देना ॥ ६० ॥ ६१ ॥

वातघ्नो भद्रदार्वादिः काकोल्यादिस्तु सौश्रुतः ।
मांसेनात्रौषधं तुल्यं यावताऽम्लेन चाम्लता ॥ ६२ ॥

४०

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६२६ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

पट्टीस्यात्स्वेदनार्थं च काञ्जिकाद्यम्लमिष्यते ।
चतुःस्नेहोऽत्र तावान्स्यात्सुस्विन्नत्वं यतो भवेत् ॥ ६३ ॥
समस्तं वर्गमर्द्धं वा यथालाभमथापि वा ।
प्रयुञ्जीतेति वचनं सर्वत्र गणकर्मणि ॥ ६४ ॥

भद्रदार्वादिगण और काकोल्यादिगणकी ओषधियाँ वातनाशक हैं, यह सुश्रुतने कहा है। इसमें मांसकी बराबर सब ओषधियाँ जितने अम्लपदार्थोंके द्वारा अम्लता हो सके वह पट्टी स्वेद देनेके लिये ग्रहण करनी, काँजी आदि अम्लपदार्थ लेना। इसमें चारों स्नेहद्रव्य उतनेही लेने जितने द्रव्योंसे वह अच्छी तरह सीजजाय। सम्पूर्ण वर्गकी या आधे वर्गकी अथवा जितनी मिल सकें उतनी औषधियाँ लेनी चाहिये। यह वचन सब जगह गणकर्ममें प्रयोग करना ॥ ६३-६४ ॥

वातगजांकुश ।

मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् ।
पथ्या शृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थं च टङ्कणम् ॥ ६५ ॥
तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्य मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः ।
द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ६६ ॥
कणाचूर्णयुतं चैव जिङ्गीक्वाथं पिबेदनु ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६७ ॥
सप्ताहाद् गृध्रसीं हन्ति दारुणं सान्निपातिकम् ।
क्रोष्टुशीर्षकवातं चाप्यवबाहुकसंज्ञकम् ॥ ६८ ॥
मन्यास्तम्भमुरुस्तम्भं हनुस्तम्भं विनाशयेत् ।
पक्षाघातादिरोगेषु कथितः परमोत्तमः ॥ ६९ ॥

शुद्ध पारेकी भस्म, लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध गन्धक, हरताल, हरड; काकडासिंगी, शुद्ध मीठा तेलिया, सोंठ, पीपल, मिरच अरणी और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर मुण्डी और निर्गुण्डीके रसके साथ एक एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। सर्व प्रकारक वातरोगको शमन करनेके लिये इसकी प्रतिदिन एक एक गोली भक्षण करे और ऊपरसे पीपल का चूर्ण मिलाकर मंजीठके क्वाथको पीवे। यह वातगजांकुशरस साध्य व असाध्य सर्व प्रकारके वातरोगको तत्काल नष्ट करता है। एवं गृध्रसी

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२७

दारुण सन्निपात, क्रोष्टुशीर्षक, अवबाहुक, मन्यास्तम्भ और हनुस्तम्भ इन समस्त वातरोगोंको सात दिनमें ही नाश कर देता है। पक्षाघात आदि व्याधियोंमें यह अत्युत्तम कहागया है ॥ ६६-६९ ॥

बृहद्वातगजांकुश ।

सूताभ्रतीक्ष्णकान्तानि ताम्रतालकगन्धकम् ।
स्वर्णं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलं चाभया विषम्॥७०॥
पथ्या शृङ्गी पिप्पली च मरिचं टङ्कणं तथा ।
तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः ॥ ७१ ॥
द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु बृहद्वातगजाङ्कुशः ॥ ७२ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोह, ताँबा, हरताल इनकी भस्म, शुद्ध गन्धक, सुवर्णभस्म, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ, कायफल, शुद्ध मीठा तेलिया काकडासिङ्गी, पीपल, मिरच और सुहागा ये प्रत्येक एक एक भाग और हरड दो भाग लेकर सबको एकत्र मुण्डी और निर्गुण्डीके रसमें एक एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको सर्वप्रकारके वातरोगोंको शान्त करनेके लिये सेवन करे । बृहद्वातगजांकुशरस साध्य और असाध्य सम्पूर्ण वातविकारोंको शीघ्र नष्ट करताहै ॥ ७०-७२ ॥

महावातगजांकुश ।

मृताभ्रतीक्ष्णताम्रं च सूततालकगन्धकम् ।
भाङ्गीं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलं चाभया विषम् ॥७३॥
संपिष्य चपलाद्रावैर्निष्कैकां भक्षयेद्वटीम् ।
वातश्लेष्महरो ह्येष गुरुवातगजाङ्कुशः ॥ ७४ ॥

अभ्रकभस्म, लोहभस्म, ताम्रभस्म, शुद्ध पारा, हरताल, शुद्ध गन्धक, भारङ्गी, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ, कायफल, हरड और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समान भाग लेवे । फिर एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करे । यह महावातगजांकुश रस वात और कफसे उत्पन्न हुये सब रोगोंको दूर करता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥

लघुआनन्दरस ।

पारदं गन्धकं लौहमभ्रकं विषमेव च ।
समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्कणं तु चतुर्गुणम् ॥ ७५ ॥

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६२८भैषज्यरत्नावलो ![ वातव्याधि-

भृङ्गराजरसेनैव दातव्याः पञ्च भावनाः ।
तथा दाडिमतोयेन वटीं कुर्यात्समाहितः ॥
निहन्ति वातजात्रोगान्भ्रमदाहपुरःसरान् ॥ ७६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और शुद्ध मीठा तेलिया ये सब समान भाग काली मिरच अठगुनी और सुहागा चौगुना लेकर सबको एकत्र करके भाँगरेके रस और अनारके रसमें पाँच पाँच बार भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह रस सर्वप्रकारके वातरोग, भ्रम, दाह आदि उपद्रवोंको नष्ट करता है ॥७५ ॥ ७६ ॥

गगनादिवटी ।

मृतगगनरसार्कं मुण्डतीक्ष्णं सताप्यं सबलिसममिदं स्याद्यष्टितोयप्रपिष्टम् । तदनु सलिलजातैर्वासकैर्गोस्तनीभिर्मृदितमनु विदारीवारिणा घस्रमेकम् ॥ घृतमधुसहितेयं निष्कमात्रा वटीति क्षपयति गुरुवातं पित्तरोगं क्षयं च । भ्रममदकफशोषान्दाहतृष्णासमुत्थान् मलयजमिह पेयं चानुपैयं सचन्द्रम् ॥ ७७ ॥

अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, ताम्रभस्म, मण्डूरभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म और शुद्ध गन्धक इन प्रत्येक औषधिको समान भाग लेकर मुलहठीके क्वाथमें खरल करके फिर कमल, अडूसेके पत्ते, दाख और विदारीकन्दके रसमें क्रमसे एक एक दिनतक खरल कर सुखालेवे । फिर तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली घृत और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । औषध सेवन करनेके पश्चात् सफेद चन्दन, और; कपूरका अनुपान करे । यह वटी प्रबल वातरोग, पित्तके रोग, क्षय, भ्रम, मद, कफ, शोष, दाह और तृषासे उत्पन्न हुए सब विकारोंको दूर करती है ॥ ७७ ॥

कुब्जविनोद रस ।

रसगन्धौ समौ शुद्धौ चाभया तालकं तथा ।
विषं कटुकि व्योषं च बोलजैपालकौ समौ ॥ ७८ ॥
भृङ्गराजरसैर्मर्द्यं स्नुह्यर्कस्वरसैस्तथा ।
गुञ्जाद्वयं भक्षयेच्च हृच्छूलं पार्श्वशूलकम् ॥ ७९ ॥
आमवाताढ्यवातादीन् कटिशूलं च नाशयेत् ।
अग्निं च कुरुते दीप्तं स्थौल्यं चाप्यपकर्षति ॥ ८० ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । ६२९


शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरड, हरताल, शुद्ध मीठा तेलिया, कुटकी, सोंठ, मिरच, पीपल, बोल और जमालघोटा इन सबको समान भाग लेकर भाँगरके रस, थूहरके दूध और आकके दूधके साथ क्रमसे एकएक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसकी प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करनेसे हृदयका शूल, पसलीकी पीडा, आमवात आदि सर्वप्रकारके वातरोग और कमरकी पीडा नाश होती है। यह रस अग्निको अत्यन्त दीपन करता और स्थूलताको दूर करता है ॥७८-८०॥

सर्वाङ्गकम्पारिरस ।

मृतं सूतं मृतं ताम्रं मर्दयेत्कटुकद्रवैः ।
एकविंशतिवारं च शोष्यं पेष्यं पुनःपुनः ॥
चणमात्रा वटी भक्ष्या रसः सर्वाङ्गकम्पजित् ॥ ८१ ॥

शुद्ध पारे और ताँबेकी भस्मको समान भाग लेकर कुटकीके क्वाथमें इक्कीस बार भावना देकर सुखालेवे। फिर पीसकर इसकी चनेकी बराबर गोली बनाकर भक्षण करनेसे सर्वाङ्गगत कम्पवात नष्ट होता है ॥ ८१ ॥

चिन्तामणिरस ।

कर्षैकं रससिन्दूरं तत्समं मृतमभ्रकम् ।
तदर्द्धं मृतलौहं च स्वर्णं शाणं क्षिपेद् बुधः ॥ ८२ ॥
कन्यारसेन सम्मर्द्य गुञ्जामात्रां वटीं चरेत् ।
अनुपानादिकं दद्याद् बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ८३ ॥

रससिन्दूर और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक दो दो तोले, लोहभस्म एक तोला और सुवर्णभस्म ४ मासे इन सबको घीगुआरके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस वटीको दोषोंका बलाबल विचारकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करावे ॥ ८२ ॥ ८३ ॥

हन्ति श्लेष्मान्वितं वातं केवलं पित्तसंयुतम् ।
हृल्लासमरुचिं दाहं वान्तिं भ्रान्तिं शिरोग्रहम् ॥ ८४ ॥
प्रमेहं कर्णनादं च ज्वरगद्गदमूकताम् ।
बाधिर्यं गर्भिणीरोगमश्मरीं सूतिकामयम् ॥ ८५ ॥
प्रदरं सोमरोगं च यक्ष्माणं ज्वरमेव च ।
बलवर्णाग्निदः सम्यक् कान्तिपुष्टिप्रसाधकः ।
चिन्तामणिरसश्चायं चिन्तामणिरिवापरः ॥ ८६ ॥

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६३० भैषज्यरत्नावली। [ वातव्याधि -

यह चिन्तामणिनामक रस कफसहित वात, केवल वात और पित्तयुक्त वात, एवं हृल्लास, अरुचि, दाह, वमन, भ्रान्ति, शिरःपीडा, प्रमेह, कर्णनाद, ज्वर, गद्गदता, मूकता, बहरापन, गर्भिणीके रोग, पथरी, प्रसूतिरोग, प्रदर, सोमरोग, राजयक्ष्मा, और सर्वप्रकारके ज्वरको नष्ट करता है । एवं बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि, कान्ति और पुष्टिको उत्पन्न करनेवाला है । यह चिन्तामणिरस दूसरी चिन्तामणिकी समान है ॥ ८४-८६ ॥

चिन्तामणिचतुर्मुख ।

विशुद्धं रससिन्दूरं तदर्द्धं लोहमभ्रकम् ।
तदर्द्धं कनकं खल्वे कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ८७ ॥
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ निधापयेत् ।
त्रिदिनान्ते समुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ८८ ॥

शुद्ध रससिन्दूर दो तोले, लोहभस्म १ तोला, अभ्रकभस्म एक तोला और सुवर्णभस्म ६ मासे इन सबको एकत्र घीकुँआरके रसमें खरल करके अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंकी राशिमें रखदेवे । फिर तीन दिनके बाद निकालकर उसको सर्वप्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ८७-८८ ॥

एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुसंयुक्तम् ।
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ८९ ॥
अपस्मारं महोन्मादं रोगान् वातसमुद्भवान् ।
क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ९० ॥

इस उत्तम रसायनको अग्निका बलाबल विचारकर यथोचित मात्रासे त्रिफलेके रस और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वली और पलितरोग नाश होते हैं । एवं अपस्मार महोन्माद और वातजनित समस्त रोगोंको यह रस इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे इन्द्रका वज्र वृक्षको नाश करदेता है ॥ ८९ ॥ ९० ॥

बृहद्वातचिन्तामणि ।

भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं रौप्यमभ्रकम् ।
लौहात्पंच प्रवालं च मौक्तिकं त्रयसम्मितम् ॥ ९१ ॥
भस्मसूतं सप्तकं च कन्यारसविमर्दितम् ।
वल्लमात्रा वटी कार्या भिषग्भिः परियत्नतः ॥ ९२ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३१


यथाव्याध्यनुपानेन नाशयेद्रोगसङ्कुलम् ।
वातरोगं पित्तकृतं निहन्ति नात्र चिन्तनम् ॥ ९३ ॥
वृद्धोऽपि तरुणस्पर्शी कन्दर्पसमविक्रमः ।
दृष्टः सिद्धफलश्चायं वातचिन्तामणिस्त्विह ॥ ९४ ॥

सुवर्णभस्म ३ तोले, चाँदीकी भस्म दो तोले, अभ्रकभस्म दो तोले, लोहभस्म ५ तोले, मूँगेकी भस्म ५ तोले, मोतीकी भस्म ३ तोले और शुद्ध पारेकी भस्म ७ तोले इन सबको एकत्र घीकुँआरके रसमें खरल करके दो या डेढ़ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर रोगके अनुसार अनुपानके साथ इसको प्रतिदिन सेवन करनेसे समस्त रोगसमूह और पित्ताश्रित वातरोग निस्सन्देह नष्ट होते हैं। एवं वृद्ध पुरुषभी कामदेवकी समान पराक्रमशाली और तरुण होजाता है। यह वातचिन्तामणि रस वातरोगमें सिद्धफलका देनेवाला है ॥ ९१-९४ ॥

चतुर्मुखरस ।

रसगन्धकलौहाभ्रं समं सूताङ्घ्रि हेम च ।
सर्वं खल्लतले क्षिप्त्वा कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ९५ ॥
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् ।
संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ९६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म ये प्रत्येक एक एक ताला और सुवर्णभस्म तीन मासे लेकर सबको खरलमें एकत्र करके घीकुँआरके रसमें खरल करे। फिर गोलासा बनाकर उसको अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंकी राशिमें गाडदेवे। तीन दिनतक रखा रहनेके बाद उसको निकालकर सर्वप्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥

एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुयोजितम् ।
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ९७ ॥
क्षयमेकादशविधं पाण्डुरोगं प्रमेहकम् ।
कासं शूलं च मन्दाग्निं हिक्कां चैवाम्लपित्तकम् ॥ ९८ ॥
व्रणान्सर्वानाढ्यवातं विसर्पं विद्रधिं तथा ।
अपस्मारं महोन्मादं सर्वांशांसि त्वगामयान् ॥ ९९ ॥
क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमन्द्राशनिर्यथा ।
पौष्टिकं बल्यमायुष्यं स्त्रीणां प्रसवकारकम् ॥ १०० ॥

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६३२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

जगतां च हितार्थाय चतुर्मुखमुखोदितः ।
रसश्चतुर्मुखो नाम चतुर्मुख इवापरः ॥ १०१ ॥

इस उत्तम रसायनको प्रतिदिन जठराग्निके बलाबलके अनुसार उपयुक्त मात्रासे त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ सेवन करे, तो यह रस वली और पलितरोग, ग्यारह प्रकारका क्षय, पाण्डु, प्रमेह, खाँसी, शूल, मन्दाग्नि, हिचकी, अम्लपित्त, सर्वप्रकारके व्रण, आमवात, विसर्प, विद्रधि, मृगी, घोर उन्माद, सब प्रकारकी बवासीर, और त्वचाके समस्त रोग इन सबको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है, जैसे वज्र वृक्षको तत्काल नष्ट करदेता है। एवं यह अत्यन्त पौष्टिक, बलकारक, आयुवर्द्धक और स्त्रियोंके सन्तानोत्पत्ति करनेवाला है। इस रसको संसारके हितके लिये ब्रह्माजीने निर्माण किया है, इसलिये इसको चतुर्मुख रस कहते हैं। यह दूसरे ब्रह्मा की समान है ॥ ९७-१०१ ॥

लक्ष्मीविलासरस ।

पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ ।
बला नागबला भीरु विदारीकन्दमेव च ॥ १०२ ॥
कृष्णाधुस्तूरनिचुलं गोक्षुरवृद्धदारयोः ।
बीजं शक्राशनस्यापि जातीकोषफले तथा ॥ १०३ ॥
कर्पूरं चैव कर्षांशं श्लक्ष्णचूर्णं पृथक्पृथक् ।
गृहीत्वा चाष्टमांशेन स्वर्णं पर्णरसेन च ॥ १०४ ॥
वटिकां स्विन्नचणकप्रमाणां कारयेद्भिषक् ।
रसो लक्ष्मीविलासोऽयं पूर्ववद् गुणकारकः ॥ १०५ ॥

काली अभ्रककी भस्म ४ तोले, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक ये प्रत्येक एक एक तोला लेकर दोनोंकी कज्जली करलेवे। एवं खिरेंटी, गंगेरन, शतावर, विदारीकन्द, काला धतूरा, बेंत, गोखरू, विधारा, भाँगके बीज, जावित्री, जायफल और भीमसेनी-कपूर ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेकर सबका बारीक चूर्ण करलेवे। फिर समस्त चूर्णसे आठवाँ भाग स्वर्णभस्म लेकर सबको एकत्र पानके रसके साथ खरल करके सीजेहुए चनेकी बराबर गोलियाँ बनालवे। यह लक्ष्मीविलासरस पूर्वोक्त चतुर्मुखरसकी समानही गुण करनेवाला है ॥ १०२-१०५ ॥

योगेन्द्ररस ।

विशुद्धं रससिन्दूरं तदर्द्धं शुद्धहाटकम् ।
तत्समं कान्तलौहं च तत्समं चाभ्रमेव च ॥ १०६ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३३


विशुद्धं मौक्तिकं चैव वङ्गं च तत्समं मतम् ।
कुमारिकारसैर्भाव्यं धान्यराशौ दिनत्रयम् ॥ १०७ ॥
ततो रक्तिद्वयमितां वटीं कुर्याद्विचक्षणः ।
योगवाही रसो ह्येष सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १०८ ॥

शुद्ध रससिन्दूर २ तोले एवं सुवर्णभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मोतीकी भस्म और वङ्गभस्म इन सबको एक एक तोला लेकर घीकुँवारके रसमें खरल करके तीन दिनतक धानोंकी राशिमें रक्खे। फिर उसको निकालकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह योगवाही रस सर्व प्रकारके रोगोंको समूल नष्ट करता है ॥ १०६-१०८ ॥

वातपित्तभवान् रोगान्प्रमेहान्बहुमूत्रताम् ।
मूत्राघातमपस्मारं भगन्दरगुदामयान् ॥ १०९ ॥
उन्मादं मूर्च्छा यक्ष्माणं पक्षाघातं हतेन्द्रियम् ।
शूलामॢपित्तकं हन्ति भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ११० ॥
त्रिफलारसयोगेन शुभया सितयाऽपि वा ।
भक्षयित्वा भवेद्रोगी कामरूपी सुदर्शनः ॥ १११ ॥
रात्रौ सेव्यं गवां क्षीरं कृशानां च विशेषतः ।
योगेन्द्राख्यो रसो नाम्ना कृष्णात्रेयेण निर्मितः ॥ ११२ ॥

एवं वातज, पित्तज रोग, प्रमेह, बहुमूत्रता, मूत्राघात, अपस्मार, भगन्दर, गुदाके रोग, उन्माद, मूर्च्छा, राजयक्ष्मा, पक्षाघात, इन्द्रियका नष्ट होजाना, सर्व प्रकारके शूल और अम्लपित्तादि रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है। इस रसको प्रतिदिन त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ अथवा मिश्रीके साथ भक्षण करके रात्रिमें काली गौका दूध पीनेसे रोगी कामदेवकी समान कान्तिमान् होता है। इस योगेन्द्रनामक रसको कृष्णात्रेयजीने निर्माण किया है॥ १०९-११२॥

वातारिरस ।

रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः ।
त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम् ॥ ११३ ॥
गुग्गुलोः पञ्च भागाः स्यू रुबूतैलेन मर्दयेत् ।
क्षित्त्वाऽत्र पूर्व्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ ११४ ॥

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६३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

गुडिकां कर्षमात्रां तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः ।
नागरैरण्डमूलानां क्वाथं प्रपिबेदनु ॥ ११५ ॥
अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् ।
विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥ ११६ ॥
वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ।
मासेन मरुतो रोगान् हरेत्सुरतवर्जितः ॥ ११७ ॥

शुद्ध पारा एक भाग और शुद्ध गन्धक दो भाग लेकर दोनोंकी कज्जली करलेवे। फिर गूगलको पांच भाग लेकर अण्डीके तैलके साथ खरल करके उसके साथ पूर्वोक्त कज्जली एवं त्रिफलेका चूर्ण तीन भाग और चीतेकी जडका चूर्ण चार भाग मिलाकर फिर अण्डीके तैलमें खरल करे। पश्चात् एक कर्षकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे। ऊपरसे सोंठ और अण्डकी जडका क्वाथ पान करे। प्रातःकाल औषध सेवन करनेके पश्चात् रोगीकी पीठमें अण्डीका तैल मलकर स्वेद देवे। इसके द्वारा विरेचन होजानेपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थोंका भोजन करावे। स्त्रीप्रसंगको त्यागकर इस वातारिनामक रसको वायुरहित स्थानमें रहता हुआ मनुष्य एक मासपर्यन्त सेवन करे, यह रस सर्वप्रकारके वातरोगोंको दूर करता है ॥ १३-१७ ॥

अनिलारिरस ।

रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिर्गुण्डिरसैर्दिनैकम् ।
निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदाऽऽवेष्ट्य च वालुकाख्ये ॥ ११८
यन्त्रे पुटेद्गोमयचूर्णवह्नौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत् ।
निर्गुण्डिकावातहराग्नितोयैः सञ्चूर्ण्य यत्नेन विभावयेत्तत् ॥
रसोऽनिलारिः कथितोऽस्य वल्लमेरण्डतैलेन ससैन्धवेन ।
मरीचचूर्णेन ससर्पिषा वा निर्गुण्डिचित्रैश्च कटुत्रिकैर्वा ॥ १२०

शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक २ तोले लेकर दोनोंको अण्डकी जड और निर्गुण्डीके रसके साथ एक एक दिनतक खरल करे। फिर उसको ताँबेके पात्रमें बन्द करके मिट्टीसे ल्हेंसकर वालुकायन्त्रमें रख आरने उपलोंकी अग्निमें एक प्रहरतक पकावे। जब उत्तम प्रकारसे पककर स्वयं शीतल होजाय तब उसको निकालकर निर्गुण्डी, अण्ड और चीता इनके रसमें क्रमसे एक एक बार भावना देकर दो अथवा तीन रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसको अण्डीके तैल और सैन्धा-

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३५

नमकके चूर्णके साथ या मिरचोंके चूर्ण और घीके साथ अथवा त्रिकुटेके चूर्ण, निर्गुण्डी और चीतेके क्वाथके साथ सेवन करे । इसको अनिलारि ( वातनाशक ) रस कहते हैं ॥ १८-१२० ॥

सर्वाङ्गसुन्दररस ।

शुद्धसूताभ्रताम्रायोहिङ्गुलं कर्षिकं मतम् ।
गन्धकश्चैकभागः स्यात्सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ २१ ॥
सप्तपर्णार्कस्नुक्क्षीरवासावातारिवारिणा ।
विषमुष्टिसमं सर्वं पेष्यं तद्गोलकीकृतम् ॥ २२ ॥
विपचेद्वालुकायन्त्रे द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।
पिप्पलीविषसंयुक्तो रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥
सर्ववातविकारघ्नः सर्वशूलनिषूदनः ॥ २३ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म और सिंगरफ ये प्रत्येक दो दो तोले और शुद्ध गन्धक एक तोला लेकर सबको एकत्रकर सतौना, आक, थूहरका दूध, अडूसा और अण्डके क्वाथम भावना देवे । फिर सब औषधकी बराबर कुचला मिलाकर खरल करक गोलासा बनालेव । उस गोलेको वालुकायन्त्रमें रखकर दो प्रहरतक पकावे । पककर शीतल होजानेपर उसमें पीपलका चूर्ण और शुद्ध मीठा तेलिया दो दो तोले मिलादेवे । यह सर्वांगसुन्दर रस सर्व प्रकारके वायुके विकार और सर्व प्रकारके शूलरोगको नष्ट करता है ॥ २१-२३ ॥

शीतारिरस ।

रसेन गन्धं द्विगुणं प्रगृह्य पुनर्नवाग्निस्र्वसैर्विभाव्य ।
पक्काकपत्रस्य रसेन पश्चाद्विपाचयेदष्टगुणेन यत्नात् ॥ २४ ॥
रसाद्र्धभागं च विषं च दत्त्वा विपाचयेद्वह्निजले क्षण तत् ।
शीतारिसंज्ञस्य रसायनस्य वल्लं च सार्द्धं मरिचार्द्रकेण ॥ २५॥
मरीचचूर्णेन घृताप्लुतेन सेवेत मांसं च घृतं च पथ्यान् ॥२६॥

शुद्ध पारा एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले दोनोंको पुनर्नवा और चीतेके स्वरसमें भावना देकर पके हुए आकके पत्तोंके अठगुने रसके साथ वालुकायन्त्रमें रखकर यत्नपूर्वक पकावे । पश्चात् पारेसे आधा शुद्ध मीठा तेलिया डालकर चीतेके रसमं क्षणभरतक पकावे । इस शीतारिनामक रसायनको डेढ वा दो रत्ती परिमाण देकर मिरचोंके चूर्ण और अदरकके रसके साथ अथवा मिरचोंके चूर्ण और घृतके

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: ६३६ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि •

साथ सेवन करे। इसपर मांसरस और घृतका पथ्य करे। यह रस शीतवातको नष्ट करता है ॥ २४-२६ ॥

तालकेश्वररस।

एकभागो रसस्य स्याच्छुद्धतालैकभागिकः ।
अष्टौ स्युर्विजयायाश्च गुडिकां गुडतश्चरेत् ॥ २७ ॥
एकैकां भक्षयेत्प्रातश्छायायामुपवेशयेत् ।
तालकेश्वरनामाऽयमस्पर्शरोगनाशनः ॥ २८ ॥

शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध हरताल १ तोला और भाँग ८ तोले लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे। फिर सब चूर्णकी बराबर गुड मिलाकर तीन तीन माशेकी गोलियाँ बनालेवे। प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली भक्षण करे और छायामें रहे। यह तालकेश्वरनामक रस अस्पर्शवातरोगको नष्ट करनेवाला है ॥ २७-२८ ॥

वातविध्वंसन रस।

सूतमभ्रकसत्त्वं च कांस्यं शुद्धं च माक्षिकम् ।
गन्धकं तालकं सर्वं भागोत्तरविवर्द्धितम् ॥ २९ ॥
कज्जलीकृत्य तत्सर्वं वातारिस्नेहसंयुक्तम् ।
सप्ताहं मर्दयित्वा तु गोलकीकृत्य यत्नतः ॥ ३० ॥
निम्बुद्रवेण सम्पीज्य तिलकल्केन लेपयेत् ।
अर्द्धाङ्गुलदलेनैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥
प्रपचेद्वालुकायन्त्रे द्वादशप्रहरं ततः ॥ ३१ ॥

शुद्ध पारा १ भाग, अभ्रकसत्त्व २ भाग, काँसा ३ भाग, शुद्ध सोनामाखी ४ भाग, शुद्ध गन्धक ५ भाग और शुद्ध हरताल ६ भाग लेवे। पहले पारे और गन्धककी एकत्र कजली करके उसमें अन्य सब औषधियोंको मिलाकर अण्डीके तैलमें ७ दिनतक खरल करे। फिर जम्बीरीनींबूके रसमें खरल करके गोलासा बनालेवे। उस गोलेपर आध अंगुल परिमाण तिलके कल्कका लेपकर और धूपमें सुखाकर उसको वालुकायन्त्रमें रखकर १२ प्रहरतक पकावे ॥

जठरस्य रुजाः सर्वास्तथा च मलविग्रहम् ।
आध्मानकं तथाऽऽनाहं विषूचिं वह्निमान्द्यकम् ॥ ३२ ॥
आमदोषमशेषं च शूलं छर्दिं च दुर्जयम् ।
ग्रहणीं श्वासकासौ च कृमिरोगं विशेषतः ॥ ३३ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३७

हन्यात्पूर्वाङ्गशूलं च मन्यास्तम्भं तथैव च ।
ज्वरे चैवातिसारे च शूलरोगे त्रिदोषजे ॥ ३४ ॥
पथ्यं रोगानुसारेण देयमस्मिन् भिषग्वरैः ।
श्रीमत्ता नन्दिनाथेन वातविध्वंसनो रसः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह रस उदरके सब विकार, मलका अवरोध, आध्मान, आनाह, विषूचिका, मन्दाग्नि, समस्त आमदोष, गुल्म, दुर्जय वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, विशेषकर कृमिरोग, पूर्वांग व सर्वांगशूल, मन्यास्तम्भ, ज्वर, अतिसार और त्रिदोषज शूलरोग इन सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करताहै। इसमें रोगके अनुसार पथ्य देना चाहिये । इस वातविध्वंसन रसको श्रीमान् नन्दिनाथने निर्माण कियाहै ॥ २९=३५ ॥

वातनाशनरस ।

सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लौहं च माक्षिकम् ।
तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम् ॥ ३६ ॥
पञ्चानां लवणानां च भागैकं सुविमर्दयेत् ।
वज्रीक्षीरैर्दिनैकं तु रुद्ध्वा तं भूधरे पचेत् ॥
माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् ॥ ३७ ॥
पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥
सर्वान्‍वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ ३८ ॥

शुद्ध पारा, सुवर्णभस्म, हीराभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, हरताल, नीलासुरमा, नीलाथोथा और समुद्रफेन ये प्रत्येक समान भाग और पाँचों नमक एक भाग लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । उस चूर्णको थूहरके दूधके साथ एक दिनतक खरल करके भूधरयन्त्रमें रखकर पकावे । इस रसको प्रतिदिन एक एक माशे परिमाण लेकर अदरखके रस और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे और औषधिसेवन करनेके पश्चात् पीपलका चूर्ण डालकर पीपलामूलका क्वाथ पान करे । यह रस आक्षेपकादि सम्पूर्ण वातविकारोंको दूर करता है ॥ ३६-३८ ॥

वातकण्टकरस ।

वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् ।
मरिचं मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ ३९ ॥