अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
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दूसरा प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः ।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः ॥१॥
पदच्छेदः ।
अहो निरञ्जनः, शान्तः, बोधः, अहम्, प्रकृतेः, परः, एतावन्तम्, अहम्, कालम्, मोहेन, एव, विडंबितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम्= | मैं | अहो= | आश्चर्य है कि |
| निरञ्जनः= | निर्दोष हूँ | अहम्= | मैं |
| शान्तः= | शान्त हूँ | एतावन्तम्= | इतने |
| बोधः= | बोध रूप हूँ | कालम्= | काल पर्यन्त |
| प्रकृते= | प्रकृति से | मोहेन= | अज्ञान करके |
| परः= | परे हूँ | एव= | निःसन्देह |
| विडंबितः= | ठगा गया हूँ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी के उपदेश से जनक जी को आत्मा का साक्षात्कार जब उदय हुआ, तब जनकजी अपने चेतन स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार करके अपने अनुभव को प्रकट करते हुए वाधितानुवृत्ति से पूर्व प्रतीत हुए मोह के स्मरण को बड़े आश्चर्य के साथ प्रकट करते हैं—
मैं निरंजन अर्थात् संपूर्ण उपाधियों से रहित एवं शान्त-स्वरूप होकर, अर्थात् संपूर्ण विकारों से रहित होकर, तथा प्रकृति अर्थात् माया-रूपी अंधकार से भी परे होकर, और