अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
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६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
हूँ । एवं मुझसे अन्य दूसरा कोई नहीं है कि उसको नमस्कार
करूँ ॥ १३ ॥
मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, यस्य, मे, न, अस्ति, किञ्चन,
अथवा, यस्य, मे, सर्वम्, यत्, वाङ्मनसगोचरम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | अस्ति | = है |
| अहो | = आश्चर्य-रूप हूँ | अथवा | = या |
| मह्यम् | = मुझको | यस्य | = जिस |
| नमः | = नमस्कार है | मे | = मेरे का |
| यस्य | = जिस | + तत् | = वह |
| मे | = मेरे का | सर्वम् | = सब है |
| किञ्चन | = कुछ | यत् | = जो कुछ |
| न | = नहीं | वाङ्मनसगोचरम् | = वाणी और मन का विषय है ॥ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मेरे में सम्बन्धवाला कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि वास्तव में कोई पदार्थ सत्य नहीं है, केवल एक ब्रह्मात्मा ही परमार्थ से सत्य है ।
नेह नाना नास्ति किञ्चन ।
इस चेतन आत्मा में नानारूप करके जो जगत् प्रतीत होता है, सो वास्तव में नहीं है—ऐसे श्रुति कहती है ।