अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextदूसरा प्रकरण । ५९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | येन | = क्यों कि |
| अहो | = आश्चर्य-रूप हूँ | शरीरेण | = शरीर से |
| नमः | = नमस्कार है | असंस्पृश्य | = पृथक् |
| मह्यम् | = मुझको | मया | = मुझ करके |
| इह | = इस संसार में | + इदम् | = यह |
| मत्समः | = मेरे तुल्य | चिरम् | = चिरकाल पर्यन्त |
| दक्षः | = चतुर | विश्वम् | = विश्व |
| न अस्ति | = कोई नहीं है | धृतम् | = धारण किया गया है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**असंग आत्मा का शरीरादिकों के साथ संसर्ग कैसे हो सकता है ? और जगत् को कैसे धारण कर सकता है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि यही तो बड़ा आश्चर्य है कि जो मैं असंग हो करके भी शरीरादिकों को चेष्टा कराता हूँ । जैसे चुम्बक पत्थर आप क्रिया से रहित भी है तथापि लोहे को चेष्टा कराता है । जैसे उसमें एक विलक्षण शक्ति है, वैसे आत्मा में भी एक विलक्षण शक्ति है । वह शरीरादिकों के अन्तर असंग स्थित है, पर क्रिया-रहित है, परन्तु शरीर इन्द्रियादिक सब अपने-अपने काम को करते हैं । जैसे अग्नि घृत के पिण्ड से अलग रह करके भी उसको पिघला देती है, वैसे ही आत्मा भी सबसे असंग रह करके भी और क्रिया से रहित हो करके भी सारे जगत् को क्रियावान् कर देता है । इसी से जनकजी कहते हैं कि मेरे तुल्य कोई चतुर नहीं है, इसी कारण मैं अपने आपको ही नमस्कार करता