योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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के लिए प्रश्वास शब्द बहुत प्रयुक्त हुआ है) । तुल० अजस्रनिश्वासो रेचनम्
( देवल का वाक्य, मोक्षकाण्ड पृ० १७ में उद्धृत ) ।
यद्यपि सभी संस्करणों में निर्वात शब्द दृष्ट होता है, पर प्रकृत शब्द निवात
है; द्र० गीता ६।१९ 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता' । किसी
स्थान में आँधी आने से पहले वायु की अल्पता के कारण वायु का जो स्थिर
भाव लक्षित होता है, अथवा अन्य कारणों से भी जो ऐसा स्थिर भाव होता
है, वह निवात है । निवात वायु का सर्वथा अभाव नहीं है क्योंकि वायु न रहने
पर दीप जल ही नहीं सकता—यह ज्ञातव्य है ।
उन्मन्यवस्थाधिगमाय¹ विद्व
न्तुपायमेकं तव निर्दिशामि ।
पश्यन्नुदासीनदृशा प्रपञ्चं
संकल्पमुन्मूलय सावधानः ॥१९॥
[ १. उन्मन्यवस्थामधिगम्य (पाठा०)--यह भ्रष्ट पाठ है । 'अधिगम्य' के
साथ 'निर्दिशामि' का अन्वय नहीं हो सकता । दोनों क्रियाओं के कर्ता भिन्न
हैं, अतः ल्यबन्त 'अधिगम्य' का प्रयोग असंगत ही है । ]
अनुवाद--हे विद्वान ( =अध्यात्मविद्या के ज्ञाता ), उन्मनी-नामक
अवस्था की प्राप्ति के लिए आपको एक उपाय का निर्देश करता हूँ; आप
उदासीन दृष्टि से इस प्रपञ्च को देखते हुये सावधान होकर इस प्रपञ्च
का उन्मूलन करें ।
व्याख्या--उन्मनी-अवस्था का अधिगम प्राणवायु के सुषुम्ना-वाहिनी
होने पर होता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।२० ); इस अवस्था में योगी स्वरूप-स्थित
होता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।२१ ) । उन्मनी-अवस्था को मन का लय भी कहा
जाता है । मन का लय = मन का आत्माकार होना ( ज्योत्स्नाटीका ४।५९ ) ।