अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
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८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
से ही होती है, आत्मा के ज्ञान से नहीं होती है। क्योंकि जब आत्मा का ज्ञान होता है, तब विषयों का बाध हो जाता है। इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टांत को कहते हैं—जैसे शुक्ति के अज्ञान से, और उसमें रजतभ्रम के होने से, उस रजत में लोभ हो जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगाः, इव, सागरे, सः, अहम्, अस्मि, इति, विज्ञाय, किम्, दीनः, इव, धावसि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यत्र = | जिस आत्मा-रूपी समुद्र में | अहम् = | मैं |
| इदम् = | यह | अस्मि = | हूँ |
| विश्वम् = | संसार | इति = | इस प्रकार |
| तरंगाः = | तरंगों के | विज्ञाय = | जान करके |
| इव = | समान | किम् = | क्यों |
| स्फुरति = | स्फुरण होता है | दीनः इव = | दीन की तरह |
| सः = | वही | धावसि = | तू दौड़ता है ॥ |
भावार्थ ।
जैसे समुद्र में तरंगादिक अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होते हैं