अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 977 of 1063
Read in contextसूक्त-६० देवता—इंद्र
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१)
हे वीर एवं स्थिर इंद्र! तुम दुष्कर्म करने वाले वीरों को रोकते हो. (१)
एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र मे सचा.. (२)
हे असीमित धन के स्वामी इंद्र! तुम मेरे सहायक बनो. तुम अपनी पुष्ट करने वाली
शक्ति से हम यजमानों में दान करने की शक्ति की स्थापना करो. (२)
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्वा सुतस्य गोमतः.. (३)
हे अन्नों के स्वामी इंद्र! तुम ब्रह्मा के समान आलसी मत बनो. तुम बुद्धि देने वाले तैयार
सोमरस के द्वारा अत्यधिक आनंद प्राप्त करो. (३)
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४)
इंद्र की भूमि गाएं प्रदान करने वाली हैं. यह हवि देने वाले यजमान के लिए पकी हुई
शाखा के समान बने. (४)
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५)
हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि प्रदान करता है, उस के लिए तुम्हारे रक्षा के साधन शीघ्र
प्राप्त हो जाते हैं. (५)
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६)
सोमरस का पान करते समय इंद्र को स्तोत्र, उक्थ और शस्त्र नाम की स्तुतियां बहुत
प्रिय लगती हैं. (६)
सूक्त-६१ देवता—इंद्र
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्..
(१)
हे वज्रधारी, शत्रुओं को पराजित करने वाले, अश्वों की शोभा से युक्त एवं मनचाहे
पदार्थों के वर्षक इंद्र! हम तुम्हारे हवि की पूजा करते हैं. (१)
येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि..
(२)
ebook converter DEMO Watermarks*