अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Ashtavakra Gita (अष्टावक्र-गीता) is a classic of Advaita Vedanta in the form of a dialogue between the sage Ashtavakra and King Janaka. Janaka asks how knowledge, liberation and detachment are gained, and Ashtavakra replies that the Self is already liberated, the witness and pure awareness; bondage is only the belief 'I am the body, I am the doer'. Rather than a graded path of practice, the text points straight to self-recognition, and in several chapters Janaka describes his own realisation.
Its twenty chapters move through instruction in self-knowledge, Janaka's wonder at the Self, the glory of knowledge, dissolution, peace, the marks of bondage and freedom, dispassion, the bliss of aloneness, the nature of the sage and liberation in life.
According to the scanned pages, this edition gives the verses with a Hindi commentary by Rai Bahadur Babu Jalim Singh, who recalls in his preface how, as an inspector of post offices in Gonda and Bahraich, he turned to Tulsidas's Ramayana and Vedanta. This is the fifth edition, printed in 1971 by the Tejkumar Press, Lucknow, successor to the Naval Kishore Press, and has 405 pages.
४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मैं एक ही सारे जगत् को प्रकाश करता हूँ और इस स्थूल देह का भी प्रकाशक हूँ ।
यह देह अनात्मा है यानी जड़ होने से अप्रकाश जगत् की तरह है ।
जड़ देह और चेतन आत्मा का आध्यासिक सम्बन्ध है, अर्थात् कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । सत्य और मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध न होने से इन दोनों का पारमार्थिक सम्बन्ध नहीं है । जैसे—शुक्ति और रजत का कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है, वैसे देह और आत्मा का भी कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । जैसे शुक्ति की सत्ता करके रजत् भी सत्यवत् भान होती है, वैसे आत्मा की सत्ता करके देह भी सत्यवत् भान होता है । वास्तव में देह मिथ्या है । इसी तरह आत्मा की सत्ता करके ही सारा जगत् सत्यवत् प्रतीत होता है । आत्मा से पृथक् जगत् मिथ्या है, यानी कभी हुआ नहीं है । इसी वार्त्ता को पञ्चदशीकार ने भी कहा है—
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ २ ॥
अर्थात् “अस्ति” है “भाति” भान होता है “प्रियम्” प्यारा है, रूप और नाम ये पाँच अंश सारे जगत् में व्याप्त करके रहते हैं और इन पाँचों में से अस्ति, भाति, प्रिय ये तीनों अंश ब्रह्म के हैं, सो तीनों अंश सारे जगत् में प्रवेश होकर स्थित हैं । नाम और रूप ये दो अंश जड़ जगत् के हैं । यदि नाम और रूप को निकाल दिया जावे, तब जगत् की कोई वस्तु भी सत्य नहीं रह सकती है । नाम और रूप
दूसरा प्रकरण । ४५
दोनों विनाशी हैं, क्योंकि एक हालत में नहीं रहते हैं, इसी से सारा जगत् मिथ्या सिद्ध होता है । यह जगत् परब्रह्म के अस्ति, भाति और प्रिय इन तीनों अंशों करके ही सत्यवत् प्रतीत होता है । यदि इन तीनों अंशों को हरएक पदार्थ से पृथक् कर दिया जाय, तब जगत् का कोई भी पदार्थ सत्यवत् भान नहीं हो सकता है । इसी से सिद्ध होता है कि जगत् तीनों कालों में मिथ्या है और ब्रह्म ही तीनों कालों में सत्य है । इस युक्ति-सहित अनुभव करके जनकजी कहते हैं कि जितना दृश्य जगत् है, वह मेरे में ही अध्यस्त अर्थात् कल्पित है, क्योंकि परमार्थ दृष्टि से कोई भी देहादिक मेरे में नहीं है । जैसे आकाश में नीलता; मरुस्थल में जल; बन्ध्या का पुत्र; शश के शृङ्ग; ये सब तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही जगत् भी वास्तव में तीनों कालों में नहीं है, और न कोई मेरे देहादिक है । मैं माया और उसके कार्य से परे एवं ज्ञान-स्वरूप हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽऽधुना ।
कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
सशरीरम्, अहो, विश्वम्, परित्यज्य, मया, अधुना, कुतश्चित्, कौशलात्, एव, परमात्मा, विलोक्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहो= | आश्चर्य है कि | ||
| सशरीरम्= | शरीर सहित | परित्यज्य= | त्याग करके अर्थात् अपने से पृथक् समझ कर |
| विश्वम्= | विश्व को |
४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
कुतश्चित् = कहीं मया = मुझ करके
कौशलात् = } कुशलता से अर्थात् उपदेश से अधुना = अब
परमात्मा = ईश्वर
एव = ही विलोक्यते = देखा जाता है
भावार्थ ।
जनकजी फिर भी कहते हैं कि जो लिंग शरीर और कारण-शरीर के सहित संपूर्ण विश्व-विचार करके, शास्त्र और आचार्य के उपदेश करके और चातुर्य करके आत्मा से पृथक्, अपनी सत्ता से शून्य आत्मा की सत्ता करके सत्यवत् भान होता था, उसको मैं अब मिथ्या जानकर अपने ज्ञान-स्वरूप आत्मा का अवलोकन कर रहा हूँ । क्योंकि आत्म-ज्ञान के अतिरिक्त और कोई भी आत्मा के अवलोकन का उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः ।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥४॥
पदच्छेदः ।
तथा, न, तोयतः, भिन्नाः, फेनबुद्बुदाः, आत्मनः, न, तथा, भिन्नम्, विश्वम् आत्मविनिर्गतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तथा | = जैसे | फेनबुद्बुदा | = फेन और बुल्ला |
| तोयतः | = जल से | भिन्नाः | = भिन्न |
| तरङ्गाः | = तरङ्ग | न | = नहीं |
दूसरा प्रकरण ४७
तथा=वैसा ही | विश्वम्=विश्व
आत्मवि-निर्गतम् = आत्म-विष्ट | आत्मनः=आत्मा से
भिन्नम् न=भिन्न नहीं है ॥
भावार्थ ।
दृष्टांत—जैसे तरंग और फेन जल से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि जल ही उन सबका उपादान कारण है, वैसे ही यह विश्व आत्मा से उत्पन्न है अर्थात् इसका उपादान कारण आत्मा ही है। इस कारण ऐसा जो जगत् है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे तरंग बुद्बुदादि में जल अनुगत है—वैसे स्वच्छ चैतन्य भी सम्पूर्ण विश्व में अनुगत है। जैसे कल्पित सर्प अपने अधिष्ठानभूत रज्जु से भिन्न नहीं है, किन्तु रज्जु-रूप ही है—वैसे कल्पित जगत् भी अधिष्ठानभूत चेतन से भिन्न नहीं है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः ।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
तन्तुमात्रः, भवेत्, एव, पटः, यद्वत्, विचारतः, आत्मतन्मात्रम्, एव, इदम्, तद्वत्, विश्वम्, विचारितम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यद्वत् | =जैसे | विचारतः | =विचार से |
| पटः | =कपड़ा | इदम् | =यह |
| तन्तुमात्रः | =तंतुमात्र | विश्वम् | =संसार |
| एव | =ही | आत्मतन्मात्रम् | =आत्मसत्तामात्र |
| भवेत् | =होता है | एव | =ही |
| तद्वत् | =वैसे ही | विचारितम् | =प्रतीत होता है ॥ |
४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जैसे स्थूल दृष्टि करके तन्तुओं से विलक्षण पट प्रतीत होता है, परन्तु विचार-पूर्वक देखने से तन्तु-रूप ही पट है, तन्तुओं से भिन्न पट कोई वस्तु नहीं है—वैसे ही स्थूल दृष्टि द्वारा देखने पर ब्रह्म से विलक्षण जगत् प्रतीत होता है, परन्तु युक्ति और विचार से आत्म-रूप ही जगत् है। जैसे तन्तु अपनी सत्ता करके पट में अनुगत है, वैसे ही आत्मा भी अपनी सत्ता करके अधिष्ठान भूतरूप होकर सारे जगत् में अनुगत है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
यथैवेक्षुरसे कॢप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा ।
तथा विश्वं मयि कॢप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
यथा, एव, इक्षुरसे, कॢप्ता, तेन, व्याप्ता, एव, शर्करा, तथा, विश्वम्, मयि, कॢप्तं, मया, व्याप्तम्, निरन्तरम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | जैसे | तथा एव | वैसे ही |
| एव | निश्चय करके | मयि | मुझमें |
| इक्षुरसे | इक्षु के रस में | कॢप्तम् | अध्यस्त हुआ |
| कॢप्ता | अध्यस्त हुई | विश्वम् | संसार |
| शर्करा | शक्कर | मया | मुझ करके |
| तेन | उसी करके | निरन्तरम् | सदा |
| व्याप्ता एव | व्याप्त है | व्याप्तम् | व्याप्त है ॥ |
दूसरा प्रकरण । ४९
भावार्थ ।
आत्मा करके सारा जगत् व्याप्त है, इसी में जनकजी दृष्टान्त कहते हैं—
जैसे इक्षु जो गन्ना है, सो रस में अध्यस्त है, और उसी मधुर-रस करके गन्ना भी व्याप्त है, वैसे ही मेरे नित्य आनन्द-स्वरूप में यह सारा जगत् अध्यस्त है, औ मेरे नित्य आनन्द-रूप करके बाहर और भीतर से व्याप्त भी है, इस वास्ते यह विश्व भी आत्म-स्वरूप ही है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्नभासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
आत्माऽज्ञानात्, जगत्, भाति, आत्मज्ञानात्, न, भासते, रज्ज्वज्ञानात्, अहिः, भाति, तज्ज्ञानात्, भासते, न, हि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्माऽज्ञानात् | =आत्मा के अज्ञान से | अहिः | =सर्प |
| जगत् | =संसार | भाति | =भासता है |
| भाति | =भासता है | च | =और |
| आत्मज्ञानात् | =आत्मा के ज्ञान से | तज्ज्ञानात् | =उसके ज्ञान से |
| न भासते | =नहीं भासता है | नहि | =नहीं |
| यथा | =जैसे | भासते | =भासता है ॥ |
| रज्ज्वज्ञानात् | =रज्जु के अज्ञान से |
५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् सत्य प्रतीत होता है और अधिष्ठान-स्वरूप आत्मा के ज्ञान करके असत् होता है । इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टान्त कहते हैं—
रज्जु के स्वरूप के अज्ञान से जैसे सर्प प्रतीत होता है, और रज्जु के स्वरूप के ज्ञान से उसमें सर्प प्रतीत नहीं होता है; वैसे ही आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् प्रतीत होता है, और आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् प्रतीत नहीं होता है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः ।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाऽहं भास एव हि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
प्रकाशः, मे, निजम्, न, अतिरिक्तः, अस्मि, अहम्, ततः, यदा, प्रकाशते, विश्वम्, तदा, अहम्भासः, एव, हि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| प्रकाशः=प्रकाश | यदा=जब |
| मे=मेरा | विश्वम्=संसार |
| निजम्=निज | प्रकाशते=प्रकाशता है |
| रूपम्=रूप है | तदा=तब |
| अहम्=मैं | तत्=वह |
| ततः=उससे | अहंभासः=मेरे प्रकाश से |
| अतिरिक्तः=अलग | एव हि=ही |
| न अस्मि=नहीं हूँ | +प्रकाशते=प्रकाशता है ॥ |
दूसरा प्रकरण । ५१
भावार्थ ।
**प्रश्न—**आत्मा के स्वरूप का जबतक अज्ञान बना है, तबतक आत्मा के प्रकाश का भी प्रभाव ही रहता है, तब फिर आत्मा के स्वरूप के प्रकाश का अभाव होने से जगत् का भान कैसे हो सकता है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मेरा जो प्रकाश अर्थात् नित्य-ज्ञान है, वह मेरा स्वाभाविक स्वरूप है, मैं उस प्रकाश से भिन्न नहीं हूँ, इसी वास्ते जिस काल में मुझको विश्व प्रतीत होता है, तब आत्मा के प्रकाश से ही प्रतीत होता है ।
**प्रश्न—**यदि स्वरूप भूतचेतन ही प्रकाशक है, तब फिर अज्ञान कैसे रह सकता है ? क्योंकि ज्ञान और अज्ञान दोनों तम और प्रकाश की तरह परस्पर विरोधी हैं ।
**उत्तर—**दो प्रकार का चेतन है । एक सामान्य चेतन, दूसरा विशेष चेतन । विशेष चेतन अज्ञान का विरोधी है अर्थात् बाधक है । सामान्य चेतन अज्ञान का विरोधी नहीं है, किन्तु साधक है अर्थात् अज्ञान को सिद्ध करता है । जैसे अग्नि दो प्रकार की है । एक सामान्य अग्नि, दूसरी विशेष अग्नि है । सामान्य अग्नि तो सब काष्ठों में व्यापक है, परन्तु काष्ठों के स्वरूप को जलाती नहीं है, किन्तु बनाती है, क्योंकि जितने जगत् के पदार्थ हैं, वे सब भूतों के पञ्चीकरण से बने हैं । जैसे जो लकड़ी पंचतत्त्वों से बनी है, उसको सामान्य तेज अर्थात् अग्नि जो उसके भीतर है, जलाती नहीं है, पर जब दो लकड़ियों के परस्पर रगड़ से जो विशेष अग्नि-रूप तेज उसमें से उत्पन्न होता है, वह तुरंत उस लकड़ी को जला देता है, क्योंकि वह उसका विरोधी
५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है, वैसे सामान्य चेतन जो सर्वत्र व्यापक है, वह उस अज्ञान
का विरोधी अर्थात् बाधक नहीं है, किन्तु अपनी सत्ता करके
उसका साधक है, और आत्माकारवृत्त्यवच्छिन्न विशेष चेतन
है, वही उस अज्ञान का बाधक अर्थात् नाशक है । यदि स्वरूप
चेतन अज्ञान का विरोधी होवे, तब जड़ की सिद्धि भी न
होवेगी । यदि आत्मा के प्रकाश का भी अभाव माना जावे,
तब जगदान्ध्य प्रसंग हो जावेगा । इस वास्ते आत्मा के स्वरूप
प्रकाश करके ही जगत् भी प्रकाशमान हो रहा है, स्वतः
जगत् मिथ्या है ॥ ८ ॥
मूलम् ।
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते ।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ॥ ९ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, विकल्पितम्, अज्ञानात्, विश्वम्, मयि, भासते,
रूप्यम्, शुक्तौ, फणी, रज्जौ, वारि, सूर्यकरे, यथा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहो=आश्चर्य है कि | शुक्तौ=शुक्ति में |
| विकल्पितम्=कल्पित | रूप्यम्=चाँदी |
| विश्वम्=संसार | रज्जौ=रस्सी में |
| अज्ञानात्=अज्ञान से | फणी=सर्प |
| मयि=मेरे में | सूर्यकरे=सूर्य की किरणों में |
| ईदृशम्=ऐसा | वारि=जल |
| भासते=भासता है | भासते=भासता है ॥ |
| यथा=जैसे |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि जैसे शुक्ति के अज्ञान जैसे शुक्ति
दूसरा प्रकरण । ५३
में रजत असत् प्रतीत होता है—वैसे ही अज्ञान करके मेरे
स्वप्रकाश आत्मा में असत् जगत् प्रतीत हो रहा है, यही
बड़ा भारी आश्चर्य है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति ।
मृदि कुम्भोज़ले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
मत्तः, विनिर्गतम्, विश्वम्, मयि, एव, लयम्, एष्यति,
मृदि, कुम्भः, जले, वीचिः, कनके, कटकम्, यथा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मत्तः | =मुझ से | मृदि | =मिट्टी में |
| विनिर्गतम् | =उत्पन्न हुआ | कुम्भ | =घड़ा |
| इदम् | =यह | जले | =जल में |
| विश्वम् | =संसार | वाचिः | =लहर |
| मयि | =मुझमें | कनके | =स्वर्ण में |
| लयम् | =लय को | कटकम् | =भूषण |
| एष्यति | =प्राप्त होगा | $\left. लय यान्ति \right}$ | =लय होते हैं ॥ |
| यथा | =जैसे |
भावार्थ ।
जैसे घट मृत्तिका का कार्य है अर्थात् मृत्तिका से ही
उत्पन्न होता है, और फिर फूटकर मृत्तिका में ही लय हो
जाता है—वैसे ही जगत् भी प्रकृति का कार्य है अर्थात्
प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लय हो
जाता है । चेतन आत्मा से न जगत् उत्पन्न होता है, और
न उसमें लय होता है, क्योंकि जगत् जड़ और आत्मा चेतन
५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है । चेतन से जड़ की उत्पत्ति बनती नहीं है—ऐसी सांख्य-शास्त्रवाले की शङ्का है—उसके उत्तर को कहते हैं—
सांख्य-शास्त्रवाले परिणामवादी हैं और पूर्ववाली अवस्था से अवस्थान्तरता को प्राप्त होने का नाम ही परिणाम है । जैसे दूध का परिणाम दधि; मृत्तिका का घट और सुवर्ण का कुण्डल है—वैसे प्रकृति का परिणाम जगत् है—ऐसे सांख्य-शास्त्रवाले मानते हैं ।
नैयायिक आरम्भवादी हैं । अन्य वस्तु से अन्य वस्तु की उत्पत्ति का नाम आरम्भवाद है । जैसे अन्य तन्तु से अन्य पट की उत्पत्ति होती है । वैसे अन्य परमाणुओं से अन्य रूप जगत् की भी उत्पत्ति होती है ।
वेदान्ती का तो विवर्त्तवाद है । जो एक ही वस्तु अपनी पूर्ववाली अवस्था से अन्य अवस्था करके प्रतीत होवे, उसी का नाम विवर्त्त है । जैसे रज्जु का विवर्त्त सर्प है, वह रज्जु ही सर्प-रूप करके प्रतीत होती है । यदि जगत् ब्रह्म का परिणाम माना जावे, तब तो दोष आवे कि चेतन से जड़ कैसे उत्पन्न होता है ? और कैसे जगत् चेतन में लय हो जाता है ? ये सब दोष वेदान्ती के मत में नहीं आते हैं । क्योंकि जैसे रज्जु के अज्ञान से रज्जु सर्प-रूप प्रतीत होती है, और रज्जु के ज्ञान करने उस सर्प की निवृत्ति हो जाती है—वैसे ब्रह्म, आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् की निवृत्ति हो जाती है ।
सांख्यवाले और नैयायिक के मत में अनेक दोष पड़ते हैं । एक तो वेद में परिणामवाद और आरम्भवाद कहीं भी नहीं लिखा है, अतएव उनका मत वेद-विरुद्ध है । दूसरे
दूसरा प्रकरण । ५५
युक्तियों से भी परिणामवाद और आरम्भवाद सिद्ध नहीं
होता है । क्योंकि घट मृत्तिका का परिणाम नहीं है और न
स्वर्ण का परिणाम कुण्डल हो सकते हैं । उत्पत्ति-काल में
भी घट मृत्तिका-रूप ही है, गोलाकार उसका रूप और घट
ये दोनों नाम कल्पित हैं । यदि घट से मृत्तिका निकाल दी
जावे, तब घट का कहीं पता नहीं लग सकता है, अतएव घट
मिथ्या है । इसी तरह स्वर्ण के कुण्डल भी मिथ्या हैं । घट
और कुण्डल भी मृत्तिका का विवर्त्त है, क्योंकि मृत्तिका और
स्वर्ण ही अन्य रूप से घट और कुण्डल प्रतीत हो रहे हैं ।
अतएव व्यवर्त्तवाद ही ठीक है । इसी तात्पर्य को लेकर
जनकजी कहते हैं कि यह सारा जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता
है और फिर मुझसे ही लय हो जाता है । जैसे मृत्तिका से
घट उत्पन्न होता है और फिर मृत्तिका में ही लय हो
जाता है ।
**प्रश्न—**इसमें कोई वेदवाक्य भी प्रमाण है ?
उत्तर—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि
जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, इति श्रुतेः ।
**अर्थ—**जिस आत्मब्रह्म से ये सब भूत प्राणी उत्पन्न होते
हैं, जिस ब्रह्म की सत्ता करके उत्पन्न होकर जीते हैं और
फिर सब मर करके जिसमें लय हो जाते हैं, उसी को तुम
अपना आत्मा जानो । यह वेद-वाक्य भी प्रमाण है ॥१०॥
मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं विनाशी यस्य नास्ति मे ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः ॥ ११ ॥
५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, विनाशः, यस्य, न, अस्ति,
मे, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तम्, जगन्नाशे, अपि, तिष्ठतः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यन्तम् = ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त | $जगन्नाशे = जगत के नाश होने पर |
| अपि = भी | + अतःएव = इसलिये |
| यस्य मे = जिस मेरे | अहम् = मैं |
| तिष्ठतः = होते हुए का | अहो = आश्चर्य्यरूप हूँ |
| विनाशः = नाश | मह्यम् = मेरे लिये |
| न अस्ति = नहीं है | नमः = नमस्कार है ॥ |
भावार्थ ।
प्रश्न— यदि ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण मानोगे, तब वह विकारी हो जावेगा और विकारी होने से नाशी भी हो जावेगा ?
उत्तर— ब्रह्म विकारी और नाशी तब होवे, जब हम जगत् को ब्रह्म का परिणामि उपादान कारण मानें, सो तो नहीं है, किन्तु जगत् को हम ब्रह्म का विवर्त्त मानते हैं, इस वास्ते विकारी और नाशी ब्रह्म कदापि नहीं हो सकता है ।
जनकजी कहते हैं कि मैं आश्चर्य्य-रूप हूँ, क्योंकि सारे जगत् का उपादान कारण होने पर भी मेरा नाश कदापि नहीं होता है एवं स्वर्णादिकों के सदृश विकारता भी मेरे में नहीं है । अतएव मैं अविकारी हूँ और जगत् मेरा विवर्त्त है, इसी कारण वह विवर्त्त का अधिष्ठान-रूप है । उपादान की सत्ता से कार्य्य की सत्ता के विषम होने का नाम विवर्त्त है ।
दूसरा प्रकरण । ५७
ब्रह्म की पारमार्थिक सत्ता है और जगत् की प्रातिभासिक सत्ता है । ब्रह्म तीनों कालों में नित्य है और जगत् तीनों कालों में अनित्य है, किन्तु केवल प्रतीति-मात्र ही है, इस वास्ते जगत् ब्रह्म का विवर्त्त है । जगत् की उत्पत्ति आदिकों के होने से ब्रह्म का एक रोवाँ भी नहीं बिगड़ता है अर्थात् ब्रह्म की किञ्चिन्मात्र भी हानि नहीं होती है ब्रह्मा से लेकर चींटीपर्यन्त जगत् के नाश होने पर भी ब्रह्म ज्यों का त्यों एकरस रहता है, वही ऐसा पारमार्थिक स्वरूप है ॥ ११ ॥
मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि ।
क्वचिन्नगन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ १२ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, एक, अहम्, देहवान्, अपि, क्वचित्, न, गन्ता, न, आगन्ता, व्याप्य, विश्वम्, अवस्थितः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम् = मैं | न क्वचित् = न कहीं |
| अहो = आश्चर्य-रूप हूँ | गन्ता = जानेवाला हूँ |
| मह्यम् = मेरे लिये | न क्वचित् = न कहीं |
| नमः = नमस्कार है | आगन्ता = आनेवाला हूँ |
| अहम् = मैं | विश्वम् = संसार को |
| देहवान् = देहधारी होता हुआ | व्याप्य = आच्छादित करके |
| अपि = भी | अवस्थितः = स्थित हूँ |
| एकः = अद्वैत हूँ |
भावार्थ ।
प्रश्न—आत्मा अनेक प्रतीति होते हैं, क्योंकि प्रत्येक देह
५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
में आत्मा सुख दुःखादिवाला पृथक् ही प्रतीत होता है। यदि
आत्मा एक होवे, तब एक के सुखी होने से सबको सुखी
होना चाहिए तथा एक के दुःखी होने से सबको दुःखी होना
चाहिए। एक के चलने से सबको चलना और एक के
बैठने से सबका बैठना होना चाहिए ?
उत्तर—जनकजी कहते हैं कि बड़ा आश्चर्य है कि मेरा
आत्मा एक ही है, तथापि अनेक देहरूपी उपाधियों के भेद
करके अनेक आत्मा प्रतीत हो रहे हैं। जैसे एक ही जल
नाना घट-रूपी उपाधियों में नाना रूपवाला प्रतीत होता
है। जैसे एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब नाना जलोपाधियों में
हिलता-चलता प्रतीत होता है। और जैसे एकही आकाश
नाना घटमठादिक उपाधियों में क्रिया आदिकवाला प्रतीत
होता है, परन्तु वास्तव में वे क्रिया आदि सब उपाधियों के
धर्म हैं, आकाश के नहीं हैं। वैसे सुख दुःख गमनागमनादिक
भी सब देहादि उपाधियों के धर्म हैं, आत्मा के नहीं हैं, इसी
से एक ही आत्मा गमनादिकों से रहित व्यापक होकर स्थित
है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः ।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम् दक्षः, न, अस्ति, इह, मत्समः,
असंस्पृश्य, शरीरेण, येन, विश्वम्, चिरम्, धृतम् ॥
दूसरा प्रकरण । ५९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | येन | = क्यों कि |
| अहो | = आश्चर्य-रूप हूँ | शरीरेण | = शरीर से |
| नमः | = नमस्कार है | असंस्पृश्य | = पृथक् |
| मह्यम् | = मुझको | मया | = मुझ करके |
| इह | = इस संसार में | + इदम् | = यह |
| मत्समः | = मेरे तुल्य | चिरम् | = चिरकाल पर्यन्त |
| दक्षः | = चतुर | विश्वम् | = विश्व |
| न अस्ति | = कोई नहीं है | धृतम् | = धारण किया गया है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**असंग आत्मा का शरीरादिकों के साथ संसर्ग कैसे हो सकता है ? और जगत् को कैसे धारण कर सकता है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि यही तो बड़ा आश्चर्य है कि जो मैं असंग हो करके भी शरीरादिकों को चेष्टा कराता हूँ । जैसे चुम्बक पत्थर आप क्रिया से रहित भी है तथापि लोहे को चेष्टा कराता है । जैसे उसमें एक विलक्षण शक्ति है, वैसे आत्मा में भी एक विलक्षण शक्ति है । वह शरीरादिकों के अन्तर असंग स्थित है, पर क्रिया-रहित है, परन्तु शरीर इन्द्रियादिक सब अपने-अपने काम को करते हैं । जैसे अग्नि घृत के पिण्ड से अलग रह करके भी उसको पिघला देती है, वैसे ही आत्मा भी सबसे असंग रह करके भी और क्रिया से रहित हो करके भी सारे जगत् को क्रियावान् कर देता है । इसी से जनकजी कहते हैं कि मेरे तुल्य कोई चतुर नहीं है, इसी कारण मैं अपने आपको ही नमस्कार करता
६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
हूँ । एवं मुझसे अन्य दूसरा कोई नहीं है कि उसको नमस्कार
करूँ ॥ १३ ॥
मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, यस्य, मे, न, अस्ति, किञ्चन,
अथवा, यस्य, मे, सर्वम्, यत्, वाङ्मनसगोचरम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | अस्ति | = है |
| अहो | = आश्चर्य-रूप हूँ | अथवा | = या |
| मह्यम् | = मुझको | यस्य | = जिस |
| नमः | = नमस्कार है | मे | = मेरे का |
| यस्य | = जिस | + तत् | = वह |
| मे | = मेरे का | सर्वम् | = सब है |
| किञ्चन | = कुछ | यत् | = जो कुछ |
| न | = नहीं | वाङ्मनसगोचरम् | = वाणी और मन का विषय है ॥ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मेरे में सम्बन्धवाला कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि वास्तव में कोई पदार्थ सत्य नहीं है, केवल एक ब्रह्मात्मा ही परमार्थ से सत्य है ।
नेह नाना नास्ति किञ्चन ।
इस चेतन आत्मा में नानारूप करके जो जगत् प्रतीत होता है, सो वास्तव में नहीं है—ऐसे श्रुति कहती है ।
दूसरा प्रकरण । ६१
मृत्योर्वै मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।
वह मृत्यु से भी मृत्यु को प्राप्त होता है, जो ब्रह्म में नानात्व को देखता है अर्थात् नाना आत्मा को देखता है इत्यादि अनेक श्रुतिवाक्य है जो द्वैत का निषेध करते हैं । फिर जनकजी कहते हैं कि जितना मन और वाणी का विषय है, वह सब मिथ्या है, उसका मुझ चैतन्य-स्वरूप आत्मा के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है । इसी वास्ते मैं अपने ही आश्चर्य-रूप आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥१४॥
मूलम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् ।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥
पदच्छेदः ।
ज्ञानम्, ज्ञेयम्, तथा, ज्ञाता, त्रितयम्, न, अस्ति, वास्तवम्, अज्ञानात्, भाति, यत्र, इदम्, सः, अहम्, अस्मि, निरञ्जनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानम् = | ज्ञान | अज्ञानात् = | अज्ञान से |
| ज्ञेयम् = | ज्ञेय | + यत्र = | जिस विषे |
| तथा = | और | ||
| ज्ञाता = | ज्ञाता | इदम् = | यह तीनों |
| त्रितयम् = | तीनों | भाति = | भासता है |
| यत्र = | जिसे | सः = | सोई |
| वास्तवम् = | यथार्थ से | अहम् = | मैं |
| न अस्ति = | नहीं है | निरञ्जनः = | निरञ्जन-रूप |
| + च = | और | अस्मि = | हूँ ॥ |
६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; यह जो त्रिपुटी-रूप है, सो भी वास्तव में नहीं है, किन्तु अज्ञान करके चेतन में ये तीनों प्रतीत होते हैं। वास्तव में चेतन का इनके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है। जो माया और माया के कार्य से रहित चेतन आत्मा है, सो मैं ही हूँ ॥१५॥
मूलम् ।
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् ।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥
पदच्छेदः ।
द्वैतमूलम्, अहो, दुःखम्, न, अन्यत्, तस्य, अस्ति, भेषजम्, दृश्यम्, एतत्, मृषः, सर्वम्, एकः, अहम्, चिद्रसः, अमलः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहो = | आश्चर्य्य है कि | एतत् = | यह |
| द्वैतमूलम् = | द्वैत है मूलकारण जिसका, ऐसा | सर्वम् = | सब |
| यत् = | जो | दृश्यम् = | दृश्य |
| दुःखम् = | दुःख है | मृषा = | झूठ है |
| तस्य = | उसकी | अहम् = | मैं |
| भेषजम् = | ओषधि | एकः = | एक अद्वैत |
| अन्यतः = | कोई | अमलः = | शुद्ध |
| अस्ति = | नहीं है | चिद्रसः = | चैतन्य-रस हूँ |
भावार्थ ।
प्रश्न—जब आत्मा निरञ्जन है, तब उसका दुःख के
दूसरा प्रकरण । ६३
साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है, पर देखने में आता है
और लोक भी कहते हैं कि हम बड़े दुःखी हैं ?
उत्तर—निरञ्जन आत्मा को भी द्वैत भ्रम से दुःख
प्रतीत होता है, वास्तव में वह दुःखी नहीं ।
प्रश्न—इस भ्रम-रूपी महान् व्याधि की ओषधि क्या है ?
उत्तर—जो द्वैत प्रतीत हो रहा है, यह सब मिथ्या है ।
वास्तव में सत्य नहीं है । वास्तव में सत्यबोध-रूप आत्मा
ही है, ऐसा जो ज्ञान है, वही त्रिविध दुःख की निवृत्ति की
ओषधि है, और कोई उसकी ओषधि नहीं है ॥ १६ ॥
मूलम् ।
बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया ।
एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७ ॥
पदच्छेदः ।
बोधमात्रः, अहम्, अज्ञानात्, उपाधिः, कल्पितः, मया,
एवम्, विमृश्यतः, नित्यम्, निर्विकल्पे, स्थितिः, मम ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम्=मैं | एवम्=इस प्रकार |
| बोधमात्रः=बोध-रूप हूँ | नित्यम्=नित्य |
| मया=मुझ करके | विमृश्यतः=विचार करते हुए |
| अज्ञानात्=अज्ञान से | मम=मेरा |
| उपाधिः=उपाधि | स्थितिः=स्थिति |
| कल्पितः=कल्पना किया गया है | निर्विकल्पे=निर्विकल्प में है ॥ |