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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

पहला प्रकरण (आत्मसाक्षात्कार एवं ज्ञानोपदेश)

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श्रीपरमात्मने नमः ।

अष्टावक्र-गीता

भाषा-टीका-सहित

पहला प्रकरण ।

मूलम् ।

जनक उवाच ।

कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

कथम्, ज्ञानम्, अवाप्नोति, कथम्, मुक्तिः, भविष्यति, वैराग्यम्, च, कथम्, प्राप्तम्, एतत्, ब्रूहि, मम, प्रभो ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
प्रभो=हे स्वामिन् !च=और
कथम्=कैसेवैराग्यम्=वैराग्य
+ पुरुषः=पुरुषकथम्=कैसे
ज्ञानम्=ज्ञान कोप्राप्तम्=प्राप्त
अवाप्नोति=प्राप्त होता हैभविष्यति=होवेगा
+ च=औरएतत्=इसको
मुक्तिः=मुक्तिमम=मेरे प्रति
कथम्=कैसेब्रूहि=कहिए ॥
भविष्यति=होवेगी

भावार्थ ।

राजा जनकजी अष्टावक्रजी से प्रथम तीन प्रश्नों को पूछते हैं—

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२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

( १ ) हे प्रभो ! पुरुष आत्म-ज्ञान को कैसे प्राप्त
होता है ?
( २ ) संसार बंधन से कैसे मुक्त हो जाता है अर्थात्
जन्म-मरणरूपी संसार से कैसे छूट जाता है ?
( ३ ) एवं वैराग्य को कैसे प्राप्त होता है ?
राजा का तात्पर्य यह था कि ऋषि वैराग्य के स्वरूप को,
उसके कारण को और उसके फल को; ज्ञान के स्वरूप को,
उसके कारण को, और उसके फल को; मुक्ति के स्वरूप को,
उसके कारण को, और उसके भेद को मेरे प्रति विस्तार-
सहित कहें ॥ १ ॥
राजा के प्रश्नों को सुनकर अष्टावक्रजी ने अपने मन में
विचार किया कि संसार में चार प्रकार के पुरुष हैं । एक
ज्ञानी, दूसरा मुमुक्षु, तीसरा अज्ञानी, चौथा मूढ़ । चारों में
से राजा तो ज्ञानी नहीं है, क्योंकि जो संशय और विपर्यय से
रहित होता है और आत्मानन्द करके आनंदित होता है, वही
ज्ञानी होता है । परंतु राजा ऐसा नहीं है, किन्तु यह संशय
करके युक्त है ।
एवं अज्ञानी भी नहीं है क्योंकि जो विपर्यय ज्ञान और
असंभावनादिकों करके युक्त होता है उसका नाम अज्ञानी
है, परंतु राजा ऐसा भी नहीं है । तथा जिसके-चित्त में
स्वर्गादिक फलों की कामनाएँ भरी हों, उसका नाम अज्ञानी
है, परन्तु राजा ऐसा भी नहीं है ।
यदि ऐसा होता, तो यज्ञादिक कर्मों के विषय में विचार
करता, सो तो इसने नहीं किया है । एवं मूढ़बुद्धिवाला भी
नहीं है, क्योंकि जो मूढ़बुद्धिवाला होता है, वह कभी भी

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पहला प्रकरण । ३

महात्मा को दण्डवत्-प्रणाम नहीं करता है, किन्तु वह
अपनी जाति और धनादिकों के अभिमान में ही मरा
जाता है, सो ऐसा भी राजा नहीं क्योंकि हमको महात्मा
जानकर हमारा सत्कार कर, अपने भवन में लाकर, संसार-
बंधन से छूटने की इच्छा करके जिज्ञासुओं की तरह राजा ने
प्रश्नों को किया है । इसी से सिद्ध होता है कि राजा जिज्ञासु
अर्थात् मुमुक्षु है और आत्म-विद्या का पूर्ण अधिकारी है,
और साधनों के बिना आत्म विद्या की प्राप्ति नहीं होती, इस
वास्ते अष्टावक्रजी प्रथम राजा के प्रति साधनों को कहते हैं ॥

मूलम् ।
अष्टावक्र उवाच ।
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज ।
क्षमार्जवद यातोषसत्यं पीयूषवद्भज ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
मुक्तिम्, इच्छसि, चेत्, तात, विषयान्, विषवत्, त्यज,
क्षमार्जव दयातोषसत्यम्, पीयूषवत्, भज ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तात = हे प्रिय !+ च = और
चेत् = यदि
मुक्तिम् = मुक्ति को$\left. क्षमार्जव- दयातोष- सत्यम्- \right} =$ क्षमा, आर्जव, दया, संतोष और सत्य को
इच्छसि = तू चाहता है, तो
विषयान् = विषयों को
विषवत् = विष के समानपीयूषवत् = अमृत के सदृश
त्यज = छोड़ देभज = सेवन कर ॥
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४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति कहते हैं कि हे तात ! यदि तुम
संसार से मुक्त होने की इच्छा करते हो, तो चक्षु, रसना आदि
पाँच ज्ञानेन्द्रियों के जो शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय हैं,
उनको तू विष की तरह त्याग दे, क्योंकि जैसे विष के खाने
से पुरुष मर जाता है, वैसे ही इन विषयों के भोगने से भी
पुरुष संसार-चक्र-रूपी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । इसलिए
मुमुक्षु को प्रथम इनका त्याग करना आवश्यक है, और इन
विषयों के अत्यंत भोगने से रोग आदि उत्पन्न होते हैं और
बुद्धि भी मलिन होती है। एवं सार और असार वस्तु का
विवेक नहीं रहता है । इसलिये ज्ञान के अधिकारी को अर्थात
मुमुक्षु को इनका त्याग करना ही मुख्य कर्तव्य है ।
प्रश्न—हे भगवन् ! विषय-भोग के त्यागने से शरीर
नहीं रह सकता है, और जितने बड़े-बड़े ऋषि, राजर्षि हुए
हैं, उन्होंने भी इनका त्याग नहीं किया है और वे आत्मज्ञान
को प्राप्त हुए हैं और भोग भी भोगते रहे हैं । फिर आप
हमसे कैसे कहते हैं कि इनको त्यागो ।
उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! आपका
कहना सत्य है, एवं स्वरूप से विषय भी नहीं त्यागे जाते हैं,
परन्तु इनमें जो अति आसक्ति है अर्थात् पाँचों विषयों में से किसी
एक के अप्राप्त होने से चित्त की व्याकुलता होना, और
सदैव उसीमें मनका लगा रहना आसक्ति है, उसके त्याग का
नाम ही विषयों का त्याग है । एवं जो प्रारब्धभोग से प्राप्त
हो, उसी में संतुष्ट होना, लोलुप न होना और उनकी प्राप्ति
के लिए असत्य-भाषण आदि का न करना किंतु प्राप्ति काल

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पहला प्रकरण । ५

में, उनमें दोष-दृष्टि और ग्लानि होनी, और उसके त्याग की
इच्छा होनी, और उनकी प्राप्ति के लिये किसी के आगे दीन
न होना, इसी का नाम वैराग्य है । यह जनकजी के एक
प्रश्न का उत्तर हुआ ।

प्रश्न—हे भगवन् ! संसार में नंगे रहने को भिक्षा
माँगकर खानेवाले को लोग वैराग्यवान् कहते हैं और उसमें
जड़भरत आदिकों के दृष्टांत को देते हैं । आपके कथन से
लोगों का कथन विरुद्ध पड़ता है ।

उत्तर—संसार में जो मूढ़बुद्धिवाले हैं वे ही नंगे रहने
वालों और माँगकर खानेवालों को वैराग्यवान् जानते हैं, और
नंगों से कान फुकवाकर उनके पशु बनते हैं । परन्तु युक्ति
और प्रमाण से यह वार्ता विरुद्ध है ।

यदि नंगे रहने से ही वैराग्यवान् होता हो, तो सब
पशु और पागल आदिकों को भी वैराग्यवान् कहना चाहिए,
पर ऐसा तो नहीं देखते हैं । और यदि माँगकर खाने से ही
वैराग्यवान् हो जावे, तो सब दिन दरिद्रियों को भी वैराग्यवान्
कहना चाहिए, पर ऐसा तो नहीं कहते हैं । इन्हीं युक्तियों से
सिद्ध होता है कि नंगा रहने और मांगकर खानेवाले का नाम
वैराग्यवान् नहीं ।

यदि कहो कि विचार-पूर्वक नंगे रहनेवाले का नाम
वैराग्यवान् है, यह भी वार्ता शास्त्र-विरुद्ध है, क्योंकि विचार
के साथ इस वार्ता का विरोध आता है । जहाँ पर प्रकाश
रहता है, वहाँ पर तम नहीं रहता । ये दोनों जैसे परस्पर
विरोधी हैं, वैसे सत्त्वगुण का कार्य-सत्य, और मिथ्या का
विवेचन-रूपी विचार है और तमोगुण का कार्य नंगा रहना

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६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है। देखिए--वर्ष के बारहों महीनों में नंगे रहने वालों के
शरीर को कष्ट होता है। सरदी के मौसम में सरदी के मारे
उनके होश बिगड़ते हैं और उनके हृदय में विचार उत्पन्न भी
नहीं हो सकता है। एवं गरमी और बरसात में मच्छर काट-
काट खाते हैं, अतः सदैव उनकी वृत्ति दुःखाकार बनी रहती
है, विचार का गन्धमात्र भी नहीं रहता है। तथा 'श्रुति' से
भी विरोध आता है—
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १ ॥
यदि विद्वान् ने आत्मा को जान लिया कि यह आत्मा
ब्रह्म मैं ही हूँ, तब किसकी इच्छा करता हुआ और किस
कामना के लिये शरीर को तपावेगा, किंतु कदापि नहीं
तपावेगा। और 'गीता' में भी भगवान् ने इसको तामसी तप
लिखा है। इसी से साबित होता है कि नंगे रहनेवाले का
नाम वैराग्यवान् नहीं है, और नंगे रहने का नाम वैराग्य
नहीं है, किंतु केवल मूर्खों को पशु बनाने के वास्ते नंगा
रहना है। एवं सकामी इस तरह के व्यवहार को करता है,
निष्कामी नहीं करता है। तथा जड़भरतादिकों को अपने
पूर्वजन्म का वृत्तान्त याद था।
एक मृगी के बच्चे के साथ स्नेह करने से, उनको मृग
के तीन जन्म लेने पड़े थे, इसी वास्ते वह संगदोष से डरते
हुए असंग होकर रहते थे।
पंचदशी में लिखा है—
नह्याहारादि संत्यज्य भारतादिः स्थितः क्वचित् ।
काष्ठपाषाणवत् किन्तु संगभीत्या उदास्यते ॥ २ ॥

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पहला प्रकरण । ७

जड़भरतादिक खान-पहरान आदिकों को त्याग करके कहीं भी नहीं रहे हैं, किन्तु पत्थर और लकड़ी की तरह जड़ होकर संग से डरते हुए उदासीन हो करके रहे हैं । जबतक देह के साथ आत्मा का तादात्म्य-अध्यास बना है, तबतक तो नंगा रहना दुःख का और मूर्खता का ही कारण है । जब अध्यास नहीं रहेगा, तब इसको नंगे रहने से दुःख भी नहीं होगा । आत्मा के साक्षात्कार होने से, जब मन उस महान् ब्रह्मानंद में डूब जाता है, तब शरीरादिकों के साथ अध्यास नहीं रहता है, और न विशेष करके संसार के पदार्थों का उस पुरुष को ज्ञान रहता है । मदिरा करके उन्मत्त को जैसे शरीर की और वस्त्रादिकों की खबर नहीं रहती है, वैसे ही जीवन्मुक्त ज्ञानी की वृत्ति केवल आत्माकार रहती है । उसको भी शरीरादिकों की खबर नहीं रहती है ऐसी अवस्था जीवन्मुक्त की लिखी हुई है । मुमुक्षु वैराग्यवान् की नहीं लिखी; क्योंकि उसको संसार के पदार्थों का ज्ञान ज्यों का त्यों बना रहता है। संसार के पदार्थों में दोष-दृष्टि और ग्लानि का नाम ही वैराग्य है, और खोटे पुरुषों के संग से डरकर महात्माओं का संग करनेवाला क्षमा, कोमलता, दया और सत्यभाषणादिक गुणों को अमृतवत् पान करने अर्थात् धारण करनेवाले का नाम वैराग्यवान् है और वही ज्ञान का अधिकारी है ॥ २ ॥

अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति वैराग्य के स्वरूप को कहकर राजा के द्वितीय प्रश्न के उत्तर को कहते हैं—

मूलम् ।
न पृथिवी न जलं नाग्निर्न वायुद्यौर्न वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥ ३ ॥

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८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः।

न, पृथिवी, न, जलम्, अग्निः, न, वायुः, द्यौः, न, वा,
भवान्, एषाम्, साक्षिणम्, आत्मानम्, चिद्रूपम्, विद्धि, मुक्तये ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवान्=तूवा=पर
न पृथिवी=न पृथिवी हैमुक्तये=मुक्ति के लिये
न जलम्=न जल हैएषाम्=इन सबका
न अग्निः=न अग्नि हैसाक्षिणम्=साक्षी
न वायुः=न वायु हैचिद्रूपम्=चैतन्यरूप
न द्यौः=न आकाश हैआत्मानम्=अपने को
विद्धि=जान ॥

भावार्थ ।

दूसरा प्रश्न राजा का यह था कि पुरुष आत्म-ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है अर्थात् ज्ञान का स्वरूप क्या है ?

इसके उत्तर में ऋषिजी कहते हैं कि अनादि काल से देहादिकों के साथ जो आत्मा का तादात्म्य-अध्यास हो रहा है, उस अध्यास से ही पुरुष देह को आत्मा मानता है, और इसी से जन्म-मरण-रूपी संसार-चक्र में पुनः-पुनः भ्रमण करता रहता है। उस अध्यास का कारण अज्ञान है। उस अज्ञान की निवृत्ति आत्म-ज्ञान करके होती है, और अज्ञान की निवृत्ति से अध्यास की भी निवृत्ति होती है। इसी वास्ते ऋषिजी प्रथम कार्य के सहित कारण की निवृत्ति का हेतु जो आत्म-ज्ञान है, उसी को कहते हैं—

हे राजन् ! तुम पृथिवी नहीं हो, और न तुम जल-रूप हो, न अग्नि-रूप हो, न वायु-रूप हो और न आकाश-रूप हो। अर्थात् इन पाँचों तत्त्वों में से कोई भी तत्त्व तुम्हारा स्वरूप नहीं

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पहला प्रकरण । ९

हैं । और पाँचों तत्त्वों का समुदाय-रूप इन्द्रियों का विषय जो
यह स्थूल शरीर है, वह भी तुम नहीं हो, क्योंकि शरीर क्षण-
क्षण में परिणाम को प्राप्त होता जाता है । जो बाल-अवस्था
का शरीर होता है, वह कुमार अवस्था में नहीं रहता है । कुमार
अवस्थावाला शरीर युवा अवस्था में नहीं रहता । युवा
अवस्थावाला शरीर वृद्ध अवस्था में नहीं रहता । और
आत्मा, सब अवस्थाओं में एक ही, ज्यों का त्यों रहता है, इसी
वास्ते युवा और वृद्धावस्था में प्रत्यभिज्ञाज्ञान भी होता है ।
अर्थात् पुरुष कहता है कि मैंने बाल्यावस्था में माता और
पिता का अनुभव किया । कुमारावस्था में खेलता रहा युवा
अवस्था में स्त्री के साथ शयन किया । अब देखिये—अवस्थाएँ
सब बदली जाती हैं, पर अवस्था का अनुभव करनेवाला आत्मा
नहीं बदलता है, किंतु एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है ।

यदि अवस्था के साथ आत्मा भी बदलता जाता, तब
प्रत्यभिज्ञाज्ञान कदापि न होता । क्योंकि ऐसा नियम है कि जो
अनुभव का कर्ता होता है, वही स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का भी
कर्ता होता है । दूसरे के देखे हुए पदार्थों का स्मरण दूसरे
को नहीं होता है । इसी से सिद्ध होता है कि आत्मा देहा-
दिकों से भिन्न है, और देहादिकों का साक्षी भी है । जो
देहादिकों से भिन्न है, और देहादिकों का साक्षी भी है, हे
राजन् ! उसी चिद्रूप को तुम अपना आत्मा जानो ।

जैसे घरवाला पुरुष कहता है—मेरा घर है, पलँग है
और मेरा बिछौना है । और वह पुरुष घर और पलँग आदि
से जैसे जुदा है, वैसे पुरुष कहता है—यह मेरा शरीर है, ये
मेरे इन्द्रियादिक हैं । जो शरीर और इन्द्रियों का अनुभव

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१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

करनेवाला आत्मा है, वह शरीर इन्द्रियादिकों से भिन्न है
और उनका साक्षी है ।
श्रुति कहती है—
अयमात्मा ब्रह्म ।
जो यह प्रत्यक्ष तुम्हारा आत्मा है यही ब्रह्म है, यही
ईश्वर है ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! पृथिवी आदिक
पाँच भूत और उनका कार्य स्थूल शरीर, तथा इन्द्रिय और
उनके विषय शब्दादिक, इन सबसे तू न्यारा है, और सबका
तू साक्षी है, ऐसे निश्चय का नाम ही आत्म-ज्ञान है ॥ ३ ॥
आत्मज्ञान के स्वरूप को अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति
कहकर अब मुक्ति के स्वरूप तथा उपाय को कहते हैं ।

मूलम् ।
यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्तः बन्धमुक्तो भविष्यसि ॥४॥

पदच्छेदः ।
यदि, देहम्, पृथक्कृत्य, चिति, विश्राम्य, तिष्ठसि,
अधुना, एव, सुखी, शान्तः, बन्धमुक्तः, भविष्यसि ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदि=अगरतिष्ठसि=स्थित है, तो
+ त्वम्=तूअधुना एव=अभी
देहम्=देह को+ त्वम्=तू
पृथक्कृत्य=अलग करकेसुखी=सुखी
+ च=और+ च=और
चिति=चैतन्य आत्मा मेंशान्तः=शान्त होता हुआ
विश्राम्य=विश्राम करके अर्थात् चित्त को एकाग्र करकेबन्धमुक्तः=बन्ध से मुक्त<br>भविष्यसि=हो जावेगा ॥
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पहला प्रकरण । ११

भावार्थ ।
हे राजन् ! जब तू देह से आत्मा को पृथक् विचार करके और अपने आत्मा में चित्त को स्थिर करके स्थिर हो जायगा, तब तू सुख और शान्ति को प्राप्त होवेगा । जब तक चिद्जड़ग्रन्थि का नाश नहीं होता है अर्थात् परस्पर के अध्यास का नाश नहीं होता है, तब तक ही जीव बंधन में है । जिस काल में अध्यास का नाश हो जाता है उसी काल में जीव मुक्त होता है । शिवगीता में भी इसी वार्ता को कहा है—
मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामन्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थि नाशो मोक्ष इति स्मृतः ॥१॥
मोक्ष का किसी लोकांतर में निवास नहीं है, और न किसी गृह या ग्राम के भीतर मोक्ष का निवास है, किंतु चिद्जड़ग्रन्थि का नाश ही मोक्ष है । अर्थात् जड़चेतन का जो परस्पर अध्यास है, उस अध्यास करके जो जड़ अंतःकरण के कर्त्तृत्व भोक्तृत्वादिक धर्म हैं, वे आत्मा में प्रतीत होते हैं एवं आत्मा के जो चेतनता आदिक धर्म हैं, वे भी अग्नि में तपाए हुए लोहपिंड की तरह अंतःकरण में प्रतीत होने लगते हैं । याने जब लोहे का पिंड अग्नि में तपाया हुआ लाल हो जाता है और हाथ लगाने से वह हाथ को जला देता है, तब लोग ऐसा कहते हैं—देखो, यह अग्नि कैसा गोलाकार है, लोहा कैसा जलता है । परंतु जलना धर्म लोहे का नहीं है और गोलाकार धर्म अग्नि का नहीं है, किंतु परस्पर दोनों का तादात्म्य-अध्यास होने से अग्नि का जलाना रूप धर्म लोहे में आ जाता है और लोहे का गोलाकार धर्म अग्नि में

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१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

चला जाता है वैसे ही अंतःकरण के साथ आत्मा का
तादात्म्य अध्यास होने से जब आत्मा के चेतन आदिक धर्म
अंतःकरण में आ जाते हैं, और अंतःकरण के कर्त्तृत्व
भोक्तृत्वादिक धर्म आत्मा में चले जाते हैं, तब पुरुष अपने
आत्मा को कर्त्ता और भोक्ता मानने लग जाता है और
उसी से जन्म-मरण-रूपी बंधन को प्राप्त होता है। जब
आत्म-ज्ञान करके अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता, शुद्ध और
असंग मानता है और कर्त्तृत्वादिक अंतःकरण का धर्म
मानता है, तब स्वयं साक्षी होकर अंतःकरण का भी प्रकाशक
होता है, और तब ही अध्यास का नाश हो जाता है।
अध्यास के नाश का नाम ही मुक्ति है। इसके अतिरिक्त
मुक्ति कोई वस्तु नहीं है ॥ ४ ॥

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! नैयायिक एवं और
भी आत्मा को कर्त्ता, भोक्ता और सुख दुखादिक धर्मोंवाला
मानते हैं। एवं पुरुष भी कहता है—मैं कर्ता हूँ अर्थात्
यज्ञादिक कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता भी
अपने को मानता है। तब फिर यह जीवात्मा अकर्त्ता और
अभोक्ता होकर मुक्त कैसे हो सकता है ? इसके उत्तर को
अष्टावक्रजी कहते हैं—

मूलम् ।
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः ।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥५॥

पदच्छेदः ।
न, त्वम्, विप्रादिकः, वर्णः, न, आश्रमी, न, अक्षगोचरः,
असंगः, असि, निराकारः, विश्वसाक्षी, सुखी, भव ॥

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पहला प्रकरण । १३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम् =तूअक्षगोचरः =आँख आदि इंद्रियों का विषय है
विप्रादिकः =ब्राह्मण आदि+ परन्तु =परंतु
वर्णः =जाति+ त्वम् =तू
न =नहीं हैअसङ्गः =असंग (एवं)
+ च =औरनिराकारः =निराकार
न =न (तू)विश्वसाक्षी =विश्व का साक्षी
आश्रमी =चारों आश्रमवाला हैअसि =है
+ च =और+ इति मत्वा =ऐसा जान करके
न =न (तू)सुखी =सुखी
भव =हो ॥

भावार्थ ।

निराकार सच्चिदानन्द-रूप एक ही निर्गुण आत्मा सर्वत्र व्यापक है । जैसे एक ही आकाश सर्वत्र व्यापक है । परंतु घट मठ आदि उपाधियों के भेद करके घटाकाश, मठाकाश ऐसा व्यवहार होता है और उपाधियों के भेद करके आकाश का भी भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आकाश का भेद नहीं है । वैसे एक ही व्यापक आत्मा का अंतःकरण रूपी उपाधियों के भेद करके भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आत्मा का भेद नहीं है । जैसे अनेक घटों में आकाश एक भी है, परंतु किसी घट में धूलि भरी है और किसी में धूम भरा है, और किसी में नील पीतादिक वर्णोंवाले पदार्थ भरे हैं, उन धूलि आदिकों के साथ यद्यपि कोई आकाश का वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, तथापि धूल आदिकोंवाला प्रतीत होता है, वैसे आत्मा का भी अन्तःकरण और उसके धर्मों के साथ

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१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, तथापि परस्पर के अध्यास से वह सुख दुःखादिक धर्मोंवाला प्रतीत होता है । वस्तुतः आत्मा में सुख दुःखादिक तीनों काल में भी नहीं हैं ।

इसी वार्ता को अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति कहते हैं कि हे जनक ! तू ब्राह्मण आदि जातियोंवाला नहीं है, और तू वर्णाश्रम आदिक धर्मोंवाला है, और न तू किसी चक्षुरादि इन्द्रिय का विषय है, किन्तु तू इन सबका साक्षी और असंग है एवं तू आकार से रहित है और तू संपूर्ण विश्व का साक्षी है—ऐसा तू अपने को जान करके सुखी हो अर्थात् संसाररूपी ताप से रहित हो ॥५॥

जनक जी कहते हैं कि हे भगवन् ! वेद ने जो वर्णाश्रमों के धर्म करने का विधान किया है, उनके त्याग करने से भी पुरुष पातकी होता है, और बिना अपने को कर्त्ता माने वे धर्म हो नहीं सकते हैं, अतएव यह “उभयतः पाशा रज्जु”—न्याय का प्रसंग कैसे दूर हो ?

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! वेद ने जितने वर्णाश्रमादिकों के धर्म कहे हैं, वे सब अज्ञानी मूर्ख के लिये कहे हैं, वे ज्ञानी के और मुमुक्षु के लिये नहीं हैं—

ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः ।
नैवास्ति किञ्चित्कर्त्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥१॥

जो आत्म-ज्ञान-रूपी अमृत करके तृप्त है और जो आत्म ज्ञान करके कृतकृत्य हो चुका है, उसको कुछ भी करने योग्य कर्म बाकी नहीं है । यदि वह अपने को कर्म करने-योग्य माने, तो वह आत्मवित् नहीं है । ऐसे ही अनेक वाक्य ज्ञानी

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पहला प्रकरण । १५

के लिये कर्तव्यता का अभाव कथन करते हैं । गीता में
जिज्ञासु के प्रति कर्मों का निषेध कहा है—
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ।
भगवान् कहते हैं कि आत्म-ज्ञान का जिज्ञासु भी शब्द-
ब्रह्म वेद की आज्ञा का उल्लंघन करके वर्त्तता है । अर्थात्
जिज्ञासु के ऊपर भी कर्मकांड वेद-भाग की आज्ञा अज्ञानी
और सकामी मूर्ख के ऊपर है । अतएव हे जनक ! यदि तू
जिज्ञासु है तब भी तेरे ऊपर वर्णाश्रमों के धर्मों के करने की
वेद की आज्ञा नहीं है । यदि तू लोकाचार के लिये करना
चाहता है, तब उनको आत्मा से पृथक्, अन्तःकरण का धर्म
मान करके तू कर ।

मूलम् ।
धर्माऽऽधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो ।
न कर्त्ताऽसि न भोक्ताऽसिमुक्त एवासि सर्वदा ॥६॥

पदच्छेदः ।
धर्माऽऽधर्मौ, सुखम्, दुःखम्, मानसानि, न, ते, विभो, न,
कर्त्ता, असि, न भोक्ता, असि; मुक्तः, एव, असि, सर्वदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विभो=हे व्यापक !ते=तेरे लिये
मानसानि=मन सम्बन्धीन=नहीं हैं
धर्माऽऽधर्मौ=धर्म और अधर्म+च=और
सुखम्=सुखन=न
+च=और+त्वम्=तू
दुःखम्=दुःखकर्त्ता=कर्त्ता
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१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

असि=हैंसर्वदा=सदा
+ च=और+ त्वम्=न
न=नमुक्तः=मुक्त
+ त्वम्=तूएव=ही
भोक्ता=भोक्ताअसि=है ॥
असि=हैं (किन्तु)

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! धर्म और अधर्म, सुख और दुःखादिक ये सब मन के धर्म हैं, तुझ व्यापक आत्मा के नहीं। अर्थात् तेरा स्वरूप व्यापक है, उसके ये सब धर्म नहीं हैं, किन्तु परिच्छिन्न मन के सब धर्म हैं अतएव न तू कर्ता है और न भोक्ता है, किन्तु तू सर्वदा मुक्त-स्वरूप है ।। ६ ।।

फिर उसी वार्त्ता को दृढ़ करने के वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं—

मूलम् ।

एको द्रष्टाऽसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा ।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥७॥

पदच्छेदः ।

एकः, द्रष्टा, असि, सर्वस्य, मुक्तप्रायः, असि, सर्वदा, अयम्, एवं, हि, ते, बन्धः, द्रष्टारम्, पश्यसि, इतरम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वस्य=सबकाअसि=तू है
एकः=एक+ च=और
द्रष्टा=देखनेवालाएव=ही
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पहला प्रकरण । १७

ते=तेराअयम्=यह
बन्धः=बन्धन है+ त्वम्=तू
हि=जोइतरम्=दूसरे को
सर्वदा=निरंतरद्रष्टारम्=द्रष्टा
मुक्तप्रायः=अत्यन्त मुक्तपश्यसि=देखता है ॥
असि=तू है

भावार्थ ।

हे राजन् ! तू ही एक सच्चिदानन्द और परिपूर्णरूप से सबका द्रष्टा है और सर्वदा मुक्त-स्वरूप है । तेरे में तीनों काल में बंध नहीं है । जैसे सूर्य में तीनों काल में तम नहीं है, वैसे तू ही स्वयंप्रकाश और समस्त जगत् का द्रष्टा है। और जो तू अपने को द्रष्टा न जानकर अपने से भिन्न किसी को द्रष्टा मानता है, यही तेरे में बन्ध है ॥७॥

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! सारे संसार में सब लोग अपने से भिन्न कर्मों का साक्षी और द्रष्टा मानते हैं और अपने को कर्मों का कर्ता मानते हैं, तब फिर वे सब ऐसा क्यों मानते हैं ? और अपने से भिन्न द्रष्टा और कर्मों के फल के प्रदाता को क्यों मानते हैं ?

उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि जो संसार में अज्ञानी मूर्ख हैं वे अपने से भिन्न द्रष्टा को और कर्मों के फल-प्रदाता को मानते हैं और अपने कर्मों का कर्त्ता और फल का भोक्ता मानते हैं, ज्ञानवान् ऐसा नहीं मानते हैं ।

मूलम् ।

अहं कर्त्तैत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः ॥
नाहं कर्त्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥८॥

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१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
अहम्, कर्त्ता, इति, अहम्मानमहाकृष्णाहिदंशितः, न, अहम्, कर्त्ता, इति, विश्वासामृतम्, पीत्वा, सुखी, भव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंन कर्त्ता=नहीं कर्त्ता हूं ।
कर्त्ता=करता हूँइति=ऐसे
इति=ऐसेविश्वा- } विश्वासारूपी अमृत
अहंमान- } अहंकार-रूपी अत्यंतसामृतम् } =को
महाकृष्णा- } =कृष्ण वर्णवाले सर्प सेपीत्वा=पी करके
हिदंशितः } दंशित हुआ तूसुखी=सुखी
अहम्=मैंभव=हो ॥

भावार्थ ।
हे जनक ! "अहं कर्त्ता" मैं इस कर्म का कर्त्ता हूँ, एवं मैं इसके फल को भोगूँगा, यह जो अहंकार-रूपी काला सर्प है, इसी करके डसा हुआ, सारा संसार जन्म-मरण-रूपी चक्र में पड़कर भटकता रहता है और तू भी इस अहंकार-रूपी सर्प करके डसा हुआ, अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है। उस अहंकार-रूपी सर्प के विपके उतारने के लिये "नाहं कर्त्ता" मैं कर्त्ता नहीं हूँ, जब ऐसे निश्चयरूपी अमृत को तू पान करेगा, तब तू सुखी होवेगा । अन्यथा किसी प्रकार से भी तू सुखी नहीं हो सकता है ॥८॥

जनकजी कहते हैं कि पूर्वोक्त अमृत को मैं कैसे पान करूँ ? इसके उत्तर को कहते हैं—

मूलम् ।
एको विशुद्धबुद्धोऽहमिति निश्चयवह्निना ।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥९॥

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पहला प्रकरण । १९

पदच्छेदः ।

एकः, विशुद्धबोधः, अहम्, इति, निश्चयवह्निना,
प्रज्वाल्य, अज्ञानगहनम्, वीतशोक, सुखी, भव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंअज्ञान- गहनम्=अज्ञानरूपी-वन को
एकः =एकप्रज्वाल्य =जला करके
विशुद्धबोधः =अति शुद्ध बुद्ध-रूप हूँवीतशोकः =शोक-रहित हुआ
इति =ऐसे+ त्वम् =तू
निश्चय- वह्निना=निश्चय रूपी अग्निसुखी =सुखी
भव =हो

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू इस प्रकार के निश्चय-रूपी अमृत को पी करके, मैं एक हूँ अर्थात् सजातीय-विजातीय स्व-गत भेद से रहित हूँ । क्योंकि एक वृक्ष का जो वृक्षांतर से भेद है, वह सजातीय भेद कहा जाता है, और वृक्ष का जो घटादिकों से भेद है, उसका नाम विजातीय-भेद है और वृक्ष का जो अपने शाखादिकों से भेद है, वह स्व-गत भेद कहा जाता है ।

यह आत्मा तो ऐसा नहीं है, क्योंकि एक ही आत्मा सारे जगत् में व्यापक है । वह पारमार्थिक सत्तावाला है और नित्य है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा नहीं है, इस वास्ते आत्मा में सजातीय-भेद नहीं है । और परिच्छिन्न व्यावहारिक सत्तावालों में सजातीय-भेद रहता है, और आत्मा से भिन्न कोई भी पदार्थ पारमार्थिक सत्तावाला नहीं

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२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है, अतएव आत्मा से भिन्न सब मिथ्या है, क्योंकि कहा
गया है—
ब्रह्मभिन्नम्, सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात् ।
ब्रह्म से भिन्न सारा जगत् ब्रह्म से पृथक् होने के कारण
शक्ति में रजत की तरह मिथ्या है, इस अनुमान-प्रमाण से
जगत् का मिथ्यात्व सिद्ध होता है । और इसी से आत्मा में
विजातीय-भेद भी नहीं है । आत्मा निश्चय है, इस वास्ते
उसमें स्व-गत भेद भी नहीं है क्योंकि स्व-गत भेद सावयव
पदार्थों में होता है । आत्मा देश, काल और वस्तु के
परिच्छेद से रहित है, क्योंकि देश, काल और वस्तु का
परिच्छेद परिच्छिन्न पदार्थ में ही रहता है, व्यापक में नहीं
रहता है ।

जो वस्तु किसी काल में हो और किसी काल में न हो,
वह वस्तु काल-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक
पदार्थ ही हैं, आत्मा तो तीनों कालों में एक-सा ज्यों का त्यों
बना रहता है, इस वास्ते काल-परिच्छेद से आत्मा रहित है ।

जो वस्तु एक देश में हो और दूसरे देश में न हो, वह
देश-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक पदार्थ ही
हैं, आत्मा तो सब देश में है, इस वास्ते वह देश परिच्छेद से
भी रहित है ।

जो एक वस्तु दूसरी वस्तु में न रहे, वह वस्तु परिच्छेद
कहलाता है, जैसे घट, पट में नहीं रहता है और पट, घट
में नहीं रहता है, परन्तु आत्मा सब वस्तुओं में ज्यों का त्यों
एक-रस रहता है, इस वास्ते वह वस्तु परिच्छेद से भी
रहित है ।