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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 660 of 1416

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Page 660
६२८भैषज्यरत्नावलो ![ वातव्याधि-

भृङ्गराजरसेनैव दातव्याः पञ्च भावनाः ।
तथा दाडिमतोयेन वटीं कुर्यात्समाहितः ॥
निहन्ति वातजात्रोगान्भ्रमदाहपुरःसरान् ॥ ७६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और शुद्ध मीठा तेलिया ये सब समान भाग काली मिरच अठगुनी और सुहागा चौगुना लेकर सबको एकत्र करके भाँगरेके रस और अनारके रसमें पाँच पाँच बार भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह रस सर्वप्रकारके वातरोग, भ्रम, दाह आदि उपद्रवोंको नष्ट करता है ॥७५ ॥ ७६ ॥

गगनादिवटी ।

मृतगगनरसार्कं मुण्डतीक्ष्णं सताप्यं सबलिसममिदं स्याद्यष्टितोयप्रपिष्टम् । तदनु सलिलजातैर्वासकैर्गोस्तनीभिर्मृदितमनु विदारीवारिणा घस्रमेकम् ॥ घृतमधुसहितेयं निष्कमात्रा वटीति क्षपयति गुरुवातं पित्तरोगं क्षयं च । भ्रममदकफशोषान्दाहतृष्णासमुत्थान् मलयजमिह पेयं चानुपैयं सचन्द्रम् ॥ ७७ ॥

अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, ताम्रभस्म, मण्डूरभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म और शुद्ध गन्धक इन प्रत्येक औषधिको समान भाग लेकर मुलहठीके क्वाथमें खरल करके फिर कमल, अडूसेके पत्ते, दाख और विदारीकन्दके रसमें क्रमसे एक एक दिनतक खरल कर सुखालेवे । फिर तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली घृत और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । औषध सेवन करनेके पश्चात् सफेद चन्दन, और; कपूरका अनुपान करे । यह वटी प्रबल वातरोग, पित्तके रोग, क्षय, भ्रम, मद, कफ, शोष, दाह और तृषासे उत्पन्न हुए सब विकारोंको दूर करती है ॥ ७७ ॥

कुब्जविनोद रस ।

रसगन्धौ समौ शुद्धौ चाभया तालकं तथा ।
विषं कटुकि व्योषं च बोलजैपालकौ समौ ॥ ७८ ॥
भृङ्गराजरसैर्मर्द्यं स्नुह्यर्कस्वरसैस्तथा ।
गुञ्जाद्वयं भक्षयेच्च हृच्छूलं पार्श्वशूलकम् ॥ ७९ ॥
आमवाताढ्यवातादीन् कटिशूलं च नाशयेत् ।
अग्निं च कुरुते दीप्तं स्थौल्यं चाप्यपकर्षति ॥ ८० ॥