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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 47 of 405

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Page 47

४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यथा=जैसेभासते=भासता है
एव=निश्चय करकेतथा एव=वैसे ही
आदर्श- मध्यस्थेदर्पण के मध्य में स्थित हुएअस्मिन्= शरीरेइस शरीर में
रूपे=प्रतिबिम्ब मेंअन्तः परितः=भीतर और बाहर से
सः=वह शरीरपरमेश्वरः=परमेश्वर भासता है ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब जो शरीरादिक हैं, उनके अन्तर, मध्य और बाहर, चारों तरफ दर्पण व्याप्त हो करके वर्तता है अर्थात् वह प्रतिबिम्ब अध्यस्त है, अर्थात् दर्पण में देखने-मात्र का है, स्वरूप से सत्य नहीं है, वैसे ही अपने आत्मा में अध्यस्त जो शरीर है, उसके भीतर, बाहर, मध्य और सर्व ओर चेतन आत्मा ही व्याप्त करके स्थित है । हे राजन् ! कल्पित पदार्थ की अधिष्ठान से भिन्न अपनी सत्ता कुछ भी नहीं होती है, किन्तु अधिष्ठान की सत्ता करके वह सत्यवत् प्रतीत होता है—जैसे शुक्ति में रजत, और दर्पण में प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है, वैसे शरीरादिक भी आत्मा में उसी की सत्ता करके सत्य के सदृश प्रतीत होते हैं, वास्तव में ये भी सत्य नहीं हैं, किन्तु मिथ्या हैं ॥ १९ ॥

दर्पण के दृष्टांत से कदाचित् जनक को ऐसा भ्रम हो जावे कि जैसे दर्पण परिच्छिन्न है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न होगा, इस भ्रम के दूर करने के लिये ऋषिजी दूसरा दृष्टांत देते हैं ।