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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
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दूसरा प्रकरण । ६७

सकता है, वैसे अधिष्ठान चेतन के होते हुए भो मुक्ति में कभी
न कभी प्रपंच भी हो जावेगा ?

उत्तर—शरीर के सहित यह विश्व किंचित् भी सत्य नहीं
है, और असत्य है, किन्तु अनिर्वचनीय अज्ञान का कार्य होने से
अनिर्वचनीय है । उस अनिर्वचनीय की अज्ञान की निवृत्ति
होने से उसके कार्य विश्व की भी निवृत्ति हो जाती है ।
अज्ञान ही कल्पित विश्व का कारण था, उसके नाश हो
जाने से फिर मुक्त पुरुष में विश्व उत्पन्न नहीं होता है ।
जैसे मंद अंधकार के दूर होने से फिर सर्प की भ्रान्ति भी
नहीं होती है, वैसे प्रकाश-स्वरूप आत्मा के ज्ञान से फिर
कदापि विश्व की उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १९ ॥

मूलम् ।

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा ।
कल्पनामात्रमेवैतत्किंमे कार्यं चिदात्मनः ॥ २० ॥

पदच्छेदः ।

शरीरम्, स्वर्गनरकौ, बन्धमोक्षौ, भयम्, तथा कल्पना-
मात्रम्, एव, एतत्, किम्, कार्यम्, चिदात्मनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एतत् =यहएव =निःसंदेह
शरीरम् =शरीरकल्पनामात्रम् =कल्पना-मात्र है
स्वर्गनरकौ =स्वर्ग और नरकमे चिदात्मनः =मुझ चैतन्य आत्मा को
बन्धमोक्षौ =बन्ध और मोक्ष
तथा =औरकिम् =क्या
भयम् =भयकार्यम् =कर्त्तव्य है ।
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६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि संपूर्ण प्रपंच अवास्तविक माना जावे, तब वर्ण और जाति आदिकों का आश्रय जो स्थूलशरीर है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? और शरीर को आश्रयण करके प्रवृत्त जो विधि-निषेध शास्त्र है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? फिर उस शास्त्र द्वारा बोधन किये हुए जो स्वर्ग नरक हैं, वे भी सब अवास्तविक अर्थात् मिथ्या ही होवेंगे ? फिर स्वर्गादिकों में राग, और नरकादिकों से भय भी मिथ्या होंगे । और शास्त्र ने जो बन्ध मोक्ष कहे हैं, वे भी सब मिथ्या ही होंगे ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि शरीरादिक सब कल्पना-मात्र ही हैं । सच्चिदानन्द-स्वरूप मुझ आत्मा का इन शरीरादिकों के साथ कौन सम्बन्ध है, किन्तु कोई भी सम्बन्ध नहीं है । क्योंकि सत्य मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध नहीं बन सकता है और मेरा शरीरादिकों के साथ कोई भी प्रयोजन नहीं है । और जितने विधि-निषेध वाक्य हैं, वे सब अज्ञानी के लिये हैं, ज्ञानवान् का उनमें अधिकार नहीं है, इस वास्ते ज्ञानवान् की दृष्टि में शरीरादिक और विधि-निषेध सब अवास्तविक ही हैं ॥ २० ॥

मूलम् ।
अहोजनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम ।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, जनसमूहे, अपि, न, द्वैतम्, पश्यतः, मम, अरण्यम्, इव, संवृत्तम्, क्व, रतिम्, करवाणि, अहम् ॥

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दूसरा प्रकरण । ६९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है किन संवृत्तम्=नहीं वर्तता है
जनसमूहे=जीवों के बीच मेंतस्मात्=तब
अपि=भीक्व=कैसे
मम=मुझअहम्=मैं
पश्यतः=देखते हुए कारतिम्=मोह को
अरण्यम् इव=अरण्यवत्करवाणि=करूँ ॥
द्वैतम्=द्वैत

भावार्थ

पूर्ववाले वाक्य द्वारा जनकजी ने कहा कि स्वर्गादिकों के साथ मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है । अब इस वाक्य करके कहते हैं कि इस लोक के साथ भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है ।

जनकजी कहते हैं कि हे प्रभो ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं द्वैत को देखता भी हूँ, तब भी जनों का जो समूह-रूपी द्वैत वन की तरह उत्पन्न हुआ है, उसके बीच में होता हुआ भी उसके साथ मुझको कोई प्रीति नहीं है, क्योंकि मैंने उसको मिथ्या जान लिया है । मिथ्या वस्तु के साथ ज्ञानवान् प्रीति को नहीं करते हैं । अज्ञानी मिथ्या पदार्थों के साथ प्रीति करते हैं । इतना ही ज्ञानी और अज्ञानी का भेद है ॥ २१ ॥

मूलम् ।

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव हि मे बंध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २२ ॥

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७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, जीवः, न, अहम्, अहम्,
हि, चित्, अयम्, एव, हि, मे, बन्धः, आसीत्, या, जीविते,
स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंहि =निश्चय करके
देहः =शरीरचित् =चैतन्य-रूप हूँ
न =नहीं हूँमे =मेरा
मे =मेराअयम् एव =यही
देहः =शरीरबन्धा =बँधा था
न =नहीं हैया =जो
अहम् =मैंजीविते =जीने में
जीवः =जीवस्पृहा =इच्छा
न =नहीं हूँआसीत् =थी
अहम् =मैं

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शरीर में अहंता और ममता अवश्य करनी होगी ? क्योंकि बिना अहंता और ममता के व्यवहार की सिद्धि नहीं होती है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मैं देह नहीं हूँ, क्योंकि देह जड़ है, मैं चेतन हूँ, और मेरा देह भी नहीं है, क्योंकि मैं असंग हूँ, मैं जीव अहंकारी भी नहीं हूँ, क्योंकि अहंकार का कर्त्तृत्व धर्म है और नेरा अकर्त्तृत्व धर्म है ।

**प्रश्न—**फिर तुम कौन हो ?

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दूसरा प्रकरण । ७१

उत्तर—मैं चैतन्य-स्वरूप अहंकार का भी साक्षी अकर्त्ता, अभोक्ता हूँ।

प्रश्न—जब तुम खान पान आदिक सब व्यवहारों को करते हो, तो तुम अकर्त्ता कैसे हो ?

उत्तर—अज्ञानी पुरुषों की दृष्टि में मैं व्यवहारों का कर्त्ता प्रतीत होता हूँ, परन्तु वास्तव में मैं कर्त्ता नहीं हूँ। क्योंकि कर्तृत्व भोक्तृत्वपना अहंकारी का धर्म है, मुझ आत्मा के ये धर्म नहीं हैं। और ऐसा भी कहा है—

निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ।
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्ति कि मे स्यादन्यकल्पनात् ॥ १ ॥

अर्थात् सोना-जागना, भिक्षा माँगना, स्नान करना, पवित्र रहना, इन सबकी मैं इच्छा नहीं करता हूँ, और न मैं इनको करता हूँ। यदि कोई देखनेवाला मेरे में ऐसी कल्पना करता है कि मैं इनको करता हूँ, तो दूसरे की कल्पना करने से मेरी क्या हानि हो सकती है ॥ १ ॥

अब इस विषे दृष्टांत कहते हैं—

गुंजपुंजादि दह्येत नान्यारोपितवह्निना ।
नान्यारोपितसंसारधर्मनिवमहं भजे ॥ २ ॥

अर्थात् जाड़े के दिनों में वन विषे जब कि बंदरों को सरदी लगती है, तब वह घुँघची का ढेर लगाकर उसके पास मिल करके बैठ जाते हैं और घुँघचियों के, याने गुंजा के, ढेर में अग्नि की मिथ्या कल्पना करते हैं। कारण यह है कि मिलकर बैठने से उनमें गरमी उत्पन्न होती है, पर वे

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७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

यह जानते हैं कि इस गुंजे के पुंज से हम सबको गरमी आ
रही है। जैसे गुंजा में बंदरों करके कल्पना की हुई अग्नि
दाह का कारण नहीं हो सकती है, वैसे ही मूर्ख अज्ञानियों
करके कल्पना किये हुए खान पानादि व्यवहार भी विद्वान्
की हानि नहीं कर सकते हैं । क्योंकि विद्वान् वास्तव में
अकर्ता और अभोक्ता है । उसकी दृष्टि में न तो देहादिक
हैं, और न उनके कर्तृत्व और भोक्तृत्व धर्म हैं, किन्तु वे
असंग एवं चैतन्य-स्वरूप हैं ।

प्रश्न—अविवेकी विवेकिकों को जीने की इच्छा क्यों
होती है ?

उत्तर—जो उनके जीने की इच्छा है यही उनका बंध
है, जीने की इच्छा करके ही अविवेकी पुरुष अनर्थों को
करते हैं, विवेकी पुरुष नहीं करते हैं । इस वास्ते जनकजी
कहते हैं कि मेरे जीने की और मरने की इच्छा भी नहीं
है । क्योंकि जीने-मरने की इच्छा, ये सब अंतःकरण के धर्म
हैं, मुझ असंग चैतन्य-स्वरूप आत्मा के धर्म नहीं हैं ॥ २२ ॥

मूलम् ।

अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्वाक् समुत्थितम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोथौ चित्तवाते समुद्यते ॥ २३ ॥

पदच्छेदः ।

अहो, भुवनकल्लोलैः, विचित्रः, द्राक्, समुत्थितम्, मयि,
अनन्तमहाम्भोथौ, चित्तवाते, समुद्यते ॥

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दूसरा प्रकरण । ७३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो =आश्चर्य है किविचित्रैः =अनेक प्रकार के
अनन्तमहा-<br>म्भोदौ =अपार समुद्र रूपभुवनकल्लोलैः =जगत् रूपी तरंगों के साथ
मयि =मुझ विषेमम =मेरी
चित्तवाते<br>समुद्यते =चित्त रूपी पवन के उठने पर भीद्राक् =अत्यन्त
समुत्थितम् =अभिन्नता है ॥

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि जैसे वायु चलने से समुद्र में बड़े-छोटे अनेक प्रकार के तरंग उत्पन्न होते हैं, और वायु के स्थित होने से वे तरंग लय हो जाते हैं, तैसे आत्मा-रूपी महान् समुद्र में चित्त-रूपी वायु के वेग से अनेक ब्रह्मांड-रूपी तरंग उत्पन्न होते हैं, और चित्त के शान्त होने से वे लय हो जाते हैं और जैसे समुद्र के तरंग समुद्र से ही उत्पन्न होते हैं और समुद्र में ही लय हो जाते हैं, और समुद्र के तरंग जैसे समुद्र से भिन्न नहीं हैं, वैसे ब्रह्मांड-रूपी अनेक तरंग भी मेरे से भिन्न नहीं हैं । मेरे से उत्पन्न होते हैं और मेरे में ही लय होते हैं, क्योंकि सब मेरे में ही कल्पित हैं । कल्पित पदार्थ अधिष्ठान से भिन्न नहीं होता है ॥ २३ ॥

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति ।
अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः ॥ २४ ॥

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७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्त, महाम्भोborder, चित्तवाते, प्रशाम्यति,
अभाग्यात्, जीववणिकः, जगत्पोतः, विनश्वरः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अनन्त महाम्भोborder = अपार समुद्र-रूपअभाग्यात् = अभाग्य से
मयि = मुझ विषेजगत्पोतः = जगत्-रूपी नौका अर्थात् शरीर
$\begin{matrix} \textbf{चित्तवाते} \ \textbf{प्रशाम्यति} \end{matrix} \mathbf{=}चित्त-रूपी पवन के शान्त होने परविनश्वरः = नाश हुआ है ॥
जीववणिजः = जीव-रूपी वणिग् के

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मुझ अनंत महान् में जब संकल्प-विकल्पात्मक मन-रूपी वायु शान्त हो जाता है, अर्थात् जब मन संकल्पादिकों से रहित होता है, तब जीव-रूपी व्यापारी की शरीर-रूपी नौका प्रारब्धकर्म-रूपी नदी के क्षय होने पर नाश हो जाती है ॥ २४ ॥

मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः ।
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः ॥ २५ ॥

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोborder, आश्चर्यम्, जीववीचयः,
उद्यन्ति, घ्नन्ति, खेलन्ति, प्रविशन्ति, स्वभावतः ॥

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दूसरा प्रकरण । ७५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आश्चर्यम् =आश्चर्य्य है किघ्नन्ति =परस्पर लड़ती हैं
मयि =मुझच =और
अनन्तम हाम्भोधा=$अपार समुद्र विषेखेलन्ति =खेलती हैं
+ च =और
जीववीचयः =जीव-रूपी तरंगेंस्वभावतः =स्वभाव से
उद्यन्ति =उठती हैंप्रविशन्ति =लय होती हैं ॥

भावार्थ ।

अबाधितानुवृत्ति करके अपने में संपूर्ण व्यवहार को देखते हुए जनकजी कहते हैं—

**प्रश्न—**बाधिता अनुवृत्ति का क्या अर्थ है ?

**उत्तर—**बाधित हुए पदार्थ की जो पुनः अनुवृत्ति अर्थात् प्रतीति है, उसका नाम बधितानुवृत्ति है !

दृष्टांत ।

जैसे एक पुरुष किसी वृक्ष के नीचे, गर्मी के दिनों में, दोपहर के समय बैठा था । उसको प्यास लगी । वह पानी की खोज करने लगा । तब उसको दूर से जल दिखाई दिया । वह उस जल के पीने के वास्ते जब गया, तब उसको जल न मिला । क्योंकि रेत में जो सूर्य की किरणें पड़ती थीं, वे ही दूर से जल रूप होकर दिखाई पड़ती थीं । उसने जान लिया कि यह रेत ही मुझको भ्रम करके जल दिखाई देता था, वह तो जल है नहीं, तब वह लौट करके उसी वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया । और फिर उसको वही रेता किरण के सम्बन्ध से चमकता हुआ जल-रूप से दिखाई देने

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७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

लगा, परन्तु वह पुरुष जल की इच्छा करके वहाँ न गया, क्योंकि उसको निश्चय हो गया कि यह जल नहीं है, दूरत्व दोष से और किरण के सम्बन्ध से मुझको जल दिखाई देता है। पुरुष के यथार्थ ज्ञान करके बाधित हुए पर भी जल-ज्ञान की जो पुनः अनुवृत्ति अर्थात् प्रतीति है, उसी का नाम बाधिता अनुवृत्ति है।

दाष्टांत ।

आत्मा के अज्ञान करके जो जगत् सत्य की तरह प्रतीत होता था, उसके सत्यवत् ज्ञान का बाध आत्मा के ज्ञान से भी हो गया, तथापि उसकी अनुवृत्ति अर्थात् पुनः जो उसकी प्रतीति विद्वान् को होती है, वही बाधिता अनुवृत्ति कही जाती है। वह प्रतीति विद्वान् की कुछ हानि नहीं कर सकती है, क्योंकि विद्वान् उसको असत्य जानकर उसमें फिर आसक्ति नहीं करता है, किंतु मिथ्या जानकर अपने आत्मानन्द में ही मग्न रहता है।

जनकजी कहते हैं कि क्रिया से रहित, निर्विकार, आत्मा-रूपी महान् समुद्र में जीव-रूपी वीचियाँ अर्थात् अनेक तरङ्गैं उत्पन्न होती हैं और परस्पर अध्यास से वे जीव आपस में मारपीट करते हैं, खेलते हैं, लड़ते हैं। जैसे स्वप्ने के मारे जीव स्वप्न में परस्पर विरोधादिकों को करते हैं और जब उनके अविद्यादि का नाश हो जाता है, तब फिर मेरे असली स्वरूप में ही लय हो जाते हैं। फिर अविद्यादिकों करके उत्पन्न होते हैं, फिर लय होते हैं और जैसे घट-रूप उपाधि की उत्पत्ति से घटाकाश में उत्पत्ति

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दूसरा प्रकरण । ७७

व्यवहार होता है और घट-रूपी उपाधि के नाश होने से घटाकाश में नाश का व्यवहार होता है, वास्तव में आकाश की न तो उत्पत्ति होती है और न नाश होता है, वैसे ही शरीरस्थ आत्मा की भी न उत्पत्ति होती है, और न नाश होता है । ज्ञानवान् को बाधितानुवृत्ति करके जगत् की प्रतीति भी होती है, तब भी उसकी कोई हानि नहीं है ॥ २५ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

तीसरा प्रकरण (आत्मज्ञान-महिमा)

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तीसरा प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः ।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।
अविनाशिनम्, आत्मानम्, एकम्, विज्ञाय, तत्त्वतः, तव, आत्मज्ञस्य, धीरस्य, कथम्, अर्थार्जने, रतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एकम् =अद्वैतआत्मज्ञस्य =आत्मज्ञानी
अविनाशिनम् =अविनाशीधीरस्य =धीर को
आत्मानम् =आत्मा कोकथम् =क्यों
तत्त्वतः =यथार्थअर्थार्जने =धन के संपादन करने में
विज्ञाय =जान करके
तव =तुझरति =प्रीति है ॥

भावार्थ ।
जनकजी के अनुभव की परीक्षा करके अष्टावक्रजी फिर उसकी परीक्षा करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! नाश से रहित, निर्विकल्प, काल-परिच्छेद से रहित, देश-परिच्छेद से रहित, वस्तु-परिच्छेद से रहित, द्वैतभाव से रहित, चैतन्य-स्वरूप आत्मा को जान करके फिर तुझ धीर की व्यावहारिक धन

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तीसरा प्रकरण । ७९

के संग्रह करने में कैसे प्रीति होती है ? अर्थात् आत्मज्ञानी होकर फिर भी तू धनादिकों में प्रीतिवाला दिखाई पड़ता है, इसमें क्या कारण हैं ? ॥ १ ॥

मुनि के प्रश्न के उत्तर को, मुनि से सुनने की इच्छा करके, उससे आप ही प्रश्न पूछते हैं—

मूलम् ।

आत्माऽऽज्ञानादहो प्रीतिर्विषय भ्रमगोचरे ।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

आत्माऽऽज्ञानात्, अहो, प्रीतिः, विषयभ्रमगोचरे, शुक्तेः, अज्ञानतः, लोभः, यथा, रजतविभ्रमे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है कियथा=जैसे
आत्माऽऽज्ञानात्=आत्मा के अज्ञान सेशुक्तेः=सीपी के
अज्ञानतः=अज्ञान से
$\begin{matrix} विषयभ्रम \ गोचर \end{matrix}$=विषय के भ्रम के होने पररजतविभ्रमे=रजत की भ्रांति में
प्रीतिः=प्रीति होती हैलोभः=लोभ होता है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**हे भगवन् ! आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर धनादिकों के संग्रह करने में क्या दोष है ?

**उत्तर—**हे शिष्य ! विषयों में अर्थात् स्त्री पुत्र धनादिकों में जो प्रीति होती है, वह आत्मा के स्वरूप के अज्ञान

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८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

से ही होती है, आत्मा के ज्ञान से नहीं होती है। क्योंकि जब आत्मा का ज्ञान होता है, तब विषयों का बाध हो जाता है। इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टांत को कहते हैं—जैसे शुक्ति के अज्ञान से, और उसमें रजतभ्रम के होने से, उस रजत में लोभ हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगाः, इव, सागरे, सः, अहम्, अस्मि, इति, विज्ञाय, किम्, दीनः, इव, धावसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र =जिस आत्मा-रूपी समुद्र मेंअहम् =मैं
इदम् =यहअस्मि =हूँ
विश्वम् =संसारइति =इस प्रकार
तरंगाः =तरंगों केविज्ञाय =जान करके
इव =समानकिम् =क्यों
स्फुरति =स्फुरण होता हैदीनः इव =दीन की तरह
सः =वहीधावसि =तू दौड़ता है ॥

भावार्थ ।

जैसे समुद्र में तरंगादिक अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होते हैं

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तीसरा प्रकरण । ८१

वैसे ही यह जगत् भी अपनी सत्ता से रहित स्फुरण होता है,
पर्व सबका अधिष्ठान आत्मा ज्यों का त्यों मैं हूँ। इस प्रकार
जिसने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, वह दीन की
तृष्णा करके व्याकुल हुए की तरह विषयों की तरफ नहीं
दौड़ता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।
श्रुत्वाऽऽपि शुद्धचैतन्यमात्मानमितसुन्दरम् ।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।
श्रुत्वा, अपि, शुद्धचैतन्यम्, आत्मानम्, अतिसुन्दरम्,
उपस्थे, अत्यन्तसंसक्तः, मालिन्यम्, अधिगच्छति ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।
अतिसुंदरम् = अत्यन्त सुंदर
शुद्धचैतन्यम् = शुद्ध चैतन्य
आत्मानम् = आत्मा को
श्रुत्वाअपि = जान करके भी
उपस्थे = { समीपवर्ती विषय में

अन्वयः । शब्दार्थ ।
अत्यन्तसंसक्तः = { अत्यन्त आसक्त हुआ पुरुष
मालिन्यम् = मूढ़ता को
अधिगच्छति = प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।
आचार्य ने ऊपरवाले तीनों श्लोकों करके ज्ञानी शिष्य
के लिये दृश्यमान विषय-व्यवहार की निन्दा की ।
अब सब ज्ञानियों के प्रति विषयक व्यवहार की निन्दा
शिष्य की परीक्षा के लिए करते हैं—
आत्मवित् गुरु के मुख से और वेदांत-वाक्य से आत्मा

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८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

का शुद्ध स्वरूप श्रवण करके और साक्षात्कार करके भी जो पुरुष समीपवर्ती विषयों में अत्यन्त संसक्त होता है, वह कैसे मूढ़ता को प्राप्त होता है, यह बड़े आश्चर्य की वार्ता है ॥४॥

मूलम् ।

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वभूतेषु, च, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि, मुनेः, जानतः, आश्चर्यम्, ममत्वम्, अनुवर्तते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मानम्आत्मा कोजानतःजानते हुए
सर्वभूतेषुसब भूतों मेंमुनेःमुनि को
चऔरममत्वम्ममता
आत्मनिआत्मा मेंअनुवर्ततेहोती है
सर्वभूतानिसब भूतों कोआश्चर्यम्यही आश्चर्य है ॥

भावार्थ ।

ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यंत सम्पूर्ण भूतों में जिसने अधिष्ठानभूत आत्मा को जान लिया है, और फिर सम्पूर्ण भूतों को जिसने आत्मा में जान लिया है, अर्थात् सम्पूर्ण भूत रज्जु-सर्प की तरह आत्मा में कल्पित हैं, ऐसा जान करके भी फिर जिसका विषयों में ममत्व होवे, तो आश्चर्य की वार्ता है । क्योंकि जिसने शुक्ति में अध्यस्त रजत को जान लिया है, उसकी प्रवृत्ति फिर उस रजत के लिये नहीं होती है ॥ ५ ॥

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तीसरा प्रकरण । ८३

मूलम् ।

आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः ।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

आस्थितः, परमाद्वैतम्, मोक्षार्थे, अपि, व्यवस्थितः, आश्चर्यम्, कामवशगः, विकलः, केलिशिक्षया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
परमाद्वैतम्= परम अद्वैत कोकामवशगः= काम के वश होकर
आस्थितः= आश्रय किया हुआकेलिशिक्षया= क्रीड़ा के अभ्यास से
+ च= औरविकलः= व्याकुल होता है
मोक्षार्थे अपि= मोक्ष के लिये भीआश्चर्यम्= यही आश्चर्य है ॥
व्यवस्थितः= उद्यत हुआ पुरुष

भावार्थ ।

जिसने सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से शून्य अद्वैत आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, और सच्चिदानन्द आत्मा में जिसकी निष्ठा हो चुकी है । यदि फिर वह पुरुष काम के वश होकर नाना प्रकार की क्रीड़ा करता हुआ दिखाई पड़े, तो महान् आश्चर्य है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः ।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः ॥ ७ ॥

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८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

उद्भूतम्, ज्ञानदुर्मित्रम्, अवधार्य, अतिदुर्बलः, आश्चर्यम्, कामम्, आकाङ्क्षेत्, कालम्, अन्तम्, अनुश्रितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
उद्भूतम् =उत्पन्न हुएअन्तं कालम् =अन्तकाल को
ज्ञानदुर्मित्रम् =ज्ञान के शत्रु काम कोअनुश्रितः =आश्रय करता हुआ पुरुष
अवधार्य =धारण करकेकामम् =कामना को
अतिदुर्बलः =दुर्बल होता हुआआकाङ्क्षेत् =इच्छा करता है
च =औरआश्चर्यम् =यही आश्चर्य है ॥

भावार्थ ।

जो ज्ञानी पुरुष काम को ज्ञान का अत्यन्त वैरी जानता हुआ फिर भी काम की इच्छा करे, तो इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है । जैसे मृत्यु करके ग्रसित हुए पुरुष को समीपवर्ती विषय-भोग की इच्छा नहीं होती है—वैसे ही विवेकी पुरुष को भी विषय-भोग की इच्छा न होनी चाहिए ॥ ७ ॥

मूलम् ।

इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः ।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

इह, अमुत्र, विरक्तस्य, नित्यानित्यविवेकिनः, आश्चर्यम्, मोक्षकामस्य, मोक्षात्, एव, विभीषिका ॥

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तीसरा प्रकरण । ८५

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
इह = { इस लोक के भोग विषेच = और
+च = औरमोक्षकामस्य = { मोक्ष के चाहनेवाले पुरुष को
अमुत्र = { परलोक के भोग विषेमोक्षात् एव = मोक्ष से ही
विरक्तस्य = विरक्तविभीषिका = भय है
नित्यानित्यविवेकिनः = { नित्य और अनित्य के विचार करनेवालेआश्चर्यम् = यही आश्चर्य है ।।

भावार्थ ।
आत्मा नित्य है और शरीरादिक अनित्य हैं । इन दोनों के विवेचन करवेवाले का नाम विवेकी है। और आनन्द-रूप ब्रह्म की प्राप्ति का नाम मोक्ष है । उस मोक्ष की कामना-वाले ज्ञानी को ऐसा भय हो कि असद्रूप स्त्री, पुत्र और धनादिकों के साथ मेरा वियोग हो जायगा, तो महान् आश्चर्य है । क्योंकि स्वप्न में देखे हुए धन का जाग्रत् में नाश होने से मोह किसी को भी नहीं हुआ है ॥ ८ ॥

मूलम् ।
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा ।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।
धीरः, तु, भोज्यमानः, अपि, पीड्यमानः, अपि, सर्वदा, आत्मानम्, केवलम्, पश्यन्, न, तुष्यति, न, कुप्यति ॥

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८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धीरः= ज्ञानी पुरुषसर्वदा= नित्य
तु= तोकेवलम्= एक
भोज्यमानः= भोगता हुआआत्मानम्= आत्मा को
अपि= भीपश्यन्= देखता हुआ
च= औरन तुष्यति= न तो प्रसन्न होता है
पीड्यमानः= पीड़ित होता हुआ+ च= और
अपि= भीन कुप्यति= न कोप करता है ॥

भावार्थ ।

ज्ञानी को शाक और कोप भी न होना चाहिए । ज्ञानी पुरुष लोकों की दृष्टि में विषयों को भोक्ता हुआ भी, और लोकों करके निन्दित और पीड़ा को प्राप्त हुआ भी, सर्वदा सुख-दुःख के भोग से रहित केवल आत्मा को देखता हुआ न तो हर्ष को और न कोप को प्राप्त होता है । क्योंकि तोष और रोष आत्मा में नहीं रह सकते हैं । यदि ज्ञानी में भी तोष और रोष रहें, तो बड़ा आश्चर्य है ॥ ९ ॥

मूलम् ।

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत् ।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः ॥ १० ॥

पदच्छेदः ।

चेष्टमानम्, शरीरम्, स्वम्, पश्यति, अन्यशरीरवत्, संस्तवे, च, अपि, निन्दायाम्, कथम्, क्षुभ्येत्, महाशयः ॥