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सर्वकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 52 में से

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पृष्ठ 34

( २० )
निवात²दीपा इव निश्चलाङ्गा³
मनोन्मनी-मग्नधियो भवन्ति⁴॥१७॥
[ १. समस्ते (पाठ०) अर्थात् समस्ते श्वासप्रचारे। इस पाठ में 'भवन्ति'
क्रिया का कोई विशेष्य-कर्ता-नहीं रह जाता तथा 'निश्चलाङ्गाः' विशेषण के
साथ 'योगिनः' का अध्याहार करना पड़ता है।
२. निर्वाति (पाठ०)।
३. निवातदीपैरिव निश्चलाङ्गैः (पाठ०)—निवात दीपों की तरह
निश्चलअङ्गों के द्वारा। यह अर्थ हो सकता है, पर बहुत संगत नहीं जंचता।
४. मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् (पाठ०)। इस पाठ में अर्थ संगत
नहीं होता। यह वाक्य १७ वें श्लोक का चतुर्थ चरण है। लिपिकर के अनवधान
से यह अंश यहाँ पुनः लिखित हो गया है—ऐसा प्रतीत होता है।]
अनुवाद -चित्त और इन्द्रिय के दीर्घकालीन निग्रह के कारण श्वास-
क्रिया निरुद्ध हो जाती है। ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ योगी निवातस्थ दीपों की
तरह निश्चलाङ्ग हो जाते हैं तथा उनकी बुद्धि मनोन्मनी-नामक अवस्था
में मग्न हो जाती है।
व्याख्या—'चिरनिग्रह' अर्थात् दीर्घकालव्यापी निरोध। निरोध में क्रम-
विकास देखा जाता है (तुल० योगो हि प्रभवाप्ययौ, कठ० २।३।११)। निरोध
संस्कार की वृद्धि (जो निरोधजनक क्रिया बार-बार करने से होता है) से
निरोध-अवस्था की वृद्धि होती है। चित्त का निरोध होने पर श्वास-प्रश्वास
स्वतः अवरुद्ध हो जाते हैं—यह जानना चाहिये।
यहाँ 'श्वास-प्रचार' से वायु का नासिका द्वारा ग्रहण-त्याग (अर्थात्
श्वास-निश्वास) विवक्षित है। श्वास = नासा में बाह्य वायु का प्रवेश;
निश्वास = अन्तःस्थित वायु का बहिः निःसारण (ज्योत्स्ना ४।३१; निश्वास