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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 664
६३२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

जगतां च हितार्थाय चतुर्मुखमुखोदितः ।
रसश्चतुर्मुखो नाम चतुर्मुख इवापरः ॥ १०१ ॥

इस उत्तम रसायनको प्रतिदिन जठराग्निके बलाबलके अनुसार उपयुक्त मात्रासे त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ सेवन करे, तो यह रस वली और पलितरोग, ग्यारह प्रकारका क्षय, पाण्डु, प्रमेह, खाँसी, शूल, मन्दाग्नि, हिचकी, अम्लपित्त, सर्वप्रकारके व्रण, आमवात, विसर्प, विद्रधि, मृगी, घोर उन्माद, सब प्रकारकी बवासीर, और त्वचाके समस्त रोग इन सबको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है, जैसे वज्र वृक्षको तत्काल नष्ट करदेता है। एवं यह अत्यन्त पौष्टिक, बलकारक, आयुवर्द्धक और स्त्रियोंके सन्तानोत्पत्ति करनेवाला है। इस रसको संसारके हितके लिये ब्रह्माजीने निर्माण किया है, इसलिये इसको चतुर्मुख रस कहते हैं। यह दूसरे ब्रह्मा की समान है ॥ ९७-१०१ ॥

लक्ष्मीविलासरस ।

पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ ।
बला नागबला भीरु विदारीकन्दमेव च ॥ १०२ ॥
कृष्णाधुस्तूरनिचुलं गोक्षुरवृद्धदारयोः ।
बीजं शक्राशनस्यापि जातीकोषफले तथा ॥ १०३ ॥
कर्पूरं चैव कर्षांशं श्लक्ष्णचूर्णं पृथक्पृथक् ।
गृहीत्वा चाष्टमांशेन स्वर्णं पर्णरसेन च ॥ १०४ ॥
वटिकां स्विन्नचणकप्रमाणां कारयेद्भिषक् ।
रसो लक्ष्मीविलासोऽयं पूर्ववद् गुणकारकः ॥ १०५ ॥

काली अभ्रककी भस्म ४ तोले, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक ये प्रत्येक एक एक तोला लेकर दोनोंकी कज्जली करलेवे। एवं खिरेंटी, गंगेरन, शतावर, विदारीकन्द, काला धतूरा, बेंत, गोखरू, विधारा, भाँगके बीज, जावित्री, जायफल और भीमसेनी-कपूर ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेकर सबका बारीक चूर्ण करलेवे। फिर समस्त चूर्णसे आठवाँ भाग स्वर्णभस्म लेकर सबको एकत्र पानके रसके साथ खरल करके सीजेहुए चनेकी बराबर गोलियाँ बनालवे। यह लक्ष्मीविलासरस पूर्वोक्त चतुर्मुखरसकी समानही गुण करनेवाला है ॥ १०२-१०५ ॥

योगेन्द्ररस ।

विशुद्धं रससिन्दूरं तदर्द्धं शुद्धहाटकम् ।
तत्समं कान्तलौहं च तत्समं चाभ्रमेव च ॥ १०६ ॥