योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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प्रपञ्च शब्द का अर्थ है--विस्तृत दृश्य । इस शब्द से 'प्रतिक्षण-परिणामी
अनित्य, सीमाहीन विचित्र विषय' समझा जाता है ।
उदासीन दृष्टि का अभिप्राय है--आसक्तिहीन अर्थात् राग द्वेष-हीन दृष्टि ।
'उद्'-उपसर्ग से ऊर्ध्वभाव द्योतित होता है; यह ऊर्ध्वस्थता तभी सम्भव है जब
विषयज्ञाता जीव अपनी सत्ता को विषयसत्ता से पृथक् समझे । इस प्रकार
समझना तभी सम्भव होता है जब राग-द्वेष से प्रभावित न होकर प्रपञ्च को देखने
की शक्ति हो, प्रपञ्च का ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने की सामर्थ्य हो । भ्रू मध्य
दृष्टि का अभ्यास इस उदासीन भाव का सहायक है ।
संकल्प का मूल स्वरूप है--चित्त में कल्पित या स्मृत किसी क्रिया में
अस्मिता का प्रयोग । यह सभी कामों( = कामनाओं) का मूल है कामों का
उच्छेद संकल्पवर्जन से ही सम्भव है—'संकल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वा-
नशेषतः' ( गीता ६।२४ ); 'संकल्पात् कामः संभवति' ( मोक्षकाण्ड पृ. ८१ में
उद्धृत हारीत-वाक्य ), 'काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे'; 'कामं
संकल्पवर्जनात्' ( शान्तिपर्व ३०१।५६ ) आदि वाक्य इस प्रसंग में स्मरणीय
हैं । रागादि संकल्पनिमित्तक हैं—यह न्यायसूत्र (३।१।२६) में कहा गया है ।
सूत्र-व्याख्याकारों के अनुसार 'संकल्प' आकाङ्क्षाविशेष, मिथ्याज्ञानविशेष, अशोभन
को शोभन समझना रूप कल्पना (जो भ्रम ही है ) है ।
सावधान = अवधान के साथ । आत्म-विस्मृति न होना, दूसरे शब्दों में 'अपने
द्रष्टृ-भाव को लक्ष्य करते रहना' अवधान है।
प्रसङ्ग संकल्पपरम्पराणां
संछेदने¹ सन्ततसावधानम्² ।
आलम्बनाशादपचीयमानं³
शनैः शनै शान्तिमुपैति चेतः ॥२०॥
१. संभेदने (पाठ०)--यह पाठ भी संगत है ।
२. सावधानः ( पाठ० ) । 'सावधानः' पाठ करने पर इस श्लोक के