भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context६२६ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-
पट्टीस्यात्स्वेदनार्थं च काञ्जिकाद्यम्लमिष्यते ।
चतुःस्नेहोऽत्र तावान्स्यात्सुस्विन्नत्वं यतो भवेत् ॥ ६३ ॥
समस्तं वर्गमर्द्धं वा यथालाभमथापि वा ।
प्रयुञ्जीतेति वचनं सर्वत्र गणकर्मणि ॥ ६४ ॥
भद्रदार्वादिगण और काकोल्यादिगणकी ओषधियाँ वातनाशक हैं, यह सुश्रुतने कहा है। इसमें मांसकी बराबर सब ओषधियाँ जितने अम्लपदार्थोंके द्वारा अम्लता हो सके वह पट्टी स्वेद देनेके लिये ग्रहण करनी, काँजी आदि अम्लपदार्थ लेना। इसमें चारों स्नेहद्रव्य उतनेही लेने जितने द्रव्योंसे वह अच्छी तरह सीजजाय। सम्पूर्ण वर्गकी या आधे वर्गकी अथवा जितनी मिल सकें उतनी औषधियाँ लेनी चाहिये। यह वचन सब जगह गणकर्ममें प्रयोग करना ॥ ६३-६४ ॥
वातगजांकुश ।
मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् ।
पथ्या शृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थं च टङ्कणम् ॥ ६५ ॥
तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्य मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः ।
द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ६६ ॥
कणाचूर्णयुतं चैव जिङ्गीक्वाथं पिबेदनु ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६७ ॥
सप्ताहाद् गृध्रसीं हन्ति दारुणं सान्निपातिकम् ।
क्रोष्टुशीर्षकवातं चाप्यवबाहुकसंज्ञकम् ॥ ६८ ॥
मन्यास्तम्भमुरुस्तम्भं हनुस्तम्भं विनाशयेत् ।
पक्षाघातादिरोगेषु कथितः परमोत्तमः ॥ ६९ ॥
शुद्ध पारेकी भस्म, लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध गन्धक, हरताल, हरड; काकडासिंगी, शुद्ध मीठा तेलिया, सोंठ, पीपल, मिरच अरणी और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर मुण्डी और निर्गुण्डीके रसके साथ एक एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। सर्व प्रकारक वातरोगको शमन करनेके लिये इसकी प्रतिदिन एक एक गोली भक्षण करे और ऊपरसे पीपल का चूर्ण मिलाकर मंजीठके क्वाथको पीवे। यह वातगजांकुशरस साध्य व असाध्य सर्व प्रकारके वातरोगको तत्काल नष्ट करता है। एवं गृध्रसी