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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

षष्ठेनशुद्ध्येतैकाहं पञ्चमेद्व्यहमेवतु ।

१४ लिखितस्मृतिः ॥

शावेनशुध्यतेसूतिर्नसूतिःशावशोधिनी ॥ ९० ॥
षष्ठेनशुद्ध्येतैकाहं पञ्चमेद्व्यहमेवतु ।
चतुर्थेसप्तरात्रंस्यात् त्रिपुरुषंदशमेऽहनि ॥ ९१ ॥
मरणारब्धमाशौचं संयोगोयस्यनाग्निभिः ।
आदाहात्तस्यविज्ञेयं यस्यवैतानिकोविधिः ॥ ९२ ॥
आमंमांसंघृतंक्षौद्रं स्नेहाश्चफलसंभवाः ।
अन्त्यभाण्डस्थिताह्येते निष्क्रान्ताःशुचयःस्मृताः ॥९३॥
मार्जनौरजसासक्तं स्नानवस्त्रघटोदकम् ।
नवाम्भसितथाचैव हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् ॥ ९४ ॥
दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ।
धात्रीफलेषुसर्व्वत्र अलक्ष्मीर्वसतेसदा ॥ ९५ ॥
यत्रयत्रचसंकीर्णमात्मानंमन्यतेद्विजः ।
तत्रतत्रतिलैर्होमं गायत्र्यष्टशतंजपेत् ॥ ९६ ॥
इतिश्रीमहर्षिलिखितप्रोक्तं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥


मरण सूतक में जन्म सूतक हो जाय तो मरण सूतक के शेष दिनों में ही जन्म सूतक की शुद्धि होजाती है और जन्म सूतक के दिनों से मरण सूतक निवृत्त नहीं होता अर्थात् जन्म सूतक छोटा और मरण सूतक बड़ा है ॥ ९० ॥
छठी पीढ़ी वालों को एक दिन का, पांचवीं में दो दिन का, चौथी में सात दिन का और तीसरी में दश दिन का सूतक लगता है ॥९१॥ जो अग्निहोत्री न हो उसे मरण के समय से और जो वेदोक्त अग्निहोत्र करता है उस को दाह के समय से सूतक लगता है ॥९२॥ कच्चा मांस, घृत, शहद, फलों से निकले तैल, अन्य किसी नीच के पात्र में रक्खे हुए ये सब पात्र से निकाल लेने पर शुद्ध हैं ॥९३॥
स्नान का शुद्ध वस्त्र, घड़े का जल, और नया जल, इन में यदि मार्जनी (बुहारी) की धूल लग जाय तो उस दिनमें किये पुण्य को नष्ट करता है ॥९४॥
दिन में कैथ की छाया में रात्रि में दही, तथा छोंकर में, आंवले के फल में, दिन रात दोनों समय अलक्ष्मी (दरिद्रता) बसती है ॥९५॥ जिस २ निकृष्ट कर्म के करने में ब्राह्मण अपने को लज्जा, शंका, संकोच, हुआ माने वहां २ तिलों से होम करे और आठ सौ गायत्री जपै ॥ ९६ ॥
यह महर्षिलिखितके कहे धर्मशास्त्र का पं० भीमसेनशर्मकृत भाषानुबाद पूराहुआ ॥

अथ दक्षस्मृतिप्रारंभः ॥


सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदांवरः ।
पारगःसर्वविद्यानां दक्षो नामप्रजापतिः ॥ १ ॥
उत्पत्तिःप्रलयश्चैव स्थितिःसंहारएवच ।
आत्माचात्मनितिष्ठेत आत्माब्रह्मण्यवस्थितः ॥ २ ॥
ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थोयतिस्तथा ।
एतेषांतुहितार्थाय धर्मशास्त्रमकल्पयत् ॥ ३ ॥
जातमात्रःशिशुस्तावद्यावदष्टौसमावयः ।
सहिगर्भसमोज्ञेयो व्यक्तिमात्रप्रदर्शितः ॥ ४ ॥
भक्ष्याभक्ष्येत्तथापेये वाच्यावाच्येतथाऽनृते ।
अस्मिन्बालेनदोषःस्यात्सयावन्नोपनीयते ॥ ५ ॥
उपनीतेतुदोषोऽस्ति क्रियमाणैर्विगर्हितैः ।


श्रीः शुभम् । संपूर्ण शास्त्रों को यथार्थ जानने वाले, सब वेद वेत्ताओं में श्रेष्ठ और सब विद्याओं के पार पहुंचे हुए दक्ष नामक प्रजापति हुए हैं ॥१॥

उत्पत्ति, प्रलय ( मरना ) स्थिति, संहार ( पांच महाभूतों का प्रलय ) इनके करने में समर्थ जिन दक्ष के आत्मा (देह) में साक्षात् परमात्मा ठहरे थे और जिनका आत्मा धर्म में स्थित था ॥२॥ उन दक्ष प्रजापति जी ने, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, इन चारों आश्रमों के हितार्थ धर्मशास्त्र को रचा है ॥३॥

जब तक आठ वर्ष की अवस्था हो तब तक बालक पैदा हुये के समान है क्योंकि उसे गर्भ तुल्य ही जाने उस का एक आकार मात्र ही दीखता है ॥४॥ भक्ष्य अभक्ष्य, पीने न पीने योग्य, कहने न कहने योग्य, सत्य और झूठ में इस बालक को जनेऊ होने से पहिले दोष नहीं लगता है ॥५॥ जनेऊ हुए पीछे जो निन्दित काम करे तो उस को दोष लगते हैं । और सोलह वर्ष की

२
दक्षस्मृतिः ॥

अप्राप्तव्यवहारोऽसौ बालःषोडशवार्षिकः ॥ ६ ॥
स्वीकरोतियदावेदं चरेद्वेदव्रतानिच ।
ब्रह्मचारीभवेत्तावदूर्ध्वंस्नातोभवेद्गृही ॥ ७ ॥
द्विविधोब्रह्मचारीस्यादाद्योह्युपकुर्वाणकः ।
द्वितीयोनैष्ठिकश्चैव तस्मिन्नेवव्रतेस्थितः ॥ ८ ॥
त्रयाणामानुलोम्येन प्रातिलोम्येनवापुनः ।
प्रतिलोमंव्रतंतस्य सभवेत्पापकृत्तमः ॥ ६ ॥
योगृहाश्रममास्थाय ब्रह्मचारीभवेत्पुनः ।
नयतिर्नवनस्थश्च ससर्वाश्रमवर्जितः ॥ १० ॥
अनाश्रमीनतिष्ठेत क्षणमेकमपिद्विजः ।
आश्रमेणविनातिष्ठन् प्रायश्चित्तीयतेहिसः ॥ ११ ॥
जपेहोमेतथादाने स्वाध्यायेचरतःसदा ।
नासौफलमवाप्नोति कुर्वाणोप्याऽऽश्रमाच्च्युतः ॥१२॥
मेखलाजिनदण्डैश्च ब्रह्मचारीतिलक्ष्यते


आयु तक यह बालक संसारी व्यवहारों के लायक नहीं होता ॥ ६ ॥ जब यह बालक वेद का प्रारंभ करै तब वेदोक्त ब्रह्मचर्याश्रम के नियम व्रतों को भी करै और ब्रह्मचारी रहे फिर समावर्त्तन स्नान करके गृहस्थ बने ॥ ७ ॥ दो प्रकार का ब्रह्मचारी होता है एक उपकुर्वाणक, दूसरा नैष्ठिक जो जन्म भर ब्रह्मचारी ही रहे जप तप वेदाध्ययनादि करता रहे ॥ ८ ॥ ब्रह्मचारी से गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यास ऐसे क्रम से तीनों आश्रमों में प्रवेश करना उत्तम है । यदि कोई गृहस्थ से ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थ होकर गृहस्थ बने तो वह बड़ा पापी है ॥९॥
जो गृहस्थ होकर फिर ब्रह्मचारी बने और संन्यासी अथवा वानप्रस्थ न बने वह सब आश्रमों से रहित है ॥ १० ॥ ब्राह्मणादि द्विज एक क्षण भर भी आश्रम से हीन न रहे क्योंकि आश्रम के बिना रहता हुआ द्विज प्रायश्चित्तके योग्य हो जाता है ॥११॥ आश्रम के बिना जप, होम, दान, और वेद के पाठ में तत्पर ब्राह्मणादि द्विज कर्म को करता हुआ भी फल को प्राप्त नहीं होता ॥ १२ ॥ मेखला मृगचर्म, दंड, इन चिन्हों से ब्रह्मचारी, बांस की छड़ी और

'भाषार्थसहिता ॥

गृहस्थोयष्टिवेदायैर्नखलोमैर्वनाश्रमी ॥ १३ ॥
त्रिदण्डेनयतिश्चैवं लक्षणानिपृथक्पृथक् ।
यस्यैतल्लक्षणंनास्ति प्रायश्चित्तीनचाऽऽश्रमी ॥१४॥
उक्तंकर्मक्रमेणैव यःकालऋषिभिः स्मृतः ।
द्विजानांचहितार्थाय दक्षस्तुस्वयमब्रवीत् ॥ १५ ॥
इति दाक्षे धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥
प्रातरुत्थायकत्र्तव्यं यद्विजेनदिनेदिने ।
तत्सर्वंसंप्रवक्ष्यामि द्विजानामुपकारकम् ॥ १ ॥
उदयास्तमितंयावन्नविप्रःक्षणिकोभवेत् ।
नित्यनैमित्तिकैयुक्तः काम्यैश्चान्यैरगर्हितैः ॥ २ ॥
संध्याद्यंवैश्वदेवान्तं स्वकंकर्मसमाचरेत् ।
स्वकंकर्मपरित्यज्य यदन्यत्कुरुतेद्विजः ।
अज्ञानादथवालोभात् सतेनपतितोभवेत् ॥ ३ ॥
दिवसस्याद्यभागेतु कृत्यंतस्योपदिश्यते ।


वेद पुस्तकादि के धारण करने से गृहस्थ नख तथा केश लोमों के धारण से वानप्रस्थ जाना जाता है ॥१३॥ और त्रिदण्ड के धारण से संन्यासी ये चारों आश्रमों के पृथक् २ लक्षण हैं। जिस के शरीर के साथ ये लक्षण नहीं हैं वह प्रायश्चित्त के योग्य है ॥ १४ ॥ ऋषियों ने कर्मों के क्रम से जो २ समय जिस २ काम के लिये कहा है ब्राह्मणादि द्विजों के हित के अर्थ दक्ष प्रजापति स्वयं उस क्रम को कहते हैं ॥ १५ ॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

प्रातःकाल से उठकर जो २ धर्म युक्त काम द्विजों को प्रतिदिन करने चाहिये उन द्विजों के उपकारी सब कामों को हम कहते हैं ॥ १ ॥ सूर्य के उदय से लेकर अस्त होने पर्यन्त ब्राह्मण एक क्षण भर भी व्यर्थ न गमावे किंतु नित्य ( संध्या आदि ) नैमित्तिक ( जात कर्मादि ) काम्य कर्म ( यज्ञादि ) सत् शास्त्राभ्यासादि इन में युक्त ( लगा ) रहे ॥२॥ संध्योपासन से लेके वैश्वदेव पर्यन्त जो अपना नित्य कर्म है उसे करै, क्योंकि अपने कर्मको छोड़ कर जो ब्राह्मण अज्ञान से अथवा लोभ से अन्य वर्ण का कर्म करता है वह उस कर्म के करने से पतित हो जाता है ॥ ३ ॥ उस ब्राह्मण को दिन के

३