अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 77 of 405
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७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, जीवः, न, अहम्, अहम्,
हि, चित्, अयम्, एव, हि, मे, बन्धः, आसीत्, या, जीविते,
स्पृहा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् = | मैं | हि = | निश्चय करके |
| देहः = | शरीर | चित् = | चैतन्य-रूप हूँ |
| न = | नहीं हूँ | मे = | मेरा |
| मे = | मेरा | अयम् एव = | यही |
| देहः = | शरीर | बन्धा = | बँधा था |
| न = | नहीं है | या = | जो |
| अहम् = | मैं | जीविते = | जीने में |
| जीवः = | जीव | स्पृहा = | इच्छा |
| न = | नहीं हूँ | आसीत् = | थी |
| अहम् = | मैं |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**शरीर में अहंता और ममता अवश्य करनी होगी ? क्योंकि बिना अहंता और ममता के व्यवहार की सिद्धि नहीं होती है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मैं देह नहीं हूँ, क्योंकि देह जड़ है, मैं चेतन हूँ, और मेरा देह भी नहीं है, क्योंकि मैं असंग हूँ, मैं जीव अहंकारी भी नहीं हूँ, क्योंकि अहंकार का कर्त्तृत्व धर्म है और नेरा अकर्त्तृत्व धर्म है ।
**प्रश्न—**फिर तुम कौन हो ?