भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ६२४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि- |
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सिंहास्यादिक्वाथ ।
सिंहास्यदन्तीकृतमालकानां पिबेत्कषायं रुबुतैलमिश्रम् ।
यो गृध्रसीनष्टगतिः प्रसुप्तः स शीघ्रगः स्याद्धि किमत्र चित्रम्॥
जो गृध्रसीरोगीकी गतिशक्ति नष्ट होगई हो और जडता होगई हो तो उसको अडूसा, दन्तीकी जड और अमलतास इनका क्वाथ अण्डीका तेल मिलाकर पान कराना चाहिये इससे रोगी शीघ्र चलने लगता है ॥ ५२ ॥
रास्नासप्तकक्वाथ ।
रास्नामृतारग्वधदेवदारुत्रिकण्टकैरण्डपुनर्नवानाम् ।
क्वाथं पिबेन्नागरचूर्णमिश्रं जंघोरुपृष्ठत्रिकपार्श्वशूली ॥५३॥
रायसन, गिलोय, अमलतास, देवदारु, गोखुरू, अण्डकी जड और पुनर्नवा इनके मन्दोष्ण क्वाथको सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे जङ्घा, ऊरु, पीठ, त्रिक और पार्श्वशूलवाला रोगी आरोग्य होता है ॥ ५३ ॥
माषादिक्वाथ ।
माषात्मगुप्तावातारिव्याघ्रकजटाशृतम् ।
हिङ्गुसैन्धवसंयुक्तं पक्षाघातं विनाशयेत् ॥ ५४ ॥
उडद, कौंचके बीज, एरण्डमूल, खिरैंटी और बालछड इनके क्वाथमें हींग और सेंधानमक डालकर पीनेसे पक्षाघात रोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥
गोक्षुरादिक्वाथ ।
गोक्षरमेरण्डमूलं वचा रास्ना पुनर्नवा ।
कषाय एष शस्तस्तु वाते सर्वाङ्गमाश्रिते ॥ ५५ ॥
गोखुरू, अण्डकी जड, वच, रायसन और पुनर्नवा इनका क्वाथ सर्वाङ्गगत वातरोगमें हितकारी है ॥ ५५ ॥
माषबलादिक्वाथ ।
माषबलाशुकशिम्बीकत्तृणरास्नाश्वगन्धोरुबूकानाम् ।
क्वाथो यस्य निपीतो रामठलवणान्वितः कोष्णः ॥
अपहरति पक्षाघातं मन्यास्तम्भं सकर्णनादरुजम् ।
दुर्जयमर्दितवातं सप्ताहाज्जयति चावश्यम् ॥ ५६ ॥
उडद, खिरैंटीकी जड, कौंचके बीज, रोहिषतृण, रायसन, असगन्ध और अण्डकी जड इनके मन्दोष्ण क्वाथको हींग और सेंधानमक मिलाकर पान