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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 97 of 405

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Page 97

९० | अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एतत्=यहकिम्=कैसे
दृश्यम्=दृश्यपश्यति=देख सकता है कि
स्वभावात्=स्वभाव से हीइदम्=यह
न किञ्चन=कुछ नहीं हैग्राह्यम्= ग्रहण करने योग्य है
+ इति=ऐसा
जानानः=जानने वाला हैच=और
+ यः=जोइदम्=यह
सः धीरधीः=वह ज्ञानीत्याज्यम्=त्यागने-योग्य है ॥

भावार्थ ।

यह जो दृश्यमान प्रपंच है, सो सब दृश्य होने से शुक्ति में रजत की तरह मिथ्या है। अर्थात् जैसे शुक्ति में रजत दृश्य भी है और मिथ्या भी है, वैसे यह प्रपंच भी दृश्य होने से मिथ्या है—इस अनुमान-प्रमाण करके यह जगत् मिथ्या सिद्ध होता है, ऐसा जिस विद्वान् ने निश्चय कर लिया है, वह धीर पुरुष ऐसा कब देखता है कि यह मेरे को ग्रहण करने-योग्य है, यह मेरे को त्यागने-योग्य है, किन्तु कदापि नहीं देखता है।

अब इस विषे हेतु को आगेवाला वाक्य करके कहते हैं ॥ १३ ॥

मूलम् ।

अन्तस्त्यक्त कषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयाऽऽगतो भोगो न दुःखाय च तुष्टये ॥ १४ ॥