अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-७२ देवता—इंद्र
विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः
सनिष्यवः पृथक्.
तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि.
इन्द्रं न यज्ञैश्चितयन्त आयव स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (१)
हे इंद्र! फलों की वर्षा की याचना करने वाले, भांतिभांति के स्वर्गों की कामना करने
वाले तथा प्रातः, मध्याह्न और सायं सवनों में तुम्हारी ही प्रार्थना करते हैं. जिस प्रकार नौका
अन्न के पूलों से भरी होती है, उसी प्रकार हम बल धारण के लिए नियुक्त करते हैं. हम इंद्र को
प्रसन्न करने की इच्छा से अपने स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं. (१)
वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्वो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र
निःसृजः.
यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि.
आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (२)
हे इंद्र! अन्न की कामना करने वाले दंपती गोदान के अवसर पर तुम्हारा ध्यान करते हैं
तथा तुम से फल देने की प्रार्थना करते हैं. तुम स्वर्ग में जाने वाले व्यक्तियों को जानते हो.
तुम्हारा वर्षा करने में सहायक वज्र तुम्हारे हाथ में प्रकट होता है. (२)
उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्य १ र्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता
हवीमभिः.
यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिचिकेतसि.
आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (३)
हम स्वर्ग प्राप्ति की कामना से सूर्य को प्रकट करने वाली उषा को हवि प्रदान करते हैं.
हे वर्षणशील इंद्र! तुम युद्ध के इच्छुक शत्रुओं का संहार करने के लिए अपना वज्र हाथ में
लेते हो. मैं ने जिन नवीन स्तोत्रों की रचना की है, तुम उन्हें सुनो. (३)
सूक्त-७३ देवता—इंद्र
तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि.
त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधा ऽ सि.. (१)
हे वीर इंद्र! यज्ञ के सभी सवन तुम्हारे निमित्त हों. तुम्हारे निमित्त ही मैं उन मंत्रों का पाठ
करता हूं. तुम सब के पोषक एवं आह्वान के योग्य हो. (१)
नू चिन्नु तोन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र.
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