Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 663 of 1416

Read in context
Page 663

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३१


यथाव्याध्यनुपानेन नाशयेद्रोगसङ्कुलम् ।
वातरोगं पित्तकृतं निहन्ति नात्र चिन्तनम् ॥ ९३ ॥
वृद्धोऽपि तरुणस्पर्शी कन्दर्पसमविक्रमः ।
दृष्टः सिद्धफलश्चायं वातचिन्तामणिस्त्विह ॥ ९४ ॥

सुवर्णभस्म ३ तोले, चाँदीकी भस्म दो तोले, अभ्रकभस्म दो तोले, लोहभस्म ५ तोले, मूँगेकी भस्म ५ तोले, मोतीकी भस्म ३ तोले और शुद्ध पारेकी भस्म ७ तोले इन सबको एकत्र घीकुँआरके रसमें खरल करके दो या डेढ़ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर रोगके अनुसार अनुपानके साथ इसको प्रतिदिन सेवन करनेसे समस्त रोगसमूह और पित्ताश्रित वातरोग निस्सन्देह नष्ट होते हैं। एवं वृद्ध पुरुषभी कामदेवकी समान पराक्रमशाली और तरुण होजाता है। यह वातचिन्तामणि रस वातरोगमें सिद्धफलका देनेवाला है ॥ ९१-९४ ॥

चतुर्मुखरस ।

रसगन्धकलौहाभ्रं समं सूताङ्घ्रि हेम च ।
सर्वं खल्लतले क्षिप्त्वा कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ९५ ॥
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् ।
संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ९६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म ये प्रत्येक एक एक ताला और सुवर्णभस्म तीन मासे लेकर सबको खरलमें एकत्र करके घीकुँआरके रसमें खरल करे। फिर गोलासा बनाकर उसको अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंकी राशिमें गाडदेवे। तीन दिनतक रखा रहनेके बाद उसको निकालकर सर्वप्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥

एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुयोजितम् ।
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ९७ ॥
क्षयमेकादशविधं पाण्डुरोगं प्रमेहकम् ।
कासं शूलं च मन्दाग्निं हिक्कां चैवाम्लपित्तकम् ॥ ९८ ॥
व्रणान्सर्वानाढ्यवातं विसर्पं विद्रधिं तथा ।
अपस्मारं महोन्मादं सर्वांशांसि त्वगामयान् ॥ ९९ ॥
क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमन्द्राशनिर्यथा ।
पौष्टिकं बल्यमायुष्यं स्त्रीणां प्रसवकारकम् ॥ १०० ॥