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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

द्वितीयेचतृतीयेच चतुर्थेपञ्चमेतथा ॥ ४ ॥

४ दक्षस्मृतिः ॥

द्वितीयेचतृतीयेच चतुर्थेपञ्चमेतथा ॥ ४ ॥
षष्ठेचसप्तमेचैव त्वष्टमेचपृथक्पृथक् ।
विभागेष्वेषुयत्कर्म तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ५ ॥
उषःकालेचसम्प्राप्ते शौचंकृत्वायथार्थवत् ।
ततःस्नानंप्रकुर्वीत दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ६ ॥
अत्यन्तमलिनःकायो नवछिद्रसमन्वितः ।
स्रवत्येवदिवारात्रौ प्रातःस्नानंविशोधनम् ॥ ७ ॥
क्लिद्यन्तिहिप्रसुप्तस्य चेन्द्रियाणिस्रवन्तिच ।
अङ्गानिसमतांयान्ति उत्तमान्यधमानिच ॥ ८ ॥
नानास्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितःपुमान् ।
अस्नात्वा नाचरेत्किञ्चिज्जपहोमादिकंद्विजः ॥ ९ ॥
प्रातरुत्थाययोविप्रः सन्ध्यास्नायीभवेत्सदा ।
सप्तजन्मकृतंपापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥ १० ॥
उषस्युपासित्स्नानं सन्ध्यायामुदितेरवौ ।


प्रथम, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें और आठवें, इन भागों में पृथक् २ जो २ कर्म धर्म शास्त्रों के अनुसार उपदेश किये गये हैं उन सब को क्रम से हम कहेंगे ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रातः सूर्योदय से चार घड़ी पहिले जाग कर शास्त्र में कहे अनुसार मल मूत्र त्यागादि रूप यथावत् शौच करके दंत धावन पूर्वक स्नान करे ॥ ६ ॥ यह देह मलिनता निकलने के नौ दरवाजों से युक्त होने के कारण अत्यन्त मलिन है, रात दिन शरीर से मलिनता निकलती है, प्रातःकाल का स्नान इस का शोधन करने वाला है ॥ ७ ॥ सोते हुये मनुष्य के इन्द्रिय मलिनता से गीले हो जाते और लार आदि टपक ने लगती है । उत्तम, अधम, सब अंग शिथिल होजाते हैं ॥ ८ ॥ सोकर उठा मनुष्य अनेक प्रकार के पसीनादि से युक्त हो जाता है । इस लिये स्नान किये बिना ब्राह्मण किंचित भी जप होमादि कर्म न करे ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण प्रातःकाल ही उठकर नित्यनियम से सन्ध्या स्नान निरन्तर किया करे वह सात जन्म तक में किये पाप को तीन वर्षों में नष्ट कर देता है ॥ १० ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल बादल पीले होते ही और सायंकाल में सूर्य के अस्त होने

भाषार्थसहिता ॥ ५

प्राजापत्येनतत्तुल्यं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११ ॥
प्रातःस्नानंप्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरंहितत् ।
सर्वमर्हतिशुद्धात्मा प्रातःस्नायीजपादिकम् ॥ १२ ॥
गुणादशस्नानपरस्यसाधो रूपंचशौचंचबलंचतेजः ।
आरोग्यमायुश्चमलोलुपत्वं दुःस्वप्नघातश्चतपश्चमेधाः॥१३॥
मनःप्रसादजननं रूपसौभाग्यवर्धनम् ।
दुःखशोकापहंस्नानं मानदंज्ञानदंतथा ॥ १४ ॥
आग्नेयंभस्मनास्नानमवगाह्यचवारुणम् ।
आपोहिष्ठेतिचब्राह्मं वायव्यंगोरजःस्मृतम् ॥ १५ ॥
यत्तसातपवर्षंतु तत्स्नानंदिव्यमुच्यते ।
पञ्चस्नानानिपुण्यानि मनुःस्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥
आपस्नानंव्रतस्नानं मन्त्रस्नानंतथैवच ।

से पहिले जो स्नान करता है वह स्नान प्राजापत्य व्रत के तुल्य सब पापोंका नाशक है ॥ ११ ॥ प्रत्यक्ष परोक्ष फल देने वाला जो प्रातःकाल का स्नान उस की सब विद्वान् लोग प्रशंसा करते हैं । प्रातःकाल स्नान करने वाला मनुष्य देह की पवित्रता से संपूर्ण जप आदि कर्म करने योग्य होता है ॥१२ ॥ स्नान में तत्पर कुटिलतारहित साधु मनुष्य में ये दश उत्तम गुण होते हैं कि रूप, शुद्धि, बल, तेज, नीरोगता, अवस्था, लालचछूटना, मन की शुद्धि से बुरे स्वप्नों का न होना, तप, और तीक्ष्ण बुद्धि होना ॥ १३ ॥ मन को प्रसन्न करने, रूप तथा सौभाग्य को बढ़ाने, दुःख तथा शोक का नाश करने, मान और ज्ञान का देने वाला, प्रातःकाल का स्नान है ॥ १४ ॥ भस्म से स्नान करना आग्नेय स्नान, जलाशय में अवगाहन करके स्नान करना वारुण, (आपोहिष्ठा०) इत्यादि मन्त्रों को पढ़ २ के स्नान करना ब्राह्म, और गौओं के खुरों से उडी धूलि को शरीर पर लेना, वायव्य, स्नान कहाता है ॥१५॥ घाम होने पर वर्षा भी हो उस में स्नान करना, दिव्य स्नान है । स्वायंभुव मनुने ये पांच स्नान पुण्य करने वाले कहे हैं ॥ १६ ॥ आप (जल से) स्नान, व्रत स्नान, (व्रतों के द्वारा मन वाणी शरीरों की शुद्धि) और मन्त्र स्नान, (मन्त्रों के जपादि द्वारा शुद्धि) इन तीन स्नानों में जल स्नान गृहस्थ के लिये, व्रत

६दक्षस्मृतिः ॥

आपस्नानंगृहस्थस्य व्रतमन्त्रैतपस्विनाम् ॥ १७ ॥
कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्यच ।
प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् ॥ १८ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमो भोजनंबलिकंतथा ।
साङ्गुष्ठंतुसदाकार्यमापतेत्तदधोऽन्यथा ॥ १९ ॥
स्नानादनन्तरंतावदुपस्पर्शनमुच्यते ।
अनेनतुविधानेन स्वाचान्तःशुचितामियात् ॥ २० ॥
उदकएवोदकस्थश्चेत्स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ।
पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः ॥ २१ ॥
प्रक्षाल्यहस्तौपादौच त्रिःपिबेदम्बुवीक्षितम् ।
संहताङ्गुष्ठमूलेन द्विःप्रमृज्यात्ततोमुखम् ॥ २२ ॥
संहत्यतिसृभिःपूर्वमास्यमेवमुपस्पृशेत् ।
अङ्गुष्ठेनप्रदेशिन्या घ्राणंपश्चादुपस्पृशेत् ॥ २३ ॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुःश्रोत्रेपुनःपुनः ।


स्नान, मन्त्रस्नान, तपस्वियों के लिये हैं ॥ १७ ॥ कनिष्ठा, प्रदेशिनी, अंगुष्ठ, इन के मूल में और सब अंगुलियों के अग्रभाग में क्रम से प्रजापति, पितर, ब्रह्म और देवों के तीर्थ माने जाते हैं। इस लिये कनिष्ठा अंगुली के मूल से प्रजापतिको, प्रदेशिनी के मूलसे पितरोंको, अंगुष्ठके मूलसे ब्रह्माको, और हाथ के अग्रभागसे देवोंकेलिये जलदान करे ॥१८॥ दानदेना, दानलेना, भोजन करना, बलि धरना, होम करना, इन कामोंको अंगुष्ठ सहित सब अंगुलियोंसे करे,। अन्यथा करने से अधोगति में पड़ेगा ॥ १९ ॥ स्नानके अनन्तर आचमन करने का विधान कहते हैं ठीक इस के आगे कहे विधान से आचमन करने पर मनुष्य सम्यक् शुद्ध हो जाता है ॥२०॥ जलाशय के भीतर वा स्थल में जहां बैठ कर आचमन करे वहां पग जमाकर आचमन करे, तो बाहर भीतरसे शुद्ध होजाता है।२१। हाथ और पगों को धो कर अंगुलियों से मिलाये हुये अंगुष्ठ के मूल भाग से जल को देख २ कर तीनवार पीवे, फिर अंगुलियों के अग्रभाग में जल लगा २ कर दोवार मुखको शुद्ध करे ॥२२॥ फिर अनामिका, मध्यमा, प्रदेशिनी, इनतीन अंगुलियों से मुखका, अंगुष्ठ और प्रदेशिनी से नासिका के दोनों छिद्रों का,

भाषार्थसंहिता ॥ ७

नाभिंकनिष्ठाङ्गुष्ठाभ्यां हृदयं तु तलेन वै ॥ २४ ॥
सर्वाभिश्चशिरः पश्चाद्बाहूचाग्रेणसंस्पृशेत् ।
सन्ध्यायांचप्रभातेच मध्यान्हेचततःपुनः ॥ २५ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
वैश्यःप्राशितमात्राभिर्जिह्वागाभिःस्त्रियोऽङ्घ्रिजाः ॥२६॥
योनसन्ध्यामुपासीत ब्राह्मणोहिविशेषतः ।
सजीवन्नेवशूद्रःस्यान्मृतःश्वाचैवजायते ॥ २७ ॥
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हःसर्वकर्मसु ।
यदन्यत्कुरुतेकर्म नतस्यफलभाग्भवेत् ॥ २८ ॥
सन्ध्याकर्मावसानेतु स्वयंहोमोविधीयते ।
स्वयंहोमेफलंयत्तु तदन्येननजायते ॥ २९ ॥
ऋत्विक्पुत्रोगुरुर्भ्राता भागिनेयोऽथविट्पतिः ।
एभिरेवहुतंयत्तु तद्हुतंस्वयमेवतु ॥ ३० ॥


अंगूठा और अनामिका से बारम्बार नेत्र और कानों का, पहिले दहिने नेत्र दहिने कान का पश्चात् वाम का, स्पर्श करे, और अंगूठा और कनिष्ठका से नाभिका, और हाथके तलसे हृदय का स्पर्श करै ॥ २३ । २४ ॥ सब अंगुलियों से शिरका, हाथ के अग्रभाग से दोनों भुजाओं का स्पर्श करे । सायं सन्ध्या के समय, प्रातःकाल और मध्यान्ह में पूर्वोक्त प्रकार से आचमन तथा इन्द्रियस्पर्श करै ॥२५॥ हृदय तक पहुंचने वाले जल के आचमन से ब्राह्मण, कंठ तक पहुंचने वाले से क्षत्रिय, प्राशित ( जो मुख में ही रहै ) मात्र जल से वैश्य, और जिह्वा का स्पर्श जिस से हो, उस जल के आचमन से स्त्री और शूद्र-पवित्र होते हैं ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण विशेष कर संध्योपासन नहीं करता वह जीता ही शूद्र है और मरकर कुत्ता की योनि में जन्म लेता है ॥२७॥ संध्याहीन मनुष्य नित्य अशुद्ध तथा सब कर्मों के अयोग्य है और वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उस के फलका भी भागी नहीं होता है ॥ २८ ॥ संध्यः के पीछे स्वयं होम करना कहा है, क्योंकि जो फल स्वयं होम करने का है, वह अन्य से कराने पर नहीं होता ॥ २९ ॥ ऋत्वज, अध्वर्यु, अपना पुत्र, गुरु, भाई; भानजा, और जामाता इन प्रतिनिधियों द्वारा जो होम कराया गया हो, वह स्वयं किये के तुल्य ही है ॥ ३०॥

८ | दक्षस्मृतिः ॥

देवकार्यंततःकृत्वा गुरुमङ्गलवीक्षणम् ।
देवकार्यस्यसर्वस्य पूर्वाह्नस्तुविधीयते ॥३१॥
देवकार्याणिपूर्वाह्ने मनुष्याणांतुमध्यमे ।
पितॄणामपराह्णेतु कार्याण्येतानियततः ॥३२॥
पौर्वाह्निकंतुयत्कर्म तद्यदासायमाचरेत् ।
नतस्यफलमाप्नोति बन्ध्यास्त्रीमैथुनंयथा ॥३३॥
दिवसस्याद्यभागेतु सर्वमेतद्विधीयते ।
द्वितीयेचैवभागेतु वेदाभ्यासोविधीयते ॥३४॥
वेदाभ्यासोहिविप्राणां परमंतपउच्यते ।
ब्रह्मयज्ञःसविज्ञेयः षडङ्गसहितस्तुयः ॥३५॥
वेदस्वीकरणंपूर्वं विचारोऽभ्यसनंजपः ।
प्रदानंचैवशिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहिपञ्चधा ॥३६॥
समित्पुष्पकुशादीनां सकालःपरिकीर्त्तितः ।
तृतीयेचैवभागेतु पोष्यवर्गान्नसाधनम् ॥३७॥


फिरदेव कार्य करके गुरु और मंगल वस्तु (गौआदि) का दर्शन करे, सब देव कार्य मध्यान्ह से पूर्व ही समय में करना कहा है ॥३१॥ देव कार्य पूर्वाह्न में, मनुष्यों के अतिथि यज्ञादि कार्य मध्य दिन में, पितरों के कार्य मध्यान्ह के पीछे तीसरे पहर में यत्न से करे ॥३२॥ पूर्वाह्न में कर्तव्य कर्म को सायंकाल में जो मनुष्य आलस्यादि से करे, वह उस के फल को इस प्रकार प्राप्त नहीं होता कि जैसे बंध्या स्त्री मैथुन से गर्भ धारण फल को नहीं पाती ॥ ३३ ॥ दिन के पहिले भाग में यह पूर्वोक्त सब कर्त्तव्य कहा और दिन के दूसरेभाग में नियम से वेद का अभ्यास करे ॥ ३४ ॥ नियम से वेद का अभ्यास करना ब्राह्मणों का परम तप कहा है, यदि वेद के छः अंगों ( व्याकरण आदि ) सहित वह वेदाभ्यास किया जाय, तो वही ब्रह्मयज्ञ जानो ॥ ३५ ॥ वेद का अभ्यास पांच प्रकार का है । १-वेद का स्वीकार (गुरुमुख से वेद पढ़ना) २-वेदार्थ का विचार, ३-वेद को बार २ घोषण करना रूप अभ्यास, ४-जप और ५-शिष्यों को पढ़ाना ॥ ३६ ॥ ढांककी समिधा, फूल, कुशा, इन को जहां तहां से लाकर संग्रह भी दिन के द्वितीय भाग में करे । पोष्यवर्ग (पालन के योग्य माता आदि ) के लिये अन्न का प्रबन्ध दिन के तीसरे भाग में करें ॥ ३७ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ९

मातापितागुरुर्भार्या प्रजादीनःसमाश्रितः ।
अभ्यागतोऽतिथिश्वाग्निः पोष्यवर्गउदाहृतः ॥३८॥
ज्ञातिर्बन्धुजनःक्षीणस्तथाऽनाथःसमाश्रितः ।
अन्योऽपिधनयुक्तस्य पोष्यवर्गउदाहृतः ॥३९॥
सार्वभौतिकमन्नाद्यं कर्तव्यंगृहमेधिना ।
ज्ञानविद्भ्यःप्रदातव्यमन्यथानरकंव्रजेत् ॥४०॥
भरणंपोष्यवर्गस्य प्रशस्तंस्वर्गसाधनम् ।
नरकःपीडनेचास्य तस्माद्यत्नेनतंभरेत् ॥४१॥
सजीवतीयएवैको बहुभिश्चोपजीव्यते ।
जीवन्तोऽपिमृतास्त्वन्ये पुरुषाःसोदरम्भराः ॥४२॥*
बह्वर्थंजीव्यतेकिश्चित्कुटुम्बार्थंतथाऽपरैः ।
आत्माऽर्थेन्योनशक्नोति स्वोदरेणापिदुःखितः ॥४३॥
दीनानाथविशिष्टेभ्यो दातव्यंभूतिमिच्छता ।


माता, पिता, गुरु, स्त्री, संतान, दीन, अनाथ, समाश्रित (दास) अभ्यागत, अतिथि और अग्नि यह सब पोष्य वर्ग कहाता है ॥ ३८ ॥ अपने कुल के वा सम्बन्धियों में जो धन हीन दरिद्र वा क्षीण (असमर्थ) अनाथ और समाश्रित शरणागत, ये अन्य भी धनी पुरुष के लिये पोष्य वर्ग कहा है। अर्थात् ३८ श्लोक का पोष्य वर्ग सर्वसाधारण गृहस्यों के लिये है और धनी के लिये ३८। ३९। दोनों में कहा पोष्य वर्ग जानो ॥ ३९ ॥ गृहस्थ को चाहिये कि सब प्राणियों की तृप्ति के लिये भक्ष्य अन्न आदि विशेष कर बनावे और ज्ञानियों को देवे, अन्यथा जो करै वह नरक में जाता है ॥४०॥ पोष्य वर्गका पालन करना स्वर्ग का उत्तम साधन है और पोष्य वर्ग को दुःख पहुंचाने से नरक होता है, इस से पोष्य वर्ग का बड़े यत्न से पालन करै ॥ ४१ ॥ जिस एक पुरुष के सहारे से बहुतों का जीवन हो, वह एक जानो वास्तव में जीवित है और अन्य अपना ही पेट भरने वाले पुरुष जीते हुए भी मृतक (मुर्दा ही) हैं ॥ ४२ ॥ कोई लोग बहुतों के लिये जीविका करते तथा कोई कुटुम्ब के पालनार्थ करते हैं और कोई अपने पेट को हीं भरने में दुःखी रहते, अपने निर्वाह के लिये भी समर्थ नहीं होते ॥४३॥ यदि अपनी वृद्धि चाहे, तो दीन

१०
दक्षस्मृतिः ॥

अदत्तदानाजायन्ते परभाग्योपजीविनः ॥४४॥
यदद्दासि विशिष्टेभ्यो यज्जुहोषि दिनेदिने ।
यत्तद्वित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षसि ॥४५॥
चतुर्थेऽह्नस्तथाभागे स्नानार्थंमृदमाहरेत् ।
तिलपुष्पकुशादीनि स्नायाच्चाकृत्रिमेजले ॥४६॥
मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकान्मूषकस्थलात् ।
अन्तर्जलाच्चमार्गान्ताद् वृक्षमूलात्सुरलयात् ॥४७॥
परशौचावशिष्टाच श्रेयस्कामैः सदाबुधैः ।
शुचिदेशात्तुसंग्राह्या मृत्तिकास्नानहेतवे ॥४८॥
अश्वक्रान्तेरथक्रान्ते विष्णुकान्तेवसुन्धरे ! ।
मृत्तिके ! हरमेपापं यन्मयापूर्वसञ्चितम् ॥४९॥
उद्धृतासिवराहेण कृष्णेनशतबाहुना ।

अनाथार्थ, और सज्जन विद्वानों को देवे क्योंकि जिन्हों ने दान नहीं दिया वे पराये भाग्य से जीने वाले पराधीनता के लिये ही पैदा होते हैं ॥ ४४ ॥ जो सज्जनों, विद्वानों, धर्मात्माओं को देता है और जो प्रतिदिन होम करता है उसी को हम तेरा धन मानते हैं, शेष धन तो किसी अन्य का है, जिस की तू रक्षा करता है ॥ ४५ ॥ दिन के चौथे भाग में स्नान के लिये मट्टी लावे तथा तिल, फूल, कुश आदि लावे और ऐसे जल में स्नान करै जो कृत्रिम (बनाये कूप आदि का ) न हो किन्तु स्वयं बहती नदी आदि में स्नान करे ॥ ४६ ॥ कीड़ों के बिलों से, मूषों के घरों से, जल के भीतर से, मार्ग के बीच से, वृक्ष की जड़ से, देव मन्दिर से, और अन्य के हाथ मांजने से बची इन सात स्थानों से अपना कल्याण चाहने वाले विचार शील पुरुष स्नानादि के लिये सदा ही मट्टी न लेवें । किन्तु स्नान के लिये किसी शुद्ध स्थान से मट्टी लेनी चाहिये ॥ ४७ । ४८ ॥ घोड़ा वा रथ जिस पर चलते, विष्णु भगवान् ने अवतार ले २ कर जिसपर आक्रमण-पराक्रम किये दिखाये ऐसी हे पृथिवी ! हे मृत्तिके ! मेरे जो पूर्व संचित पाप हैं, उन को दूर करो ॥४९॥ हे मृत्तिके ! कृष्ण वाराह अवतार धारी शत बाहू भगवान् ने तुम्हारा उद्धार किया है । हे मृत्तिके ! मैं प्रजा और धन के निमित्त तुम को ग्रहण करता हूं । इस

भाषासंहिता ॥ ११

मृत्तिकेप्रतिगृह्णामि प्रजयाचधनेनच ॥५०॥
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं त्रिविधंस्नानमुच्यते ।
तेषांमध्येतयन्नित्यं तत्पुनर्भिद्यतेत्रिधा ॥५१॥
मलापकर्षणंपूर्वं मन्त्रवत्तुजलेस्मृतम् ।
सन्ध्ययोरुभयोःस्नानं स्नानभेदाःप्रकीर्तिताः॥५२॥
मार्जनंजलमध्येतु प्राणायामोयतस्ततः ।
उपस्थानंततःपश्चाद् गायत्रीजपउच्यते ॥ ५३ ॥
सवितादेवतायस्या मुखमग्निरुदाहृतः ।
विश्वामित्रऋषिश्चन्दो गायत्रीसाविशिष्यते ॥ ५४ ॥
अङ्गारकदिनेप्राप्ते कृष्णपक्षेचतुर्दशी ।
यमुनायांविशेषेण नियतोनियताशनः ॥ ५५ ॥
यमायधर्मराजाय मृत्यवेचान्तकायच ।
वैंवस्वतायकालाय सर्वभूतक्षयायच ॥ ५६ ॥
औदुम्बरायदध्नाय नीलायपरमेष्ठिने ॥
वृकोदरायचित्राय चित्रगुप्तायवापुनः ॥ ५७ ॥
एकैकस्यतिलैर्मिश्रान् दद्यात्रीनष्टवाञ्जलीन् ।


प्रकार इन दो मन्त्रों को पढ़ के स्नान के लिये हाथ में मृत्तिका लेवे ॥५०॥
नित्य, नैमित्तिक, काम्य, तीन प्रकार का स्नान कहा है । इन तीनों में जो
नित्य स्नान है, वहभी तीन प्रकार का होता है ॥ ५१ ॥ मलापकर्षाद्येस्नान,
मंत्रों सहित जलाशय में स्नान, और दोनों संध्याओं के समय शुद्ध्यर्थ स्ना-
न करना, ये तीनभेद नित्य स्नानके कहे हैं ॥५२॥ जलके बीच मार्जन, फिर जल
में, अथवा बाहर प्राणायाम करे. फिर सूर्यनारायण का उपस्थान करके पश्चात्
गायत्री का जप करना कहा है ॥ ५३ ॥ सविता, जिस का देवता, अग्नि जिस
का मुख, विश्वामित्र, जिस के ऋषि, जो त्रिपाद् गायत्री छंद है, वह (तत्सवि-
तुर्व०) गायत्री सर्वोत्तम है ॥ ५४ ॥ जब कभी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मंग-
लवार आजाय, उसी दिन थोड़ा नियत भोजन करने वाला सावधान जिते-
न्द्रिय हुआ पुरुष अपसव्य हो कर विशेष कर यमुना नदी पर जाके (ओंय-

१२ दक्षस्मृतिः ॥

यावज्जीवकृतंपापं तत्क्षणादेवनश्यति ॥ ५८ ॥
पञ्चमेतुतथाभागे संविभागोयथार्थतः ।
पितृदेवमनुष्याणां कीटानांचोपदिश्यते ॥ ५९ ॥
देवैश्चैवमनुष्यैश्च तिर्यग्भिश्चोपजीव्यते ।
गृहस्थःप्रत्यहंयस्मात्तस्माच्छ्रेष्ठाश्रमो गृही ॥ ६० ॥
त्रयाणामाश्रमाणांतु गृहस्थोयोनिरुच्यते ।
सीदमानेनतेनैव सीदन्तीहेतरेत्रयः ॥ ६१ ॥
मूलत्राणेभवेत्स्कन्धः स्कन्धाच्छाखेतिपल्लवाः ।
मूलेनैवविनष्टेन सर्वमेतद्विनश्यति ॥ ६२ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयोगृहाश्रमी ।
राज्ञाचान्यैस्त्रिभिःपूज्यो माननीयश्चसर्वदा ॥ ६३ ॥
गृहस्थोऽपिक्रियायुक्तो गृहेणनगृहीभवेत् ।


माय नमः । धर्मराजायनमः) इत्यादि मन्त्रों द्वारा चौदह यमों को प्रत्येक को तिलांमश्र जलकी तीन २ वा आठ २ अञ्जलि देवे, तो जन्मभर में किया सब पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है ॥५५ । ५६ । ५७ । ५८ ॥ दिनके पांचवें भाग में यथा योग्य पितर, देव, मनुष्य, और कीड़े इनको महायज्ञ सम्बन्धी कर्म-द्वारा संविभाग (देना) कहा है ॥ ५९ ॥ देवता, मनुष्य, तिर्यग्योनि, ये सब जिस कारण आच्छादादि गृहस्थ से ही जीते हैं, तिस से गृहस्थ श्रेष्ठ हैं ॥६०॥ तीनों आश्रमों का योनि (कारण) गृहस्थ कहा है । (गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ कर ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, होते हैं इससे गृहस्थ सब आश्रमों का मूल कारण है) उस के जगत् में दुःखी रहने से अन्य तीनों आश्रम दुःखी हो जाते हैं ॥ ६१ ॥ जड़ की रक्षा करने से स्कन्ध (गुद्दे) और गुद्दोंसे डाली और डालियों से पत्ते हो जाते हैं और मूल (जड़) का नाश होनेसे ये सब नष्ट हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ तिस से सम्पूर्ण यत्नसे गृहस्थ आश्रम की रक्षा, पूजा आदर (सत्कार) और मान प्रतिष्ठा राजा और तीनों आश्रमी सदा करें ॥६३॥ गृहस्थ भी क्रिया (अपने श्रुतिस्मृति प्रतिपादित धर्म कर्म) में तत्पर रहे । घर में रहने से गृहस्थ नहीं होता, अपने कर्म से हीन गृहस्थ पुत्र और स्त्री

भाषाभाष्यसहिता ॥ १३

नचैवपुत्रदारेण स्वकर्मपरिवर्जितः ॥ ६४ ॥
अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच तथाऽदत्त्वाचभुञ्जते ।
देवादीनामृणीभूत्वा नरकन्तेव्रजन्त्यधः ॥ ६५ ॥
अस्नात्वासमलंभुङ्क्ते त्वजापीपूयशोणितम् ।
अहुत्वाचकृमिंभुङ्क्ते ह्यदत्त्वाऽमेध्यमेवच ॥६६॥
वृथातप्तोदकस्नानं वृथाजाप्यमवैदिकम् ।
वृथारतमपुत्रस्य वृथाभुक्तमसाक्षिकम् ॥ ६७ ॥
एकोहिभक्षयत्यन्नमपरोऽन्नेनभक्ष्यते ।
नभुज्यतेसएवैकोयोऽन्नं भुङ्क्तेहुतांशकम् ॥६८॥
विभागशीलतायस्य क्षमायुक्तोदयालुतः ।
देवतातिथिभक्तश्च गृहस्थःसतुधार्मिकः ॥६९॥
दयालज्जाक्षमाश्रद्धा प्रज्ञात्यागःकृतज्ञता ।
गुणाद्यस्यभवन्त्येते गृहस्थोमुख्यएवसः ॥७०॥
संविभागंततःकृत्वा गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ।

से गृहस्थ नहीं होता कि जो स्वकर्म से रहित है ॥ ६४ ॥ स्नान होम और दान किये विना जो गृहस्थ लोग भोजन करते हैं वे मनुष्य देवता आदि के ऋणी होकर अधोगति नरक में जाते हैं ॥ ६५ ॥ स्नान किये विना भोजन करने वाला, मल सहित खाता, जप किये विना खाने वाला पीव, रुधिर के तुल्य अन्न को खाता, होम किये विना खाने वाला कीड़ों को खाता, अतिथि को दिये विना अशुद्ध को खाता है ॥६६॥ गर्म किये जल से स्नान, वेदसे भिन्न स्तोत्र मन्त्रादि का जप, सन्तान हुए विना स्त्री से समागम, और देवतादि को दिये विना भोजन करना, ये सब काम व्यर्थ हैं॥६७॥ कोई मनुष्य तो अन्न को खाते हैं और किसी मनुष्यको अन्न ही खाता है। यदि अन्न किसी को नहीं खाता तो उस को ही नहीं खाता है जो देव आदिको देकर (वैश्वदेव करके) खाता है ॥ ६८ ॥ जिस का स्वभाव अन्यों का भाग देने का है, जो क्षमायुक्त है, दयालु है, और देवता तथा अतिथियों का भक्त है, वही गृहस्थ धार्मिक है ॥ ६९ ॥ दया, लज्जा, क्षमा, श्रद्धा, बुद्धिमत्ता, त्याग, कृतज्ञता (अन्य के किये उपकार को मानना) ये गुण जिस में हैं, वही गृहस्थ मुख्य है ॥ ७० ॥ फिर सब के लिये विभाग देकर गृहस्थ पुरुष शेष अन्न को