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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
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२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहःशान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥१२॥

पदच्छेदः ।

आत्मा, साक्षी, विभुः, पूर्णः, एकः, मुक्तः, चित्, अक्रियः,
असंगः, निस्पृहः, शान्तः, भ्रमात्, संसारवान्, इव ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्माअक्रियः = क्रिया-रहित है
साक्षी = साक्षी हैअसंगः = संग-रहित है
विभुः = व्यापक हैनिःस्पृहः = इच्छा-रहित है
पूर्णः = पूर्ण हैशान्तः = शान्त है
एकः = एक हैभ्रमात् = भ्रम के कारण
मुक्तः = मुक्त हैसंसारवान् = संसारवाला
चित् = चैतन्य-रूप हैइव = भासता है

भावार्थ ।

हे जनक ! बन्ध और मोक्ष दोनों अवास्तविक हैं और केवल अपने स्वरूप की अज्ञानता से देहादिकों में अभिमान करके, जीव अपने को बन्धायमान करके, मुक्त होने की इच्छा करता है । वास्तव में न उसमें बन्ध है और न मोक्ष है । जीव-आत्मा है, एक है, पूर्ण है, मुक्त है, असंग है, निःस्पृह है और शान्त है । भ्रम करके संसारवाला भान होता है । वास्तव में, उसमें संसार तीनों कालों में नहीं है, इसमें एक दृष्टांत कहते हैं—

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पहला प्रकरण । २९

एक पुरुष का नाम बेवकूफ था और उसकी स्त्री का नाम फजीती था । एक दिन उसकी स्त्री उसके साथ लड़ाई झगड़ा करके कहीं चली गई । तदनंतर वह स्त्री खोजने के लिए जंगल में गया । वहाँ पर एक तपस्वी उसको मिला और उससे पूछा कि तू जंगल में क्यों घूमता है ? उसने कहा कि मैं अपनी स्त्री को खोजता हूँ । तब उस तपस्वी ने कहा कि तुम्हारी स्त्री का क्या नाम है ? और तुम्हारा क्या नाम है ? तब उसने कहा कि मेरा नाम बेवकूफ है, और मेरी स्त्री का नाम फजीती है । तब उसने कहा “बेवकूफ” को फजीतियों की क्या कमती है ? जहाँ पर जावेगा, वहाँ पर उस बेवकूफ को फजीती मिल जावेगी ।

दाष्टांत में जब तक जीव अज्ञानी मूर्ख बना है, तबतक इसको जन्म-मरण-रूपी फजीतियों की क्या कमती है । जब ज्ञानवान् होगा तब बंध से रहित हो जावेगा ।

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! नैयायिक लोग आत्मा का वास्तविक बंध-मोक्ष मानते हैं, उनका मानना ठीक है या नहीं ?

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! नैयायिक आदिकों का कथन सर्व-युक्ति और वेद से विरुद्ध है । यदि आत्मा को वास्तविक बंध होता, तब उसकी निवृत्ति कदापि न होती, और साधन भी सब व्यर्थ हो जाते, पर ऐसा तो नहीं है, क्योंकि वेद उसकी निवृत्ति को लिखता है और आत्मा वास्तव में संसारी नहीं है । इसी में दस हेतुओं को दिखाते हैं—

( १ ) अहंकार आदिकों का भी आत्मा साक्षी है, पर कर्ता नहीं है ।

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३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

( २ ) आत्मा विभु अर्थात् सर्व का अधिष्ठान है ।
( ३ ) आत्मा एक है अर्थात् सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से रहित है ।
( ४ ) आत्मा मुक्त है अर्थात् माया और माया के कार्य देहादिकों से भी रहित है ।
( ५ ) आत्मा चित् है अर्थात् चैतन्य-स्वरूप है ।
( ६ ) आत्मा अक्रिय है अर्थात् चेष्टा से रहित है, क्योंकि परिच्छिन्न में चेष्टा अर्थात् क्रिया होती है, व्यापक में नहीं होती है ।
( ७ ) आत्मा असंग है अर्थात् सम्पूर्ण सम्बन्धों से रहित है ।
( ८ ) आत्मा निःस्पृह है अर्थात् विषयों की अभिलाषा से भी रहित है ।
( ९ ) आत्मा शान्त है अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति देहादि अन्तःकरण के धर्मों से रहित है ।
( १० ) आत्मा केवल भ्रम के कारण संसारवाला भासित होता है । इन दस हेतुओं करके आत्मा वास्तव में संसारी नहीं हो सकता है ।
“असंगो ह्ययं पुरुषः” ।
यह आत्मा असंग है ।
“न जायते म्रियते वा कदाचित्” ।
अर्थात् आत्मा वास्तव में न जन्म लेता है, न मरता है—यह गीता-वाक्य और अनेक श्रुति-वाक्य भी आत्मा की असंगता में प्रमाण हैं । इसी से नैयायिक आदि मिथ्यावादी सिद्ध होते हैं ॥ १२ ॥

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पहला प्रकरण । ३१

मैं परिच्छिन्न हूँ, मेरे ये देहादिक हैं, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इस तरह के जो अन्तःकरण के धर्मों को अध्यास करके आत्मा में जीवों ने मान रक्खा है, उस अध्यास-रूपी भ्रम की निवृत्ति तो एक बार असंग आत्मा के उपदेश करने से नहीं होती है । इसी पर व्यास भगवान् ने सूत्र कहा है—
“आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ।”

ज्ञान की स्थिति के लिये श्रवण-मनन आदिकों की आवृत्ति पुनःपुनः करे, क्योंकि उद्दालक ने अपने पुत्र के प्रति, नव बार ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का उपदेश किया है, बारंबार श्रवणादिकों के करने से चित्त की वृत्ति विजातीय भावना का त्याग करके सजातीय भावनावाली होकर आत्माकार हो जाती है, इसी वास्ते जनकजी को पुनः-पुनः आत्म-ज्ञान का उपदेश अष्टावक्रजी करते हैं—

मूलम् ।

कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय ।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम् ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

कूटस्थम्, बोधम्, अद्वैतम्, आत्मानम्, परिभावय, आभासः, अहम्, भ्रमम्, मुक्त्वा, भावम्, बाह्यम्, अथ, अन्तरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंइति =ऐसे
आभासः =आभास-रूप अहंकारी जीव हूँभ्रमम् =भ्रम को
अथ =और
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३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

बाह्यम्=बाहरकूटस्थम्=कूटस्थ
अन्तरम्=भीतरबोधम्=बोध-रूप
भावम्=भाव कोअद्वैतम्=अद्वैत
मुक्त्वा=छोड़ करकेआत्मानम्=आत्मा को
त्वम्=तूपरिभावय=विचार कर ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! "मैं आभास हूँ" "मैं अहंकार हूँ" इस भ्रम का त्याग करके और जो बाहर के पदार्थों में ममता हो रही है कि 'यह मेरा शरीर है' 'मेरे ये कान नाक आदिक हैं' इन सबमें—'अहं' और 'मम' भावना का त्याग करके और अन्तर अन्तःकरण के धर्म जो सुख दुःखादिक हैं, उनमें जो तुझको अहंभावना हो रही है, उसका त्याग करके आत्मा को अकर्त्ता, कूटस्थ, असंग, ज्ञान-स्वरूप, अद्वैत और व्यापक निश्चय कर ॥ १३ ॥

जनकजी प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज ! अनादि काल का जो देहादिकों में अभिमान हो रहा है, वह एक बार के उपदेश से दूर नहीं हो सकता है, अतएव आप पुनः-पुनः मेरे को उपदेश करिये ताकि श्रवण करके मेरा देहादि अभिमान दूर हो जावे ।

इस प्रश्न को सुनकर अष्टावक्रजी फिर आत्म-विद्या के उपदेश को करते हैं—

मूलम् ।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक ।
बोधोऽहं ज्ञानखङ्गेन तन्निष्कृत्य सुखीभव ॥ १४ ॥

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पहला प्रकरण । ३३

पदच्छेदः ।
देहाभिमानपाशेन, चिरम्, बद्धः, असि, पुत्रक, बोधः,
अहम्, ज्ञानखड्गेन, तत्, निष्कृत्य, सुखीभव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
पुत्रक=हे पुत्र !बोधः=बोध-रूप हूँ
देहाभिमान- पाशेन=$देह के अभिमान-रूपी पाश सेइति=ऐसे
ज्ञानखड्गेन=ज्ञान-रूपी तलवार से
चिरम्=बहुत काल कातत्=उसको यानी उस रस्सीको
बद्धः=बँधा हुआनिष्कृत्य=काट करके
असि=तू हैत्वम्=तू
अहम्=मैंसुखीभव=सुखी हो ॥

भावार्थ ।
हे जनक ! “देहोऽहम्” मैं देह हूँ—इस प्रकार के अभिमान करके तू चिरकाल से बन्धायमान हो रहा है अर्थात् अपने को संसार-बंध में डाल रहा है, अब तू आत्म-ज्ञान-रूपी खङ्ग से उसका छेदन करके, ‘मैं ज्ञान-स्वरूप हूँ’, ‘नित्य-मुक्त हूँ’—ऐसा निश्चय करके सुखी हो, क्योंकि तेरे में बन्धन तीनों काल में नहीं है ॥१४॥

जनकजी फिर पूछते हैं कि हे भगवन् ! पतंजलिजी के मतानुयायी चित्त-वृत्ति के निरोध-रूप योग को ही बंध की निवृत्त का हेतु मानते हैं, सो उनका मानना ठीक है या नहीं ?

मूलम् ।
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः ।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ १५ ॥

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३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
निःसंगः, निष्क्रियः, असि, त्वम्, स्वप्रकाशः, निरञ्जनः, अयम्, एव, हि, ते, बन्धः, समाधिम्, अनुतिष्ठसि ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
त्वम् = तूते = तेरा
निःसंगः = संग-रहित हैबन्धः = बंधन है
निष्क्रियः = क्रिया-रहित हैहि = जो
स्वप्रकाशः = स्वयं प्रकाश-रूप हैसमाधिम् = समाधि को
निरञ्जनः = निर्दोष हैअनुतिष्ठसि = अनुष्ठान करता है ।
अयम्‌एव = यही

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू निःसंग है अर्थात् सबके सम्बन्ध से तू रहित है और क्रिया से भी तू रहित है । सम्बन्ध से रहित और क्रिया से रहित आत्माकी प्राप्ति के लिये जो समाधि का अनुष्ठान करना है, उसी का नाम बन्ध है । जो स्वप्रकाश आत्मा का ध्यान, जड़-वृत्ति का निरोध करके करता है, उससे बढ़कर और कोई बन्ध नहीं है, और न कोई अज्ञान है । आत्मा के स्वरूप के ज्ञान से भिन्न, जितने मुक्ति के उपाय कहे गए हैं, वे सब बंध के ही कारण हैं, किन्तु सब बन्ध-रूप ही हैं ॥ १५ ॥

अब अष्टावक्रजी जनक की विपरीति बुद्धि के दूर करने के निमित्त उपदेश करते हैं—

मूलम् ।
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः ।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मागमः क्षुद्रचित्तताम् ॥ १६ ॥

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पहला प्रकरण । ३५

पदच्छेदः ।
त्वया, व्याप्तम्, इदम्, विश्वम्, त्वयि, प्रोतम्, यथार्थतः,
शुद्धबुद्धस्वरूपः, त्वम्, मागमः, क्षुद्रचित्तताम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्=यहत्वम्=तू
विश्वम्=संसारयथार्थतः=परमार्थ से
त्वया=तुझ करकेशुद्धबुद्ध-स्वरूपः} =शुद्ध चैतन्य-स्वरूप है
व्याप्तम्=व्याप्त हैक्षुद्रचित्तताम्} =विपरीत चित्त-वृत्ति को
त्वयि=तुझी मेंमागमः=मत प्राप्त हो ।
प्रोतम्=पिरोया है

भावार्थ ।
हे जनक ! जैसे स्वर्ण करके कंकणादिक व्याप्त हैं और मृत्तिका करके जैसे घटादिक व्याप्त हैं, वैसे यह सारा जगत् तुझे चेतन करके व्याप्त है और जैसे माला के सूत में दाने सब पिरोये हुए रहते हैं, वैसे यह सारा जगत् तेरे चेतन-रूप तागे करके पिरोया हुआ है । जैसे मिथ्या रजत शुक्ति की सत्ता करके सत्यवत् प्रतीत होती है—वास्तव में वह सत्य नहीं है, वैसे चेतन की सत्ता करके जगत् सत्य की तरह प्रतीत होता है—वास्तव में जगत् सत्य नहीं है । जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है, किन्तु तेरे संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है, और तेरे संकल्प के निवृत्त होने से यह जगत् भी निवृत्त हो जावेगा । तू अपने शुद्ध-स्वरूप में स्थित हो, और क्षुद्रता को मत प्राप्त हो ।
मन्दालसा ने भी अपने पुत्रों को यही उपदेश करके संसार-बंधन से छुड़ा दिया था—

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३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि संसारमायापरिवर्जितोऽसि ।
संसारस्वप्नस्त्यज मोहनिद्रां मग्दालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥१॥

अर्थात् हे तात ! तू शुद्ध है, ज्ञान-स्वरूप है, माया-मल से तू रहित है, तू संसार-रूपी असत् माया नहीं है, संसार-रूपी स्वप्न मोह-रूपी निद्रा करके प्रतीत हो रहा है, इसको तू त्याग दे । इस प्रकार माता के उपदेश से वे जीवनमुक्त हो गये ।
हे जनक ! तू भी ऐसा विचार करके संसार में जीवन्मुक्त होकर विचर ॥ १६ ॥

मूलम् ।
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः ।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७ ॥

पदच्छेदः ।
निरपेक्षः, निर्विकारः, निर्भरः, शीतलाशयः, अगाधबुद्धिः, अक्षुब्ध, भव, चिन्मात्रवासनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम्=तू$\left.\begin{matrix}अगाध \ बुद्धिः\end{matrix}\right}$=अगाध चैतन्य बुद्धिरूप है
निरपेक्षः=अपेक्षा रहित हैअक्षुब्धः=$\left{\begin{matrix}अविद्या के क्षोभ \ से रहित है\end{matrix}\right.$
निर्विकारः=विकार-रहित है$\left.\begin{matrix}चिन्मात्र- \ वासनः\end{matrix}\right}$=चैतन्य मात्र में
निर्भरः=चिद्घन-रूप हैभव=निष्ठावाला हो ।
शीतलाशयः=$\left{\begin{matrix}शान्ति और मुक्ति \ का स्थान है\end{matrix}\right.$

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! निरपेक्ष हो अर्थात् षडूर्िमयों से रहित हो ।

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पहला प्रकरण । ३७

१-भूख, २-प्यास, ३-शोक, ४-मोह, ५-जन्म, ६-मरण इन छहों का नाम षट्ऊर्मि है। इनमें से भूख और प्यास ये दो प्राण के धर्म हैं। शोक और मोह ये दो मन के धर्म हैं। जन्म और मरण ये दो सूक्ष्म-देह के धर्म हैं। तुझ आत्मा के धर्म ये कोई नहीं—

जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति ।

अर्थात् जो उत्पन्न होता है, स्थित है, बढ़ता है, परिणाम को प्राप्त होता है, क्षण-क्षण में क्षीण होता है और नाश हो जाता है, ये षट्भाव-विकार स्थूल देह के धर्म हैं, तुझ आत्मा के धर्म नहीं हैं, क्योंकि तू सूक्ष्म देह से और स्थूल-देह से परे है, और इन दोनों का द्रष्टा है, इसी से तू निर्विकार है, सच्चिदानन्द रूप है, शीतल है अर्थात् सुख-रूप है अगाध बुद्धिवाला है, अक्षुब्ध है अर्थात् अविद्याकृत क्षोभ से रहित है, अतएव तू क्रिया से रहित होकर चैतन्य-स्वरूप में निष्ठावाला है ॥ १७ ॥

अष्टावक्रजी ने उत्थान का दूसरे श्लोक में जनकजी को मोक्ष का उपाय इस प्रकार उपदेश किया कि विषयों को तू विष के तुल्य त्याग कर, और सत्य को तू अमृत के तुल्य पान कर, परन्तु विषयों की ओर विष की तुल्यता में, और सत्य-रूप आत्मा की ओर अमृत की तुल्यता में कोई भी हेतु नहीं कहा, अतः आगे उसको कहते हैं।

मूलम् ।
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ १८ ॥

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३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

साकारम्, अनृतम्, विद्धि, निराकारम्, तु, निश्चलम्,
एतत्तत्त्वोपदेशेन, न, पुनः, भवसम्भवः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
साकारम् =शरीरादिकों को$\left.\begin{matrix} एतत्तत्त्वो- \ पदेशेन \end{matrix}\right}$ =इस यथार्थ उपदेश से
अनृतम् =मिथ्यापुनः =फिर
विद्धि =जानभवसम्भवः =संसार में उत्पत्ति
निराकारम् =निराकार आत्म-तत्त्व कीन =नहीं
निश्चलम् =निश्चल नित्यभवति =होती है
विद्धि =जान

भावार्थ ।

हे जनक ! साकार जो शरीरादिक हैं, उनको तू मिथ्या जान । जो मिथ्या होकर बन्ध का हेतु होता है, वही विष के योग्य त्यागने योग्य भी होता है । इसी में एक दृष्टान्त कहते हैं—

एक बनिये के घर में लड़का नहीं होता था । एक दिन रात्रि के समय वह पलँग पर अपनी स्त्री के साथ सो रहा था । उसकी स्त्री ने उस बनिये से कहा कि यदि परमेश्वर हमको एक लड़का दे देवे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । बनिया थोड़ा सा पीछे हटा और कहा कि उस लड़के को यहाँ बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । वह थोड़ासा और पीछे हटकर कहने लगा कि उसको भी बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ सुलावेंगे । फिर पीछे हटकर यह कहता ही था कि

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पहला प्रकरण । ३९

इतने में नीचे गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई और हाय,
हाय करके रोने लगा । तब इधर-उधर से पड़ोस के लोग
आकर पूछने लगे कि क्या हुआ, कैसे टाँग तेरी टूट गई ।
तब बनिये ने कहा कि बिना हुए, मिथ्या लड़के ने मेरी टाँग
तोड़ दी । यदि सच्चा होता, तब न जाने क्या अनर्थ करता,
वैसे ही साकार जितने स्त्री पुरुषादिक विषय हैं, वे सब दुःख
के हेतु हैं, ये विष के तुल्य त्यागने योग्य हैं ।
हे जनक ! जो निराकार आत्मतत्त्व है, वह निश्चल है
और नित्य है । श्रुति भी ऐसा ही कहती है—

“नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”

अर्थात् आत्मा नित्य, विज्ञान और आनन्दस्वरूप है,
उसी आत्म-तत्त्व में स्थिरता को पाकर हे जनक ! फिर तू
जन्म-मरण रूपी संसार को नहीं प्राप्त होवेगा ॥ १८ ॥

अब अष्टावक्रजी वर्णाश्रमी धर्मवाले स्थूल शरीर से और
धर्माऽधर्म-रूपी संस्कारवाले लिंग-शरीर से विलक्षण, परिपूर्ण
चैतन्य-स्वरूप आत्मा को दृष्टान्त के सहित कहते हैं ।

मूलम् ।

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेन्तः परितस्तु सः ।
तथैवास्मिञ्छरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।

यथा, एव, आदर्शमध्यस्थे, रूपे, अन्तः, परितः, तु, सः,
तथा, एव, अस्मिन्, शरीरे, अन्तः, परितः, परमेश्वरः ॥

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४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यथा=जैसेभासते=भासता है
एव=निश्चय करकेतथा एव=वैसे ही
आदर्श- मध्यस्थेदर्पण के मध्य में स्थित हुएअस्मिन्= शरीरेइस शरीर में
रूपे=प्रतिबिम्ब मेंअन्तः परितः=भीतर और बाहर से
सः=वह शरीरपरमेश्वरः=परमेश्वर भासता है ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब जो शरीरादिक हैं, उनके अन्तर, मध्य और बाहर, चारों तरफ दर्पण व्याप्त हो करके वर्तता है अर्थात् वह प्रतिबिम्ब अध्यस्त है, अर्थात् दर्पण में देखने-मात्र का है, स्वरूप से सत्य नहीं है, वैसे ही अपने आत्मा में अध्यस्त जो शरीर है, उसके भीतर, बाहर, मध्य और सर्व ओर चेतन आत्मा ही व्याप्त करके स्थित है । हे राजन् ! कल्पित पदार्थ की अधिष्ठान से भिन्न अपनी सत्ता कुछ भी नहीं होती है, किन्तु अधिष्ठान की सत्ता करके वह सत्यवत् प्रतीत होता है—जैसे शुक्ति में रजत, और दर्पण में प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है, वैसे शरीरादिक भी आत्मा में उसी की सत्ता करके सत्य के सदृश प्रतीत होते हैं, वास्तव में ये भी सत्य नहीं हैं, किन्तु मिथ्या हैं ॥ १९ ॥

दर्पण के दृष्टांत से कदाचित् जनक को ऐसा भ्रम हो जावे कि जैसे दर्पण परिच्छिन्न है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न होगा, इस भ्रम के दूर करने के लिये ऋषिजी दूसरा दृष्टांत देते हैं ।

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पहला प्रकरण । ४१

मूलम् ।
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे ।
नित्यं निरन्तर ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा ॥ २० ॥

पदच्छेदः ।
एकम्, सर्वगतम्, व्योम बहिः, अन्त:, यथा, घटे, नित्यम्, निरन्तर, ब्रह्म, सर्वभूतगणे, तथा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यथा=जैसेअस्ति=स्थित है
सर्वगतम्=सर्वगततथा=वैसे ही
एकम्=एकनित्यम्=नित्य
व्योम=आकाशनिरन्तरम्=निरंतर
बहिः=बाहरब्रह्म=ब्रह्म
अन्तः=भीतरसर्वभूतगणे=सब भूतों के शरीर में
घटे=घट मेंअस्ति=स्थित है ॥

भावार्थ ।
जैसे सर्वगत एक ही आकाश घटपटादिकों में बाहर, भीतर और मध्य में व्यापक है, वैसे ही नित्य, अविनाशी आत्मा भी संपूर्ण भूतों के गणों में बाहर, भीतर और मध्य में व्यापक है ।
“एष ते आत्मा सर्वस्यान्तर इति श्रुतेः”
यह तेरा ही आत्मा सबके अन्तर व्यापक है, ऐसा जानकर हे जनक ! तू सुखपूर्वक विचर ॥ २० ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां प्रथमं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

दूसरा प्रकरण (आश्चर्य / आत्मोल्लास)

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दूसरा प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः ।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः ॥१॥

पदच्छेदः ।

अहो निरञ्जनः, शान्तः, बोधः, अहम्, प्रकृतेः, परः, एतावन्तम्, अहम्, कालम्, मोहेन, एव, विडंबितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंअहो=आश्चर्य है कि
निरञ्जनः=निर्दोष हूँअहम्=मैं
शान्तः=शान्त हूँएतावन्तम्=इतने
बोधः=बोध रूप हूँकालम्=काल पर्यन्त
प्रकृते=प्रकृति सेमोहेन=अज्ञान करके
परः=परे हूँएव=निःसन्देह
विडंबितः=ठगा गया हूँ

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी के उपदेश से जनक जी को आत्मा का साक्षात्कार जब उदय हुआ, तब जनकजी अपने चेतन स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार करके अपने अनुभव को प्रकट करते हुए वाधितानुवृत्ति से पूर्व प्रतीत हुए मोह के स्मरण को बड़े आश्चर्य के साथ प्रकट करते हैं—

मैं निरंजन अर्थात् संपूर्ण उपाधियों से रहित एवं शान्त-स्वरूप होकर, अर्थात् संपूर्ण विकारों से रहित होकर, तथा प्रकृति अर्थात् माया-रूपी अंधकार से भी परे होकर, और

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दूसरा प्रकरण । ४३

बोध-स्वरूप अर्थात् ज्ञान-स्वरूप होकर, इतने काल तक देह
और आत्मा के अविवेक करके दुःखी होता रहा। आज से
हे गुरो ! आपकी कृपा करके मैं आत्मानन्द अनुभव को
प्राप्त हुआ हूँ ॥ १ ॥

मूलम् ।
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत् ।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
यथा, प्रकाशयामि, एकः, देहम्, एनम्, तथा, जगत्,
अतः, मम, जगत्, सर्वम्, अथवा, न च, किञ्चन ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यथा=जैसेअन्तः=इसलिये
एनम्=इसमम=मेरा
देहम्=देह कोसर्वम्=सम्पूर्ण
एकः=अकेला हीजगत्=संसार है
प्रकाशयामि=मैं प्रकाश करता हूँअथवा=या
तथा=वैसे ही+ मम=मेरा
जगत्=संसार को भीकिञ्चन=कुछ भी
प्रकाशयामि=प्रकाश करता हूँन=नहीं है ॥

भावार्थ ।
पूर्व वाक्य करके जनकजी ने मोह की महिमा को
कहा—अब इस वाक्य करके गुरु की कृपा से जो उनको देह
और आत्मा का विवेक ज्ञान हुआ है, उसको सहित युक्ति
के कथन करते हैं—

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४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मैं एक ही सारे जगत् को प्रकाश करता हूँ और इस स्थूल देह का भी प्रकाशक हूँ ।

यह देह अनात्मा है यानी जड़ होने से अप्रकाश जगत् की तरह है ।

जड़ देह और चेतन आत्मा का आध्यासिक सम्बन्ध है, अर्थात् कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । सत्य और मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध न होने से इन दोनों का पारमार्थिक सम्बन्ध नहीं है । जैसे—शुक्ति और रजत का कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है, वैसे देह और आत्मा का भी कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । जैसे शुक्ति की सत्ता करके रजत् भी सत्यवत् भान होती है, वैसे आत्मा की सत्ता करके देह भी सत्यवत् भान होता है । वास्तव में देह मिथ्या है । इसी तरह आत्मा की सत्ता करके ही सारा जगत् सत्यवत् प्रतीत होता है । आत्मा से पृथक् जगत् मिथ्या है, यानी कभी हुआ नहीं है । इसी वार्त्ता को पञ्चदशीकार ने भी कहा है—

अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ २ ॥

अर्थात् “अस्ति” है “भाति” भान होता है “प्रियम्” प्यारा है, रूप और नाम ये पाँच अंश सारे जगत् में व्याप्त करके रहते हैं और इन पाँचों में से अस्ति, भाति, प्रिय ये तीनों अंश ब्रह्म के हैं, सो तीनों अंश सारे जगत् में प्रवेश होकर स्थित हैं । नाम और रूप ये दो अंश जड़ जगत् के हैं । यदि नाम और रूप को निकाल दिया जावे, तब जगत् की कोई वस्तु भी सत्य नहीं रह सकती है । नाम और रूप

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दूसरा प्रकरण । ४५

दोनों विनाशी हैं, क्योंकि एक हालत में नहीं रहते हैं, इसी से सारा जगत् मिथ्या सिद्ध होता है । यह जगत् परब्रह्म के अस्ति, भाति और प्रिय इन तीनों अंशों करके ही सत्यवत् प्रतीत होता है । यदि इन तीनों अंशों को हरएक पदार्थ से पृथक् कर दिया जाय, तब जगत् का कोई भी पदार्थ सत्यवत् भान नहीं हो सकता है । इसी से सिद्ध होता है कि जगत् तीनों कालों में मिथ्या है और ब्रह्म ही तीनों कालों में सत्य है । इस युक्ति-सहित अनुभव करके जनकजी कहते हैं कि जितना दृश्य जगत् है, वह मेरे में ही अध्यस्त अर्थात् कल्पित है, क्योंकि परमार्थ दृष्टि से कोई भी देहादिक मेरे में नहीं है । जैसे आकाश में नीलता; मरुस्थल में जल; बन्ध्या का पुत्र; शश के शृङ्ग; ये सब तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही जगत् भी वास्तव में तीनों कालों में नहीं है, और न कोई मेरे देहादिक है । मैं माया और उसके कार्य से परे एवं ज्ञान-स्वरूप हूँ ॥ २ ॥

मूलम् ।

सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽऽधुना ।
कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

सशरीरम्, अहो, विश्वम्, परित्यज्य, मया, अधुना, कुतश्चित्, कौशलात्, एव, परमात्मा, विलोक्यते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है कि
सशरीरम्=शरीर सहितपरित्यज्य=त्याग करके अर्थात् अपने से पृथक् समझ कर
विश्वम्=विश्व को
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४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

कुतश्चित् = कहीं मया = मुझ करके
कौशलात् = } कुशलता से अर्थात् उपदेश से अधुना = अब
परमात्मा = ईश्वर
एव = ही विलोक्यते = देखा जाता है

भावार्थ ।
जनकजी फिर भी कहते हैं कि जो लिंग शरीर और कारण-शरीर के सहित संपूर्ण विश्व-विचार करके, शास्त्र और आचार्य के उपदेश करके और चातुर्य करके आत्मा से पृथक्, अपनी सत्ता से शून्य आत्मा की सत्ता करके सत्यवत् भान होता था, उसको मैं अब मिथ्या जानकर अपने ज्ञान-स्वरूप आत्मा का अवलोकन कर रहा हूँ । क्योंकि आत्म-ज्ञान के अतिरिक्त और कोई भी आत्मा के अवलोकन का उपाय नहीं है ॥ ३ ॥

मूलम् ।
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः ।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥४॥

पदच्छेदः ।
तथा, न, तोयतः, भिन्नाः, फेनबुद्बुदाः, आत्मनः, न, तथा, भिन्नम्, विश्वम् आत्मविनिर्गतम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तथा= जैसेफेनबुद्बुदा= फेन और बुल्ला
तोयतः= जल सेभिन्नाः= भिन्न
तरङ्गाः= तरङ्गन= नहीं
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दूसरा प्रकरण ४७

तथा=वैसा ही | विश्वम्=विश्व
आत्मवि-निर्गतम् = आत्म-विष्ट | आत्मनः=आत्मा से
भिन्नम् न=भिन्न नहीं है ॥

भावार्थ ।
दृष्टांत—जैसे तरंग और फेन जल से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि जल ही उन सबका उपादान कारण है, वैसे ही यह विश्व आत्मा से उत्पन्न है अर्थात् इसका उपादान कारण आत्मा ही है। इस कारण ऐसा जो जगत् है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे तरंग बुद्बुदादि में जल अनुगत है—वैसे स्वच्छ चैतन्य भी सम्पूर्ण विश्व में अनुगत है। जैसे कल्पित सर्प अपने अधिष्ठानभूत रज्जु से भिन्न नहीं है, किन्तु रज्जु-रूप ही है—वैसे कल्पित जगत् भी अधिष्ठानभूत चेतन से भिन्न नहीं है ॥ ४ ॥

मूलम् ।
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः ।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
तन्तुमात्रः, भवेत्, एव, पटः, यद्वत्, विचारतः, आत्मतन्मात्रम्, एव, इदम्, तद्वत्, विश्वम्, विचारितम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यद्वत्=जैसेविचारतः=विचार से
पटः=कपड़ाइदम्=यह
तन्तुमात्रः=तंतुमात्रविश्वम्=संसार
एव=हीआत्मतन्मात्रम्=आत्मसत्तामात्र
भवेत्=होता हैएव=ही
तद्वत्=वैसे हीविचारितम्=प्रतीत होता है ॥