अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
वृद्धि करते हुए तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. (६)
अ॒र्वाव॑तो न॒ आ ग॑ह्यथो॑ शक्र परा॒वत॑:.
उ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि.. (७)
हे इंद्र! तुम दूर या पास जहां कहीं हो, वहीं से हमारे समीप आओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम
अपने उत्कृष्ट स्वर्गलोक से भी सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में आओ. (७)
इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग म॒हद् भ॒यम॒भी ष॑दप चुच्यवत्. स हि स्थि॒रो विच॑र्षणि:.. (८)
हे ऋत्विज्! इंद्र बड़े से बड़े भय को भी दूर कर देते हैं. उन सूर्य द्रष्टा अर्थात् सब को
देखने वाले इंद्र को कोई पराजित नहीं कर सकता. (८)
इन्द्र॑श्च मृळया॑ति नो॒ न न॑: प॒श्चाद॒घं न॑शत्. भ॒द्रं भ॑वाति न: पु॒र:.. (९)
यदि इंद्र हमारी रक्षा करेंगे तो हमारे दुःख समाप्त हो जाएंगे और सुख हमारे सामने
आएंगे. इंद्र सदा मंगल कर्ता हैं. (९)
इन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्. जेता॒ शत्रून् विच॑र्षणि:.. (१०)
हमारे जो शत्रु सभी दिशाओं में फैले हुए हैं, इंद्र उन सभी को देखते हैं. इंद्र उन भयों को
हम से अलग करें, जो सभी दिशाओं और उपदिशाओं से प्राप्त होने वाले हैं. (१०)
क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद् वयो॒ दधे॑.
अ॒यं य: पु॒रो वि॒भिनत्त्योज॑सा मन्दान: शिप्र्यन्ध॑स:.. (११)
इसे कौन जानता है कि सोमरस निचोड़े जाने पर इंद्र कौन से अन्न को धारण करते हैं?
हवि रूप अन्न से प्रसन्न हुए इंद्र अपनी शक्ति से शत्रुओं के नगरों का विनाश करते हैं. (११)
दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒ण: पु॑रु॒त्रा च॑रथं दधे.
नकि॑ष्ट्वा नि य॑मदा सु॒ते गमो॑ म॒हांश्च॒रस्योज॑सा.. (१२)
हे इंद्र! तुम अपने रथ पर सवार हो कर हर्षित बने हुए हिरन के समान अनेक स्थानों पर
जाते हो. जब सोमरस निचोड़ा जाता है, उस समय यज्ञ में आने से तुम्हें कोई रोक नहीं
सकता. तुम अपने ही बल से महान बन कर घूमते हो. हमारा सोमरस तैयार हो जाने पर तुम
हमारे यज्ञ में पधारो. (१२)
य उ॒ग्र: सन्ननि॑ष्टृत॒ स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑त:.
यदि॑ स्तो॒तुर्म॑घवा शृ॒णव॒द्वच॒ नेन्द्रो॑ योषत्या गम॑त्.. (१३)
इंद्र शक्तिशाली हैं, इसलिए शत्रुओं के युद्ध करने के लिए उद्यत होने पर वे कभी
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पराजित नहीं होते. जिस प्रकार पति अपनी पत्नी के पास जाता है, उसी प्रकार इंद्र स्तोता
द्वारा बुलाए जाने पर उस के समीप जाते हैं. (१३)
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः.
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१४)
हे इंद्र! तैयार हो जाने पर सोमरस जल के समान तरल हो गया है. इस अवसर पर हम
ऋत्विज् तुम्हारे स्तोत्र का गान करते हुए बैठे हैं. (१४)
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः.
कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (१५)
हे इंद्र! सोमरस तैयार हो जाने पर उक्थ मंत्रों का गान करने वाले ऋत्विज् तुम्हें बुला रहे
हैं. प्यासे बैल के समान आप कब हमारा सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में पधारेंगे. (१५)
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद वाजं दर्षि सहस्रिणम्.
पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (१६)
हे धनों को अपने अधीन करने वाले इंद्र! तुम उन व्यक्तियों को भी मर्दित कर देते हो जो
सैकड़ों साधनों वाले हैं. हम तुम से वह धन मांगते हैं, जो गायों से संपन्न हो. (१६)
सूक्त-५८ देवता—इंद्र
श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. (१)
नित्य प्रति सूर्य के साथ रहने वाली किरणें जलों के स्वामी इंद्र के साथ भी रहती हैं. हम
यह कामना करते हैं कि इंद्र के जल रूपी मेघ विस्तृत हों. जिस प्रकार इंद्र भूत, वर्तमान और
भविष्य तीनों कालों के धनों का विभाजन करते हैं, उसी प्रकार हम उस धन के भाग पर
ध्यान देते हैं. (१)
अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः.
सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (२)
हे स्तोताओ! तुम धन देने वाले इंद्र का सच्चे हृदय से आश्रय लो. इंद्र का दान मंगलमय
है, इसलिए तुम उन की स्तुति करो. इंद्र अपने उपासक की कामना पूर्ण करते हैं. स्तुति कर
के धन मांगने वाला पुरुष इंद्र के मन को धन देने के लिए आकर्षित करता है. (२)
बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि.
महस्ते सतो महिमा पनस्यते ऽ द्धा देव महाँ असि.. (३)
हे सूर्य रूपी इंद्र! हे आदित्य! तुम्हारे महान होने की बात सत्य है. तुम सत्य रूप वाले
हो. तुम्हारी महिमा की प्रशंसा की जाती है, इसलिए तुम्हारे महिमावान होने की बात यथार्थ
है. (३)
बट् सूर्य श्रवसा महां असि सत्रा देव महां असि.
महा देवानामसूर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. (४)
हे सूर्य! तुम स्वयं महान हो. हमारे हवि रूप अन्न से तुम्हारी महिमा की वृद्धि हो. तुम
अपनी महिमा के कारण ही राक्षसों से संघर्ष करते हो. तुम व्यापक हो. कोई तुम्हारी हिंसा
नहीं कर सकता. (४)
सूक्त-५९ देवता—इंद्र
उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते.
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१)
ये स्तोत्र एवं गायन योग्य वाणियां उत्पन्न हो रही हैं. धन देने वाली वाणी शत्रुओं पर
विजय पाती है. अन्न देने वाली स्तोता की सदा रक्षा करती है. जिस प्रकार रथ अपने स्वामी
को गंतव्य पर पहुंचाने के लिए चलता है, उसी प्रकार हमारी ये वाणियां इंद्र को प्रसन्न करने
के लिए उन के पास जाएं. (१)
कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीतमानशुः.
इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमैधासो अस्वरन्.. (२)
कण्व गोत्र के ऋषियों की स्तुति जिस प्रकार तीनों लोक के स्वामी इंद्र को प्राप्त होती
है, जिस प्रकार द्यावा, अर्यमा आदि सूर्य अपने प्रेरणाप्रद इंद्र से मिलते हैं, उसी प्रकार भृगु
वंश के ऋषि इंद्र का आश्रय लेते हैं और प्रिय बुद्धि वाले मनुष्य इंद्र की स्तुति करते हैं. (२)
उदिन्वस्य रिच्यतें ऽ शो धनं न जिग्युषः.
य इन्द्रो हरिवान्न दभन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि.. (३)
इंद्र का यज्ञ भाग जीते हुए धन के समान होता है. हरि नाम के अथवा हरे रंग के घोड़ों
वाले इंद्र की हिंसा नहीं कर सकते. जो यजमान इंद्र को सोमरस देता है, इंद्र उस में बल को
स्थापित करते हैं. (३)
मन्त्रमखर्वं सुधितं सुपेशसं दधात यज्ञियेष्वेषा.
पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवत्.. (४)
हे स्तोताओ! ऐसे यज्ञ संबंधी मंत्रों का उच्चारण करो जो सुंदर, तेज और रूप प्रदान
करने में समर्थ हों. इंद्र की सेवा करने वाला मनुष्य सभी बंधनों से छुटकारा पा जाता है. (४)
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सूक्त-६० देवता—इंद्र
सूक्त-६० देवता—इंद्र
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१)
हे वीर एवं स्थिर इंद्र! तुम दुष्कर्म करने वाले वीरों को रोकते हो. (१)
एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र मे सचा.. (२)
हे असीमित धन के स्वामी इंद्र! तुम मेरे सहायक बनो. तुम अपनी पुष्ट करने वाली
शक्ति से हम यजमानों में दान करने की शक्ति की स्थापना करो. (२)
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्वा सुतस्य गोमतः.. (३)
हे अन्नों के स्वामी इंद्र! तुम ब्रह्मा के समान आलसी मत बनो. तुम बुद्धि देने वाले तैयार
सोमरस के द्वारा अत्यधिक आनंद प्राप्त करो. (३)
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४)
इंद्र की भूमि गाएं प्रदान करने वाली हैं. यह हवि देने वाले यजमान के लिए पकी हुई
शाखा के समान बने. (४)
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५)
हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि प्रदान करता है, उस के लिए तुम्हारे रक्षा के साधन शीघ्र
प्राप्त हो जाते हैं. (५)
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६)
सोमरस का पान करते समय इंद्र को स्तोत्र, उक्थ और शस्त्र नाम की स्तुतियां बहुत
प्रिय लगती हैं. (६)
सूक्त-६१ देवता—इंद्र
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्..
(१)
हे वज्रधारी, शत्रुओं को पराजित करने वाले, अश्वों की शोभा से युक्त एवं मनचाहे
पदार्थों के वर्षक इंद्र! हम तुम्हारे हवि की पूजा करते हैं. (१)
येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि..
(२)
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हे इंद्र! जिस सोमरस के प्रभाव से तुमने आयु और मन को तेज प्राप्त कराया था, उसी
सोमरस से पुष्ट हो कर तुम उस यजमान के कुशाओं से बने आसन पर बैठो. (२)
तदद्या चित्त उक्थिनो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे..
(३)
हे इंद्र! उक्थ नाम के मंत्रों के ये गायक तुम्हारी महिमा का गान कर रहे हैं. तुम धर्म
कार्य करते हुए प्रत्येक अवसर पर विजय प्राप्त करो. (३)
तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (४)
बहुतों ने इन इंद्र की स्तुति की है तथा बहुत से लोगों ने इन का आह्वान किया है. हे
स्तोता! तुम इन्हीं इंद्र के यश का गान करो तथा अपनी स्तुति रूपी वाणी से उन्हें प्रतिष्ठित
करो. (४)
यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरींरज्ञाँ अपः स्व वृषत्वना..
(५)
जिन इंद्र के आश्रय के कारण स्वर्ग और पृथ्वी महान बल, जल, पर्वत और वज्र को
धारण करते हैं, उन्हीं इंद्र की तुम पूजा करो. (५)
स राजसि पुरुष्टुतं एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे..
(६)
हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के कारण तेजस्वी बने हो तथा अकेले ही
शत्रुओं का नाश करते हो. (६)
सूक्त-६२ देवता—इंद्र
वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद् भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे..
(१)
हे सदा नवीन रहने वाले इंद्र! अन्न प्राप्ति के अवसर पर हम तुम्हारी रक्षा की कामना
करते हैं और तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें विजय प्राप्त कराने के लिए हमारे समीप आओ, हमारे
विरोधियों की ओर मत जाओ. जिस प्रकार विजय की कामना से राजा योद्धाओं को बुलाता
है, उसी प्रकार हम तुम्हें बुलाते हैं. (१)
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्.
त्वामिद्ध्वावितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२)
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हे इंद्र! कार्य के अवसर पर हम तुम्हारा ही आश्रय लेते हैं. तुम शत्रुओं को वश में करने
वाले, नित्य एवं अत्यधिक शक्तिशाली हो. तुम हमें सहायक के रूप में प्राप्त होओ. हम
अपनी रक्षा के लिए सखा के रूप में तुम्हारा वरण करते हैं. (२)
यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे. सखाय इन्द्रमूतये.. (३)
हे यजमानो! तुम्हारी रक्षा के निमित्त हम इंद्र का आह्वान करते हैं. हमें पहले गौ आदि
के रूप में धन प्रदान करने वाले इंद्र मनचाहा फल देने में समर्थ हैं. हम उन्हीं इंद्र की स्तुति
करते हैं. (३)
हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत.
आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (४)
मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं जो सभी मनुष्यों के रक्षक, हरे रंग के अथवा हरित नाम
वाले घोड़ों के स्वामी और सब का नियंत्रण करने वाले हैं. मैं स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले इंद्र
की स्तुति करता हूं. वे ही इंद्र हम स्तोओं को गाएं तथा घोड़े प्रदान करें. (४)
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (५)
हे विद्वान् एवं धर्मात्मा स्तुति कर्ताओ! तुम महान इंद्र की स्तुति सोम गान के द्वारा करो.
(५)
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचयः. विश्वकर्मा विश्वदेवो महाँ असि.. (६)
हे इंद्र! सूर्य को तुम ने ही आकाश में प्रकाशित किया है. तुम शत्रुओं का तिरस्कार करने
वाले, विश्वे देव और महान विश्वकर्मा हो. (६)
विभ्राजं ज्योतिषा स्व १ रगच्छो रोचनं दिवः. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे..
(७)
हे इंद्र! सभी देवता तुम्हारे मित्र हैं. जो सूर्य स्वर्ग में प्रकाश करते हैं, वे तुम्हारे द्वारा ही
ज्योतिमान है. (७)
तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (८)
हे स्तोताओ! इंद्र को अनेक स्तोता बुला चुके हैं तथा बहुत से स्तोताओं ने इंद्र की स्तुति
की है. उन्हीं पराक्रमी इंद्र को तुम भी अपनी स्तुतियों के द्वारा सुशोभित करो. (८)
यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरीरँजाँ अपः स्वर्ष्षत्वना..
(९)
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जो इंद्र अपनी महिमा से आकाश, पृथ्वी, जल, पर्वतों, वज्र, बल तथा स्वर्ग को धारण
करते हैं, तुम उन्हीं इंद्र का पूजन करो. (९)
स राजसि पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे..
(१०)
हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के लिए तेजस्वी हुए हो. तुम अकेले ही अपने
शत्रुओं को नष्ट कर देते हो. (१०)
सूक्त-६३ देवता—इंद्र
इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:.
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (१)
यह इंद्र, विश्वे देव और भुवन सुख पाने का प्रयत्न करते हैं. वे इंद्र आदित्यों सहित आ
कर हमारे यज्ञ, शरीर और संतान को शक्ति प्रदान करें. (१)
आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्.
हत्वाय देवा असुरान् यदायन् देवा देवत्वमभिरक्षमाणा:.. (२)
जिन देवताओं ने स्वर्ग की रक्षा के लिए राक्षसों का विनाश किया था, वे इंद्र आदित्य
और मरुत् हमारे शरीर की रक्षा के लिए हमारे यज्ञ में पधारें. (२)
प्रत्यञ्चमर्कमनयंछचीभिरादित् स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीरा:.. (३)
जिन इंद्र ने अपनी शक्ति से सूर्य को प्रत्यक्ष किया तथा पृथ्वी को अन्न वाली बनाया,
उन्हीं इंद्र से हम देवताओं का हितकारी अन्न प्राप्त करें तथा वीरों से युक्त रहते हुए सौ वर्षों
की आयु प्राप्त करें. (३)
य एक इद् विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग..
(४)
इंद्र हवि देने वाले यजमान को अन्न देते हैं. इस कार्य में कोई भी इंद्र की सहायता नहीं
कर सकता. (४)
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद् गिर इन्द्रो अङ्ग..
(५)
वे इंद्र यज्ञ न करने वालों पर अपने चरण का प्रहार कर के उन्हें कब ताड़ना देंगे तथा
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हम स्तोताओं की प्रार्थना कब सुनेंगे? (५)
यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति.
उग्रं तत् पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (६)
हे इंद्र! जो पुरुष सोमरस ले कर अनेक स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करता है, वह प्रचंड
बल और ऐश्वर्य प्राप्त करता है. (६)
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य १ त्रिणं तमीमहे..
(७)
हे इंद्र! तुम सोमरस अत्यधिक पीते हो. उस से बल उत्पन्न होता है. हे इंद्र! तुम अपने
जिस बल से असुरों का नाश करते हो, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (७)
येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (८)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने दशग्व, अधिगु और कांपते हुए स्वर्णरथ की रक्षा की थी
तथा सागर को पुष्ट किया था, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (८)
येन सिन्धुं महीरपो रथां इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (९)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने जलों को सागर की ओर गमनशील बनाया. हम अमृत के
मार्ग में आगे बढ़ने के लिए उसी बल की याचना करते हैं. (९)
सूक्त-६४ देवता—इंद्र
एन्द्र नो गधि प्रियः सत्राजिदगोहाः. गिरिर्न विश्वतस्पृथुः पतिर्दिवः.. (१)
हे सत्य के द्वारा विजय प्राप्त करने वाले इंद्र! तुम हमारे प्रिय हो. कोई भी तुम्हें ढक नहीं
सकता. तुम स्वर्ग के स्वामी हो और तुम्हारा विस्तार स्वर्ग के समान है. तुम हमें अपने प्रिय के
रूप में स्वीकार करो. (१)
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी.
इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः.. (२)
हे इंद्र! तुम यज्ञ में सब के सामने आ कर सोमरस पीते हो तथा आकाश और पृथ्वी
दोनों में ही प्रकट होते हो. तुम स्वर्ग के स्वामी हो. जो तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ता है, तुम
उस की वृद्धि करते हो. (२)
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि. हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः.. (३)
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हे इंद्र! तुम ने असुरों को मारा और उन के दृढ़ नगरों का विनाश किया है. तुम स्वर्ग के
स्वामी हो और मनुष्यों की वृद्धि करते हो. (३)
एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः.
एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (४)
हे अध्वर्युजनो! शहद से भी अधिक मीठे अन्न से इंद्र को तृप्त करो. ये इंद्र सदा यजमान
की वृद्धि करते हुए स्तुतियां स्वीकार करते हैं. (४)
इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदानंश शवसा न भन्दना.. (५)
हे हरे रंग के अथवा हरि नाम वाले घोड़ों पर सवार होने वाले इंद्र! तुम्हारे पूर्व कर्म के
बलों और कल्याणों की कोई समानता नहीं कर सकता. (५)
तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (६)
अन्न की कामना वाले हम अन्न के स्वामी इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाते हैं. जिन यज्ञों का
अनुष्ठान विधिपूर्वक किया जाता है. उन से इंद्र की सदा वृद्धि होती है. (६)
सूक्त-६५ देवता—इंद्र
एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखाय स्तोम्यं नरम्.
कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्.. (१)
हम स्तुति के योग्य एवं अपने सखा के समान इंद्र से इधर आने के लिए स्तुति करते हैं.
ये इंद्र सभी कर्मों के फल प्रदान करते हैं. (१)
अगोरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः.
घृतात् स्वादीयो मधुनश्च वोचत.. (२)
हे स्तोताओ! इन तेजस्वी, देखने योग्य वाणी रूपी अन्न वाले तथा गायों को न रोकने
वाले इंद्र के प्रति शहद और घी से भी अधिक मधुर वाणी का उच्चारण करो. (२)
यस्यामितानि वीर्या ३ न राधः पर्येतवे. ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा..
(३)
कार्य साधन के हेतु असीमित शक्ति वाले इंद्र दीप्तिमती दक्षिणा के रूप हैं. (३)
सूक्त-६६ देवता—इंद्र
स्तुहीन्द्रं व्यश चवदनूर्मिं वाजिनं यमम्. अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे.. (१)
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हे ऋत्विजो! जो इंद्र अपने रथ से घोड़ों को खोल कर शांत भाव से यज्ञ में बैठते हैं,
उन्हीं प्रशंसा के योग्य इंद्र की स्तुति यजमान की कल्याण कामना के लिए करो. (१)
एवा नूनमुप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम्. सुविद्वांसं चर्कृत्यं चरणीनाम्.. (२)
जो इंद्र सदा नवीन, महान और मेधावी हैं, हे यजमान! तुम उन्हीं इंद्र की पूजा करो. (२)
वेत्था हि निर्ऋतीनां वज्रहस्त परिवृजम्. अहरहः शुन्ध्युः परिपदामिव..
(३)
हे वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकार आदित्य अपने सहयोगियों को जानते हैं, उसी प्रकार तुम
भी संतप्त करने वाले और शक्तिशाली असुरों को जानते हो. (३)
सूक्त-६७ देवता—इंद्र
वनोति हि सुन्वन् क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानाभव
द्विषः सुन्वान इत् सिषासति सहस्रा वाज्यवृतः.
सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम्.. (१)
सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने शत्रुओं के साथसाथ देवताओं के शत्रुओं का भी
पराभव करता है. वह बहुत से घरों को प्राप्त करता है तथा विविध पदार्थों के दान की इच्छा
करता है. वह शत्रुओं से घिरा हुआ नहीं रहता तथा अन्न का स्वामी बनता है. इंद्र उसे पृथ्वी
संबंधी सभी धन देते हैं. (१)
मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन् द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत्
पुरोत जारिषुः.
यद् वश्चित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्.
अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्.. (२)
हे मरुतो! तुम्हारा तेज संताप देने वाला है. वह हमारे सामने आ कर हमें जीर्ण न करे.
तुम अपने नवीन, चयन योग्य और अविनाशी उस बल को हम में स्थापित करो, जिसे शत्रु
कभी प्राप्त नहीं कर सकते. (२)
अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसुं सूनुं सहसो जातवेदसं विप्रं न
जातवेदसम्.
य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा.
घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (३)
अग्नि देव बल देने वाले, देवों के होता, उत्पन्न हुओं के जानने वाले तथा बल के अनुज
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हैं. वे अपनी ज्वालाओं से यज्ञ को सुसज्जित करते हैं तथा होम अग्नि में डाली गई घृत की
बूंदों तथा उन की दीप्ति की कामना करते हैं. (३)
यज्ञैः संमिश्राः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामंछुभ्रासो अञ्जिषु प्रिया उत.
आसद्या बर्हिर्भरतस्य सूनवः पोत्रादा सोमं पिबता दिवो नरः.. (४)
हे स्वर्ग के नेता मरुतो! फल देने के समान तुम अपनी पृषती नाम वाली घोड़ियों के
द्वारा यज्ञ में आते हो. तुम इन बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान हो कर सोमरस का पान
करो. (४)
आ वक्षि देवाँ इह विप्र यक्षि चोशन् होतर्नि षदा योनिषु त्रिषु.
प्रति वीहि प्रस्थितं सोम्यं मधु पिबाग्नीध्रात् तव भागस्य तृप्णुहि.. (५)
हे अग्नि! तुम देवताओं को हमारे इस यज्ञ में ला कर उन का पूजन करो. तुम होता के
रूप में पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग तीनों—स्थानों में विराजमान होओ. तुम हवि का भाग सभी
देवों को पहुंचा कर स्वयं भी ग्रहण करो तथा मधुर सोमरस पी कर तृप्ति प्रदान करो. (५)
एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः.
तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत् पिब.. (६)
हे इंद्र! यह सोमरस तुम्हारे शरीर के बल को बढ़ाने वाला है. अन्य सब को वश में करने
के लिए तुम्हारी भुजाओं में बल व्याप्त है. हे इंद्र! यह सोमरस निचोड़ा जा कर तुम्हारे पीने के
लिए पात्र में रखा है. तुम इसे तब तक पियो, जब तक ब्राह्मण संतुष्ट न हो जाएं. (६)
यमु पूर्वमहुवे तमिदं हुवे सेदु हव्यो ददिर्यो नाम पत्यते.
अध्वर्युभिः प्रस्थितं सोम्यं मधु पोत्रात् सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (७)
मैं पहले के समान ही अपने यज्ञ में इंद्र का आह्वान करता हूं. हे इंद्र! तुम अध्वर्युजनों
द्वारा दिए गए इस सोमरस रूपी मधु का पान करो. (७)
सूक्त-६८ देवता—इंद्र
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१)
जिस प्रकार सरलता से गायों का दूध दुहने के लिए दोहनकर्ता को बुलाया जाता है,
उसी प्रकार रक्षा का अवसर आने पर हर बार इंद्र का आह्वान करते हैं. (१)
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद् रेवतो मदः.. (२)
ऐश्वर्य संपन्न इंद्र सदा प्रसन्न रहते हैं और यजमानों को गाएं देते हैं. हे इंद्र! प्रातःकाल,
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मध्याह्न और सायंकाल के तीन सवनों में आ कर सोमरस का पान करो. (२)
अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारी उत्तम बुद्धियों को हम जानते हैं. तुम हमारी निंदा मत होने दो तथा हमारे
यज्ञ में आओ. (३)
परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४)
हे स्तोताओ! कोई भी इंद्र की हिंसा नहीं कर सकता. तुम मित्रों का मंगल करने वाले
इंद्र का आश्रय लो. (४)
उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद् दुवः (५)
हे स्तोताओ! तुम इंद्र का आश्रय ग्रहण करो. इस से निंदा करने वाले हमारी निंदा नहीं
कर सकेंगे. (५)
उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६)
हम इतने यशस्वी बनें कि शत्रु भी हमारे यश का गान करें. इंद्र के द्वारा सुख प्राप्त कर
के हम सुंदर कृषि से संपन्न बनें. (६)
एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७)
हे स्तोता! ये इंद्र मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले मित्रों को मुदित कराने वाले तथा यज्ञ की
शोभा के रूप हैं. इन इंद्र के लिए सोमरस अर्पण करो. (७)
अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८)
हे इंद्र! तुम सोमरस पी कर वृत्र असुर के लिए मृत्यु रूप बनो तथा युद्ध क्षेत्र में हमारे
ऐश्वर्य की रक्षा करो. (८)
तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९)
हे इंद्र! तुम सैकड़ों कर्म करने वाले हो! हम हवियों के द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं और
धन पाने के लिए तुम्हें अपने यज्ञ में बुलाते हैं. (९)
यो रायो ३वनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा. तस्मा इन्द्राय गायत.. (१०)
इंद्र धन प्रदान करने वाले एवं धन के रक्षक हैं. इंद्र उस के लिए मित्र के समान हैं जो
सोमरस तैयार करता है. हे स्तोताओ! तुम इंद्र की स्तुति करो. (१०)
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सूक्त-६९ देवता—इंद्र
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखाय स्तोमवाहस:.. (११)
हे मेरे मित्र स्तोताओ! तुम यहां यज्ञशाला में विराजो और इंद्र का गुणगान करो. (११)
पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्र सोमे सचा सुते.. (१२)
हे स्तोताओ! वरण करने वालों के स्वामी इंद्र अत्यधिक महान हैं. सोमरस निचोड़ दिए
जाने पर उन्हें यहां बुलाओ. (१२)
सूक्त-६९ देवता—इंद्र
स घा नो योग आ भुवत् स राये स पुरंध्याम्. गमद् वाजेभिरा स न:.. (१)
जब हमें कोई चिंता होती है अथवा हम इंद्र का चिंतन करते हैं, उस समय इंद्र हमारे
सामने प्रकट होते हैं. इंद्र अन्नों को साथ में ले कर हमारे पास आएं. (१)
यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रव:. तस्मा इन्द्राय गायत.. (२)
हे स्तोताओ! जब इंद्र युद्ध में लगे होते हैं, तब शत्रु उन के घोड़ों को नहीं घेर पाते ऐसे
समय इंद्र की स्तुति करो. (२)
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये. सोमासो दध्याशिर:.. (३)
दही से मिला हुआ सोमरस पवित्र है. यह सोमरस सोम पीने वाले इंद्र के लिए तैयार हो
रहा है. (३)
त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथा:. इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो.. (४)
हे इंद्र! तुम सोमरस का पान करने के लिए शीघ्र ही अपने शरीर का विस्तार कर लेते
हो. (४)
आ त्वा विशन्त्वाशव: सोमास इन्द्र गिर्वण: शं ते सन्तु प्रचेतसे.. (५)
हे इंद्र! तुम्हें स्फूर्ति देने वाला सोमरस तुम्हारे शरीर में प्रवेश करे तथा तुम्हें तृप्त बनाए.
(५)
त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो. त्वां वर्धन्तु नो गिर:.. (६)
हे इंद्र! स्तोम, उक्थ और हमारी वाणी रूपी स्तुतियां तुम्हारी वृद्धि करें. (६)
अक्षितोति: सनेदिमं वाजमिन्द्र: सहस्रिणम्. यस्मिन् विश्वानि पौंस्या.. (७)
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यज्ञ कर्म की रक्षा करने वाले इंद्र में सैकड़ों पराक्रम व्याप्त हैं. हमें उन्हीं की सेवा करनी
चाहिए. (७)
मा नो मर्ता अभि द्रुहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः. ईशानो यवया वधम्.. (८)
हे इंद्र! हमारे शत्रु हमारी देह के प्रति हिंसा की भावना न रखें. हे स्वामी इंद्र! तुम हमारे
वध रूप कारण को हम से दूर हटाओ. (८)
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (९)
इंद्र के रथ में हरे रंग के अथवा हरि नाम के घोड़े जोते जाते हैं. आकाश में चमकते हुए
वे घोड़े स्थावर और जंगम दोनों प्रकार के प्राणियों को लांघते हैं. (९)
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (१०)
सारथी इंद्र के रथ में हरि नाम के अथवा हरित वर्ण के घोड़ों को जोड़ते हैं. इंद्र के रथ
के दोनों ओर रहने वाले घोड़े ऐसी सवारी हैं, जिस की कामना की जाती है. वे घोड़े सब को
वश में करते हैं. (१०)
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (११)
हे मरणधर्मा मनुष्यो! सूर्य रूप इंद्र अज्ञानी को अन्न और अंधकार में छिपे हुए पदार्थ
को रूप देते हैं. सूर्य रूप इंद्र अपनी किरणों से उदय हुए हैं. इन के दर्शन करो. (११)
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (१२)
मरुद्गण हवि देने वाले की गर्भ में स्थित संतान की रक्षा करने के कारण यज्ञिय नाम
धारण करते हैं. (१२)
सूक्त-७० देवता—इंद्र
वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (१)
हे इंद्र! तुम ने उषा काल के बाद ही अपनी ज्योति वाली शक्तियों के द्वारा गुफा में छिपे
धन को प्राप्त किया था. (१)
देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद् वसुं गिरः. महामनूषत श्रुतम्.. (२)
हे स्तुतियो! हम स्तोता देवताओं की इच्छा करते हैं. हम इंद्र के सामने अपनी उत्तम
बुद्धि को प्रस्तुत करेंगे. इस प्रकार उन महिमा वाले इंद्र की स्तुति की जाएगी. (२)
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इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (३)
हे इंद्र! तुम सदा ही मरुतों के साथ देखे जाते हो, वे मरुत् भय रहित हैं. तुम्हारा और
मरुतों का तेज समान है, इसलिए तुम सदा मरुतों के साथ देखे जाते हो. (३)
अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (४)
इंद्र की कामना करने वालों से यज्ञ की शोभा बढ़ती है. (४)
अतः परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि. समस्मिन्नृञ्जते गिरः.. (५)
हे इंद्र! तुम ज्योतिर्मान स्वर्ग से हमारे यज्ञ में आओ. हमारी स्तुतियां इंद्र के साथ ही
संयोग करती हैं. (५)
इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि. इन्द्रं महो वा रजसः.. (६)
इंद्र पृथ्वीलोक में, इहलोक में अथवा स्वर्गलोक में तात्पर्य यह कि जहां कहीं भी हों, हम
वहीं से उन्हें बुलाने की इच्छा करते हैं. (६)
इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (७)
पूजा करने वाले यजमान इंद्र की पूजा करते हैं तथा स्तोता इंद्र के ही यश का गान करते
हैं. (७)
इन्द्र इद्धर्योः सचा संमिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (८)
इंद्र के साथ रहने वाले घोड़े हमारे मंत्रोच्चारण के साथ ही रथ में जोड़ दिए जाते हैं.
मनुष्यों के हितैषी इंद्र वज्र धारण करते हैं. (८)
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (९)
इंद्र ने ही सूर्य को स्वर्ग में इसलिए स्थापित किया है कि सब लोग उन्हें देख सकें तथा
इंद्र ने ही अपनी सूर्यरूपी किरणों के द्वारा मेघ का भेदन किया है. (९)
इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (१०)
हे इंद्र! जो युद्ध श्रेष्ठ धन प्राप्त कराने वाला है, उस युद्ध में तुम अपने अतिरिक्त रक्षा
साधनों से हमारी रक्षा करो. (१०)
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे. युजं वृत्रेषु वज्रिणम्.. (११)
अधिक अथवा थोड़ा धन पाने के लिए हम इंद्र को ही बुलाते हैं. इंद्र ने वृत्र असुर पर
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अपने वज्र का प्रहार किया था. (११)
स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि. अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः.. (१२)
हे इंद्र! यह सत्य है कि तुम धन देने वाले और फलों की वर्षा करने वाले हो. तुम किसी
के हटाने से हटते नहीं हो. तुम हमारे इस चरु का भक्षण करो तथा हमारा सुख बढ़ाओ. (१२)
तुज्जेतुज्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः. न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्..
(१३)
मैं धन प्राप्ति के प्रत्येक अवसर पर तथा सदैव धन प्राप्त करने पर धन से संतुष्ट होता
हूं. मैं जिन स्तोत्रों का स्मरण करता हूं, उन में इंद्र की महिमा की कोई सीमा नहीं होती. (१३)
वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा. ईशानो अप्रतिष्कुतः.. (१४)
हे इंद्र! तुम कृषियों को संपन्न करने वाली शक्ति से जलों की वर्षा करते हो. ईशान नाम
वाले इंद्र का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता. (१४)
य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति. इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्.. (१५)
इंद्र पांच भूमियों, मनुष्यों तथा ऐश्वर्यों के भी स्वामी हैं. (१५)
इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (१६)
इंद्र का ध्यान यदि दूसरे स्तोताओं की ओर हो, तब भी हम इंद्र को बुलाते हैं. वे इंद्र
हमारे ही हैं. (१६)
एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्. वर्षिष्ठमूतये भर.. (१७)
हे इंद्र! तुम सदा प्रसन्नता देने वाले धन तथा फलों की वर्षा करने वाले बल को हमारी
रक्षा करने के लिए धारण करो. (१७)
नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै. त्वोतासो न्यर्वता.. (१८)
हे इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित हो कर घोड़ों के स्वामी बनें तथा वृत्र के समान शक्ति
वाले शत्रुओं को भी नष्ट कर डालें. (१८)
इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि. जयेम सं युधि स्पृधः.. (१९)
हे इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित हैं. हम तुम्हारे विकराल बल को धारण करते हुए अपने
शत्रुओं को नष्ट कर डालें. (१९)
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सूक्त-७१ देवता—इंद्र
वयं शूरैभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम्. सासह्वाम पृतन्यतः.. (२०)
हे इंद्र! हमारे वीरों की कोई हिंसा न कर सके. हम अपने वीरों को साथ ले कर उन
शत्रुओं को भी वश में कर लें जो सेना साथ ले कर हम पर आक्रमण करते हैं. (२०)
सूक्त-७१ देवता—इंद्र
महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे. द्यौर्न प्रथिना शवः.. (१)
श्रेष्ठ और महान इंद्र महिमा वाले हैं. उन का पराक्रम आकाश के समान विशाल हो. (१)
समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ. विप्रासो वा धियायवः.. (२)
जो मनुष्य युद्ध की कामना करते हैं, वे अपने पुत्रों के साथ भी युद्ध करने लगते हैं. (२)
यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते. उर्वीरापो न काकुदः.. (३)
सोमरस पीने वाले इंद्र की कोख ककुद अर्थात् ठाट वाले बैल तथा अधिक जल को
धारण करने वाले सागर के समान बढ़ जाती है. (३)
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४)
इंद्र को गौ प्रदान करने वाली धरती हवि देने वाले यजमान के लिए उस वृक्ष की शाखा
के समान हो जाती है, जिस पर पके हुए फल लगे होते हैं. (४)
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५)
हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि देता है, उस के निमित्त तुम्हारे रक्षा साधन सदा प्रस्तुत
रहते हैं. (५)
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६)
इंद्र जब सोमरस पीते हैं, उस समय स्तोम, उक्थ और शस्त्र नाम वाले मंत्र उन के लिए
प्रसन्न करने वाले होते हैं. (६)
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महां अभिष्टिरोजसा.. (७)
हे इंद्र! यहां अर्थात् हमारे यज्ञ में आओ. सोमयागों में सोमरस पीने के कारण उत्पन्न
तुम्हारा हर्षपूर्ण ओज हमारे लिए अभीष्ट और महान है. (७)
एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने. चक्रिं विश्वानि चक्रये.. (८)
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हे अध्वर्युजनो! तुम उक्थ मंत्र बोलते हुए सोमरस को चमसों के द्वारा मिलाओ. यह
सोम निचुड़ जाने पर इंद्र को प्रसन्न करता है. (८)
मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभि स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे. सचैषु सवनेष्वा.. (९)
हे सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र! तुम सोमयागों में हर्षवर्धक सोमरस को पी कर हर्ष प्राप्त करो.
(९)
असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत. अजोषा वृषभं पतिम्.. (१०)
जिस प्रकार कामना करने वाली स्त्रियां उस पति के पास जाती हैं जो उन में गर्भाधान
कर सकता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हें प्राप्त होती हैं. (१०)
सं चोदय चित्रमर्वाग् राध इन्द्र वरेण्यम्. असदित् ते विभु प्रभु.. (११)
हे इंद्र! हमारी ओर उस धन को आने की प्रेरणा दो जो वरण करने योग्य, सुंदर और
सत्य को धारण करने वाला हो. (११)
अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः तुविद्युम्न यशस्वतः.. (१२)
हे इंद्र! तुम हमें महान, यशस्वी और ऐश्वर्य वाला होने की प्रेरणा दो. (१२)
सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्. विश्वायुर्धेह्यक्षितम्.. (१३)
हे इंद्र! हमें वह यज्ञ प्रदान करो जो गायों से युक्त, हवियों से संपन्न तथा पूर्ण आयु को
देने वाला हो. (१३)
अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्रसातमम्. इन्द्र ता रथिनीरिषः.. (१४)
हे इंद्र! सहस्रों मनुष्यों द्वारा सेवन करने वाले धन तथा रथ वाली सेनाओं को हमें प्रदान
करो. (१४)
वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम्. होम गन्तारमूतये.. (१५)
हम धन के स्वामी, वसुओं के ईश्वर, ऋग्वेद के द्वारा प्रशंसित इंद्र की साधनों से पूजा
करते हैं. (१५)
सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः. इन्द्राय शूषमर्चति.. (१६)
महान इंद्र के लिए सोमयाग में हर बार सोमरस निचोड़े जाने पर शत्रु भी इंद्र के बल की
प्रशंसा करते हैं. (१६)
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सूक्त-७२ देवता—इंद्र
सूक्त-७२ देवता—इंद्र
विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः
सनिष्यवः पृथक्.
तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि.
इन्द्रं न यज्ञैश्चितयन्त आयव स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (१)
हे इंद्र! फलों की वर्षा की याचना करने वाले, भांतिभांति के स्वर्गों की कामना करने
वाले तथा प्रातः, मध्याह्न और सायं सवनों में तुम्हारी ही प्रार्थना करते हैं. जिस प्रकार नौका
अन्न के पूलों से भरी होती है, उसी प्रकार हम बल धारण के लिए नियुक्त करते हैं. हम इंद्र को
प्रसन्न करने की इच्छा से अपने स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं. (१)
वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्वो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र
निःसृजः.
यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि.
आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (२)
हे इंद्र! अन्न की कामना करने वाले दंपती गोदान के अवसर पर तुम्हारा ध्यान करते हैं
तथा तुम से फल देने की प्रार्थना करते हैं. तुम स्वर्ग में जाने वाले व्यक्तियों को जानते हो.
तुम्हारा वर्षा करने में सहायक वज्र तुम्हारे हाथ में प्रकट होता है. (२)
उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्य १ र्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता
हवीमभिः.
यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिचिकेतसि.
आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (३)
हम स्वर्ग प्राप्ति की कामना से सूर्य को प्रकट करने वाली उषा को हवि प्रदान करते हैं.
हे वर्षणशील इंद्र! तुम युद्ध के इच्छुक शत्रुओं का संहार करने के लिए अपना वज्र हाथ में
लेते हो. मैं ने जिन नवीन स्तोत्रों की रचना की है, तुम उन्हें सुनो. (३)
सूक्त-७३ देवता—इंद्र
तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि.
त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधा ऽ सि.. (१)
हे वीर इंद्र! यज्ञ के सभी सवन तुम्हारे निमित्त हों. तुम्हारे निमित्त ही मैं उन मंत्रों का पाठ
करता हूं. तुम सब के पोषक एवं आह्वान के योग्य हो. (१)
नू चिन्नु तोन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र.
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न वीर्यमिन्द्र ते न राध:.. (२)
हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम्हारा सुंदर रूप, शक्ति, धन और महिमा को दूसरा कोई भी प्राप्त
नहीं कर सकता. (२)
प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्.
विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः.. (३)
हे यजन करने वालो! तुम अपनी हवियों के द्वारा इंद्र को प्रसन्न करो. इंद्र मनुष्यों को
मन चाहे फल प्रदान करते हैं. हे इंद्र! तुम मेरे हवि रूप अन्न का सेवन करो. (३)
यदा वज्रं हिरण्यमिदथा रथं हरी यमस्य वहतो वि सूरिभिः.
आ तिष्ठति मघवा सनश्रुत इन्द्रो वाजस्य दीर्घश्रवसस्पतिः.. (४)
इंद्र के हरे रंग के घोड़े इंद्र के स्वर्णिम वज्र को एवं रथ बंधी रस्सियों के सहारे रथ को
खींचते हैं. उस अवसर पर अत्यधिक तेज वाले इंद्र उस रथ पर बैठते हैं. (४)
सो चिन्नु वृष्टिर्यूथ्या ३ स्वा सचां इन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि प्रष्णुते.
अव वेति सुक्ष्यं सुते मधूदिद्धूनोति वातो यथा वनम्.. (५)
सोमरस के निचोड़े जाने पर इंद्र हमारे यज्ञ मंडप में आते हैं. वायु जिस प्रकार वन को
कंपित करता है, इंद्र उसी प्रकार मेघ को कंपित कर देते हैं. (५)
यो वाचा विवाचो मृध्रवाचः पुरू सहस्राशिवा जघान.
तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसि पितेव यस्तविषीं वावृधे शवः.. (६)
इंद्र दुष्कर्म करने वालों का वध करते हैं एवं विकृत वाणी वालों की वाणी को मधुरता
प्रदान करते हैं. पिता जिस प्रकार बल की वृद्धि करता है, इंद्र उसी प्रकार अपने भक्तों का
बल बढ़ाते हैं. ऐसे पराक्रमी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (६)
सूक्त-७४ देवता—इंद्र
यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (१)
हे सोमरस का पान करने वाले इंद्र! हमारे हजारों की संख्या वाले घोड़े, गायों और
शुभ्रियों के अमृत होने की बात कहो; क्योंकि तुम अमृतत्व को प्राप्त कर चुके हो. (१)
शिप्रिन् वाजानां पते शचीवस्तव दंसना.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (२)
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