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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

छठा प्रकरण (लय-माहात्म्य)

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छठा प्रकरण ।

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मूलम् ।

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

आकाशवत्, अनन्तः, अहम्, घटवत्, प्राकृतम्, जगत्,
इति, ज्ञानम्, तथा एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आकाशवत्=आकाशवत्एतस्य=इसका
अहम्=मैंन त्याग=न त्याग है
अनन्तः=अनन्य हूँच=और
जगत्=संसारन ग्रहः=न ग्रहण है
घटवत्=घटवत्च=और
प्राकृतम्=प्रकृतिजन्य हैन लयः=न लय है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=ऐसा ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

शिष्य की परीक्षा के वास्ते पाँचवें प्रकरण द्वारा गुरु ने लययोग-रूप चिंतन का उपदेश किया । अब इस छठे प्रकरण में गुरु अपने अनुभव को दिखाता हुआ लयादिकों के असंभव को दिखाता है—

लय चिंतन-रूप योग भी मेरे में नहीं बनता है । लय उसका होता है, जो उत्पतिवाला पदार्थ है । जिसकी उत्पत्ति

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११० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

ही तीनों कालों में नहीं है, उसका लय भी नहीं है। जैसे बंध्या का पुत्र और शशे के सींग की उत्पत्ति नहीं है और न उसका लय है, वैसे ही जगत् भी तीनों कालों में न उत्पन्न हुआ है, न होगा, और न वर्तमान काल में है। तब उसका लयचिंतन कैसे हो सकता है, किन्तु कदापि नहीं हो सकता है।

प्रश्न—यदि जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ है, तब प्रतीत क्यों होता है ?

उत्तर—मांडूक्य-कारिका में कहा है—

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ १ ॥
स्वप्नमाये यथा दृष्टे गंधर्वनगरं तथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ २ ॥

अर्थात् जो वस्तु उत्पत्ति से पहले नहीं है, और नाश से उत्तर भी नहीं है, वह वर्तमान काल में भी नहीं है, परन्तु मिथ्या होकर सत्य की तरह वर्तमान काल में प्रतीत होती है ॥ १ ॥

जैसे स्वप्न के हाथी-घोड़े, और इन्द्रजाली करके रचे हुए पदार्थ, और गन्धर्वनगर; ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे यह जगत् भी बिना हुए ही प्रतीत होता है। ज्ञानियों ने ऐसा अनुभव करके वेदान्त-शास्त्र द्वारा देखा है कि केवल अद्वैत अनंत-स्वरूप आत्मा ही सत्य है, और सारा प्रपंच प्रतीतिमात्र ही है, वास्तव में नहीं है।

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छठा प्रकरण । १११

प्रश्न-अनंत-स्वरूप आत्माका देहादिकों में निवास कैसे हो सकता है ? बड़ी वस्तु छोटी वस्तु के भीतर नहीं आ सकती है ?
उत्तर-जैसे घटमठादिक आकाश के निवास के स्थान हैं, और भेदक भी हैं, वैसे ही देहादिक भी अनंत-स्वरूप आत्मा के निवास का स्थान है, और भेदक भी है । वास्तव में तो यह जगत् मिथ्या माया का कार्य होने से मिथ्या है । इस प्रकार वेदान्त करके सिद्ध जो ज्ञान है, वही अनुभवरूप होकर जगत् के मिथ्यात्व में प्रमाण है, इस वास्ते लयचिंतनादिक भी जगत् के नहीं बन सकते हैं ॥ १ ॥

मूलम् ।
महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः ।
इति ज्ञानं तथैतस्य त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
महोदधिः, इव, अहम्, सः, प्रपञ्चः, वीचिसन्निभः, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएतस्यत्यागः=इसका त्याग है
महोदधिः इव=समुद्र सदृश हूँच=और
सः=यहन=न
प्रपञ्चः=संसारग्रहः लयः=ग्रहण और लय है
वीचिसन्निभः=तरंगों के तुल्य है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=यह ज्ञान है अर्थात् इस प्रकार के विचार को ज्ञान कहते हैं ॥
न=न
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११२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न--**घटाकाश के दृष्टांत से तो देह और आत्मा के भेद की शंका उत्पन्न होती है । जैसे आकाश से घट भिन्न है, और घट से आकाश भिन्न है, वैसे आत्मा से देह भिन्न है, और देह से आत्मा भिन्न है, दोनों के भिन्न-भिन्न होने से ही द्वैत साबित हुआ, अद्वैत आत्मा तो साबित न हुआ ?

**उत्तर--**जनकजी कहते हैं कि आत्मा महान् समुद्र की तरह है, उसमें प्रपंच लहरों की तरह है । इस प्रकार का अनुभव-रूप ज्ञान ही अद्वैत में प्रमाण है ॥ २ ॥

मूलम् ।

अहं सः शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, सः, शुक्तिसंकाशः, रूप्यवत्, विश्वकल्पना, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सः=वहतथा=इसका कारण
अहम्=मैंएतस्य=इसका
शुक्तिसंकाशः=शुक्ति के तुल्य हूँन त्यागः=न त्याग है
विश्वकल्पना=विश्व की कल्पनान लयः=न लय है
रूप्यवत्=रजत के समान हैइति ज्ञानम्=यही ज्ञान है ॥
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५५२

भावार्थ ।

**प्रश्न—**जैसे सब बीचियाँ समुद के विकार हैं और समुद्र विकार है, वैसे आपके दृष्टान्त से देह आत्मा का विकार है, और आत्मा विकारी सिद्ध होता है ?

**उत्तर—**अष्टावक्रजी कहते हैं कि विकार-विकारीभाव सावयव पदार्थों में होते हैं, निरवयव पदार्थ में नहीं होते हैं, इसलिये तुम्हारा दृष्टान्त सार्थक नहीं है, अतएव मेरे दृष्टान्त को सुनो—

जैसे शुक्ति सत्य-रूप है और उसमें रजत मिथ्या है, वैसे ही देहादिक समग्र प्रपंच का अधिष्ठान-रूप मैं ही सत्य हूँ और सारा प्रपंच मेरे में कल्पित रजत की तरह मिथ्या है। इसी कारण द्वैत तीनों कालों में सिद्ध नहीं हो सकता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, वा, सर्वभूतेषु, सर्वभूतानि, अथो, मयि, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंसर्वभूतानि=सब भूत
वा=निश्चय करकेमयि=मुझमें
सर्वभूतेषु=सब भूतों में हूँ+सन्ति=हैं
अथो=औरतथा=इस कारण से
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११४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

एतस्य=इसका<br>न त्यागः=न त्याग है<br>न ग्रहः=न ग्रहण है<br>च=औरन लयः=न लय है<br>इति ज्ञानम्= $\Big{$ इस प्रकार का ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शुक्ति में रजत के दृष्टांत करके भी आत्मा को परिच्छिन्नता की शंका होती है, क्योंकि जैसे शुक्ति परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न और एकदेशवर्ती सिद्ध होगा ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं, कि मैं ही सम्पूर्ण भूतों में व्यापक-रूप करके मणियों में सूत की तरह वर्तता हूँ, मैं ही सबका अधिष्ठान-रूप होकर सत्ता और स्फूर्ति का देनेवाला हूँ, मेरे में ही सारा जगत् आकाश में नीलता की तरह अध्यस्त है । इस प्रकार का दान्त वाक्यों करके सिद्ध ज्ञान अर्थात् अनुभव आत्मा के अद्वैत होने में प्रमाण है । और जब मैं हूँ, तो मेरे में ग्रहण, त्याग और लय चिंतनादिक भी नहीं बनते हैं ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां षष्ठं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥

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