Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

तीसरा प्रकरण (आत्मज्ञान-महिमा)

Page 85Permalink

तीसरा प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः ।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।
अविनाशिनम्, आत्मानम्, एकम्, विज्ञाय, तत्त्वतः, तव, आत्मज्ञस्य, धीरस्य, कथम्, अर्थार्जने, रतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एकम् =अद्वैतआत्मज्ञस्य =आत्मज्ञानी
अविनाशिनम् =अविनाशीधीरस्य =धीर को
आत्मानम् =आत्मा कोकथम् =क्यों
तत्त्वतः =यथार्थअर्थार्जने =धन के संपादन करने में
विज्ञाय =जान करके
तव =तुझरति =प्रीति है ॥

भावार्थ ।
जनकजी के अनुभव की परीक्षा करके अष्टावक्रजी फिर उसकी परीक्षा करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! नाश से रहित, निर्विकल्प, काल-परिच्छेद से रहित, देश-परिच्छेद से रहित, वस्तु-परिच्छेद से रहित, द्वैतभाव से रहित, चैतन्य-स्वरूप आत्मा को जान करके फिर तुझ धीर की व्यावहारिक धन

Page 86Permalink

तीसरा प्रकरण । ७९

के संग्रह करने में कैसे प्रीति होती है ? अर्थात् आत्मज्ञानी होकर फिर भी तू धनादिकों में प्रीतिवाला दिखाई पड़ता है, इसमें क्या कारण हैं ? ॥ १ ॥

मुनि के प्रश्न के उत्तर को, मुनि से सुनने की इच्छा करके, उससे आप ही प्रश्न पूछते हैं—

मूलम् ।

आत्माऽऽज्ञानादहो प्रीतिर्विषय भ्रमगोचरे ।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

आत्माऽऽज्ञानात्, अहो, प्रीतिः, विषयभ्रमगोचरे, शुक्तेः, अज्ञानतः, लोभः, यथा, रजतविभ्रमे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है कियथा=जैसे
आत्माऽऽज्ञानात्=आत्मा के अज्ञान सेशुक्तेः=सीपी के
अज्ञानतः=अज्ञान से
$\begin{matrix} विषयभ्रम \ गोचर \end{matrix}$=विषय के भ्रम के होने पररजतविभ्रमे=रजत की भ्रांति में
प्रीतिः=प्रीति होती हैलोभः=लोभ होता है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**हे भगवन् ! आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर धनादिकों के संग्रह करने में क्या दोष है ?

**उत्तर—**हे शिष्य ! विषयों में अर्थात् स्त्री पुत्र धनादिकों में जो प्रीति होती है, वह आत्मा के स्वरूप के अज्ञान

Page 87Permalink

८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

से ही होती है, आत्मा के ज्ञान से नहीं होती है। क्योंकि जब आत्मा का ज्ञान होता है, तब विषयों का बाध हो जाता है। इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टांत को कहते हैं—जैसे शुक्ति के अज्ञान से, और उसमें रजतभ्रम के होने से, उस रजत में लोभ हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगाः, इव, सागरे, सः, अहम्, अस्मि, इति, विज्ञाय, किम्, दीनः, इव, धावसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र =जिस आत्मा-रूपी समुद्र मेंअहम् =मैं
इदम् =यहअस्मि =हूँ
विश्वम् =संसारइति =इस प्रकार
तरंगाः =तरंगों केविज्ञाय =जान करके
इव =समानकिम् =क्यों
स्फुरति =स्फुरण होता हैदीनः इव =दीन की तरह
सः =वहीधावसि =तू दौड़ता है ॥

भावार्थ ।

जैसे समुद्र में तरंगादिक अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होते हैं

Page 88Permalink

तीसरा प्रकरण । ८१

वैसे ही यह जगत् भी अपनी सत्ता से रहित स्फुरण होता है,
पर्व सबका अधिष्ठान आत्मा ज्यों का त्यों मैं हूँ। इस प्रकार
जिसने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, वह दीन की
तृष्णा करके व्याकुल हुए की तरह विषयों की तरफ नहीं
दौड़ता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।
श्रुत्वाऽऽपि शुद्धचैतन्यमात्मानमितसुन्दरम् ।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।
श्रुत्वा, अपि, शुद्धचैतन्यम्, आत्मानम्, अतिसुन्दरम्,
उपस्थे, अत्यन्तसंसक्तः, मालिन्यम्, अधिगच्छति ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।
अतिसुंदरम् = अत्यन्त सुंदर
शुद्धचैतन्यम् = शुद्ध चैतन्य
आत्मानम् = आत्मा को
श्रुत्वाअपि = जान करके भी
उपस्थे = { समीपवर्ती विषय में

अन्वयः । शब्दार्थ ।
अत्यन्तसंसक्तः = { अत्यन्त आसक्त हुआ पुरुष
मालिन्यम् = मूढ़ता को
अधिगच्छति = प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।
आचार्य ने ऊपरवाले तीनों श्लोकों करके ज्ञानी शिष्य
के लिये दृश्यमान विषय-व्यवहार की निन्दा की ।
अब सब ज्ञानियों के प्रति विषयक व्यवहार की निन्दा
शिष्य की परीक्षा के लिए करते हैं—
आत्मवित् गुरु के मुख से और वेदांत-वाक्य से आत्मा

Page 89Permalink

८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

का शुद्ध स्वरूप श्रवण करके और साक्षात्कार करके भी जो पुरुष समीपवर्ती विषयों में अत्यन्त संसक्त होता है, वह कैसे मूढ़ता को प्राप्त होता है, यह बड़े आश्चर्य की वार्ता है ॥४॥

मूलम् ।

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वभूतेषु, च, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि, मुनेः, जानतः, आश्चर्यम्, ममत्वम्, अनुवर्तते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मानम्आत्मा कोजानतःजानते हुए
सर्वभूतेषुसब भूतों मेंमुनेःमुनि को
चऔरममत्वम्ममता
आत्मनिआत्मा मेंअनुवर्ततेहोती है
सर्वभूतानिसब भूतों कोआश्चर्यम्यही आश्चर्य है ॥

भावार्थ ।

ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यंत सम्पूर्ण भूतों में जिसने अधिष्ठानभूत आत्मा को जान लिया है, और फिर सम्पूर्ण भूतों को जिसने आत्मा में जान लिया है, अर्थात् सम्पूर्ण भूत रज्जु-सर्प की तरह आत्मा में कल्पित हैं, ऐसा जान करके भी फिर जिसका विषयों में ममत्व होवे, तो आश्चर्य की वार्ता है । क्योंकि जिसने शुक्ति में अध्यस्त रजत को जान लिया है, उसकी प्रवृत्ति फिर उस रजत के लिये नहीं होती है ॥ ५ ॥

Page 90Permalink

तीसरा प्रकरण । ८३

मूलम् ।

आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः ।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

आस्थितः, परमाद्वैतम्, मोक्षार्थे, अपि, व्यवस्थितः, आश्चर्यम्, कामवशगः, विकलः, केलिशिक्षया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
परमाद्वैतम्= परम अद्वैत कोकामवशगः= काम के वश होकर
आस्थितः= आश्रय किया हुआकेलिशिक्षया= क्रीड़ा के अभ्यास से
+ च= औरविकलः= व्याकुल होता है
मोक्षार्थे अपि= मोक्ष के लिये भीआश्चर्यम्= यही आश्चर्य है ॥
व्यवस्थितः= उद्यत हुआ पुरुष

भावार्थ ।

जिसने सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से शून्य अद्वैत आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, और सच्चिदानन्द आत्मा में जिसकी निष्ठा हो चुकी है । यदि फिर वह पुरुष काम के वश होकर नाना प्रकार की क्रीड़ा करता हुआ दिखाई पड़े, तो महान् आश्चर्य है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः ।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः ॥ ७ ॥

Page 91Permalink

८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

उद्भूतम्, ज्ञानदुर्मित्रम्, अवधार्य, अतिदुर्बलः, आश्चर्यम्, कामम्, आकाङ्क्षेत्, कालम्, अन्तम्, अनुश्रितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
उद्भूतम् =उत्पन्न हुएअन्तं कालम् =अन्तकाल को
ज्ञानदुर्मित्रम् =ज्ञान के शत्रु काम कोअनुश्रितः =आश्रय करता हुआ पुरुष
अवधार्य =धारण करकेकामम् =कामना को
अतिदुर्बलः =दुर्बल होता हुआआकाङ्क्षेत् =इच्छा करता है
च =औरआश्चर्यम् =यही आश्चर्य है ॥

भावार्थ ।

जो ज्ञानी पुरुष काम को ज्ञान का अत्यन्त वैरी जानता हुआ फिर भी काम की इच्छा करे, तो इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है । जैसे मृत्यु करके ग्रसित हुए पुरुष को समीपवर्ती विषय-भोग की इच्छा नहीं होती है—वैसे ही विवेकी पुरुष को भी विषय-भोग की इच्छा न होनी चाहिए ॥ ७ ॥

मूलम् ।

इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः ।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

इह, अमुत्र, विरक्तस्य, नित्यानित्यविवेकिनः, आश्चर्यम्, मोक्षकामस्य, मोक्षात्, एव, विभीषिका ॥

Page 92Permalink

तीसरा प्रकरण । ८५

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
इह = { इस लोक के भोग विषेच = और
+च = औरमोक्षकामस्य = { मोक्ष के चाहनेवाले पुरुष को
अमुत्र = { परलोक के भोग विषेमोक्षात् एव = मोक्ष से ही
विरक्तस्य = विरक्तविभीषिका = भय है
नित्यानित्यविवेकिनः = { नित्य और अनित्य के विचार करनेवालेआश्चर्यम् = यही आश्चर्य है ।।

भावार्थ ।
आत्मा नित्य है और शरीरादिक अनित्य हैं । इन दोनों के विवेचन करवेवाले का नाम विवेकी है। और आनन्द-रूप ब्रह्म की प्राप्ति का नाम मोक्ष है । उस मोक्ष की कामना-वाले ज्ञानी को ऐसा भय हो कि असद्रूप स्त्री, पुत्र और धनादिकों के साथ मेरा वियोग हो जायगा, तो महान् आश्चर्य है । क्योंकि स्वप्न में देखे हुए धन का जाग्रत् में नाश होने से मोह किसी को भी नहीं हुआ है ॥ ८ ॥

मूलम् ।
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा ।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।
धीरः, तु, भोज्यमानः, अपि, पीड्यमानः, अपि, सर्वदा, आत्मानम्, केवलम्, पश्यन्, न, तुष्यति, न, कुप्यति ॥

Page 93Permalink

८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धीरः= ज्ञानी पुरुषसर्वदा= नित्य
तु= तोकेवलम्= एक
भोज्यमानः= भोगता हुआआत्मानम्= आत्मा को
अपि= भीपश्यन्= देखता हुआ
च= औरन तुष्यति= न तो प्रसन्न होता है
पीड्यमानः= पीड़ित होता हुआ+ च= और
अपि= भीन कुप्यति= न कोप करता है ॥

भावार्थ ।

ज्ञानी को शाक और कोप भी न होना चाहिए । ज्ञानी पुरुष लोकों की दृष्टि में विषयों को भोक्ता हुआ भी, और लोकों करके निन्दित और पीड़ा को प्राप्त हुआ भी, सर्वदा सुख-दुःख के भोग से रहित केवल आत्मा को देखता हुआ न तो हर्ष को और न कोप को प्राप्त होता है । क्योंकि तोष और रोष आत्मा में नहीं रह सकते हैं । यदि ज्ञानी में भी तोष और रोष रहें, तो बड़ा आश्चर्य है ॥ ९ ॥

मूलम् ।

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत् ।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः ॥ १० ॥

पदच्छेदः ।

चेष्टमानम्, शरीरम्, स्वम्, पश्यति, अन्यशरीरवत्, संस्तवे, च, अपि, निन्दायाम्, कथम्, क्षुभ्येत्, महाशयः ॥

Page 94Permalink

तीसरा प्रकरण । ८७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
चेष्टमानम्= चेष्टा करते हुएसः= वह
स्वम्= अपनेमहाशयः= महाशय पुरुष
शरीरम्= शरीर को आत्मा से भिन्नसंस्तवे= स्तुति में
च= और
अन्यशरीरवत्= अन्य शरीर की तरहनिन्दायाम अपि= निन्दा की भी
+यः= जोकथम्= कैसे
पश्यति= देखता हैक्षुभ्येत्= क्षोभ को प्राप्त होवेगा ।।

भावार्थ ।

जैसे दूसरे का शरीर अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है, वैसे अपना शरीर भी अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है। इस प्रकार जो ज्ञानी देखता है, वह अपनी स्तुति में हर्ष को और निंदा में क्षोभ को कदापि प्राप्त नहीं होता है। यदि वह हर्ष और क्षोभ को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानवान् नहीं है ॥ १० ॥

मूलम् ।

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

मायामात्रम्, इदम्, विश्वम्, पश्यन्, विगतकौतुकः, अपि, सन्निहिते, मृत्यौ, कथम्, त्रस्यति, धीरधीः ॥

Page 95Permalink

८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विगतकौतुकः =दूर हो गई है अज्ञानता जिसकी, ऐसापश्यन् =देखता हुआ
मृत्यौ सन्नि-हिते अपि =मृत्यु के आने पर भी
धीरधीः =धीर पुरुषकथम् =क्यों
इदम् विश्वम् =इस विश्व कोत्रस्यति =डरेगा ॥
मायामात्रम् =माया-रूप

भावार्थ ।

यह जो दृश्यमान जगत् है, सो सब माया का कार्य है । और माया का कार्य होने से ही वह सब मिथ्या है । जो ज्ञानी उसको मिथ्या देखता है, वह फिर ऐसा विचार नहीं करता है कि कहाँ से ये शरीरादिक उत्पन्न होते हैं और नाश होकर किसमें लय हो जाते हैं । यदि ऐसा विचार करके वह मोह को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानी नहीं हो सकता है । जो विद्वान् अपने स्वरूप में अचल है, वह मृत्यु के समीप अपने पर भी भय को नहीं प्राप्त होता है ॥११॥

मूलम् ।

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।

निःस्पृहम्, मानसम्, यस्य, नैराश्ये, अपि, महात्मनः,
तस्य, आत्मज्ञानतृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥

Page 96Permalink

तीसरा प्रकरण । ८९

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यस्य=जिस$\left.\begin{aligned}आत्मज्ञान- \ तृप्तस्य\end{aligned}\right}$= आत्म ज्ञान से तृप्त हुए की
महात्मनः=महात्मा कातुलना=बराबरी
मानसम्=मनकेन=किसके साथ
नैराश्येअपि=मोक्ष में भीजायते=हो सकती है ॥
निःस्पृहम्=इच्छा-रहित है
तस्य=उस

भावार्थ ।

अब ज्ञानी की उत्कृष्टता को दिखाते हैं—

जिस विद्वान् का मन मोक्ष की भी इच्छा से रहित एवं संसार के किसी पदार्थ के लाभ अलाभ में हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है, जिसके सब मनोरथ समाप्त हो गये हैं और अपने आत्मा के आनन्द करके ही जो तृप्त है, उस विद्वान् की किसके साथ तुलना की जावे, किन्तु किसी के भी साथ उसकी तुलना नहीं हो सकती है, क्योंकि वह अतुल्य है ॥ १२ ॥

मूलम् ।

स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

स्वभावात्, एव, जानानः, दृश्यम्, एतत्, न, किञ्चन, इदम्, ग्राह्यम्, त्याज्यम्, सः, किम्, पश्यति, धीरधीः ॥

Page 97Permalink

९० | अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एतत्=यहकिम्=कैसे
दृश्यम्=दृश्यपश्यति=देख सकता है कि
स्वभावात्=स्वभाव से हीइदम्=यह
न किञ्चन=कुछ नहीं हैग्राह्यम्= ग्रहण करने योग्य है
+ इति=ऐसा
जानानः=जानने वाला हैच=और
+ यः=जोइदम्=यह
सः धीरधीः=वह ज्ञानीत्याज्यम्=त्यागने-योग्य है ॥

भावार्थ ।

यह जो दृश्यमान प्रपंच है, सो सब दृश्य होने से शुक्ति में रजत की तरह मिथ्या है। अर्थात् जैसे शुक्ति में रजत दृश्य भी है और मिथ्या भी है, वैसे यह प्रपंच भी दृश्य होने से मिथ्या है—इस अनुमान-प्रमाण करके यह जगत् मिथ्या सिद्ध होता है, ऐसा जिस विद्वान् ने निश्चय कर लिया है, वह धीर पुरुष ऐसा कब देखता है कि यह मेरे को ग्रहण करने-योग्य है, यह मेरे को त्यागने-योग्य है, किन्तु कदापि नहीं देखता है।

अब इस विषे हेतु को आगेवाला वाक्य करके कहते हैं ॥ १३ ॥

मूलम् ।

अन्तस्त्यक्त कषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयाऽऽगतो भोगो न दुःखाय च तुष्टये ॥ १४ ॥

Page 98Permalink

तीसरा प्रकरण । ९१

पदच्छेदः ।

अन्तस्त्यक्तकषायस्य, निर्द्वन्द्वस्य, निराशिषः, यदृच्छया,
आगतः, भोगः, न, दुःखाय, च, तुष्टये ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अन्तस्त्यक्त-कषायस्य =अन्तःकरण से त्याग दिया है विषय-वासना के कषाय को जिसनेयदृच्छया =दैवयोग से
आगतः =प्राप्त हुई
+एवं =जोभोगः =वस्तु
निर्द्वन्द्वस्य =द्वन्द्व से रहित हैन दुःखाय =न दुःख के लिये है ॥
+तथा =जोच =और
निराशिषः =आशा-रहित है, ऐसे पुरुष कोन तुष्टये =न संतोष के लिये है ॥

भावार्थ ।

जिस विद्वान् ने अन्तःकरण के मलों को दूर कर दिया है, वह शीत उष्णादिक द्वन्द्वों से अर्थात् शीत और उष्णजन्य सुख-दुःखादि से भी रहित है । और नष्ट हो गई हैं सम्पूर्ण विषय-वासनाएँ जिसकी, ऐसा जो समचित्त विद्वान् है, उसको दैवयोग से प्राप्त हुए जो भोग हैं, उनको प्रारब्धवश भोगता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है ॥ १४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ।

---:०:---