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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय २९
इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी
श्रेयस्कर समझता हूँ। यहाँ भिक्षा का अर्थ उदर-पोषण के लिये भीख माँगना
नहीं बल्कि सत्पुरुषों की टूटी-फूटी सेवा द्वारा उनसे कल्याण की याचना ही
भिक्षा है। 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीय उप०, भृगुबल्ली २)
अन्न एकमात्र परमात्मा है, जिसे प्राप्त करके आत्मा सदा के लिये तृप्त हो
जाता है, कभी अतृप्त नहीं रहता। हम महापुरुषों की सेवा और याचना द्वारा
शनैः-शनैः ब्रह्मपीयूष प्राप्त करें; किन्तु यह परिवार न छूटे, यही अर्जुन के
भिक्षान्न की कामना है। संसार में अधिकांश लोग ऐसा ही करते हैं। वे चाहते
हैं कि पारिवारिक स्नेह-सम्बन्ध न मारना पड़े और मुक्ति भी शनैः-शनैः मिल
जाय। किन्तु चलनेवाले पथिक के लिये, जिसके संस्कार इनसे ऊपर हैं,
जिसमें संघर्ष की क्षमता है, स्वभाव में क्षत्रियत्व प्रवाहित है, उसके लिये इस
भिक्षान्न का विधान नहीं है। स्वयं न करके याचना करना भिक्षान्न है। गौतम
बुद्ध ने भी मज्झिम निकाय के धम्मदायाद सुत्त (१/१/३) में इस भिक्षान्न को
आमिष-दायाद कहकर हेय माना है, जबकि शरीरयापन से सभी भिक्षु थे।
इन गुरुजनों को मारकर मिलेगा क्या? इस लोक में रुधिर से सने अर्थ
और काम के भोग ही तो भोगने को मिलेंगे। अर्जुन कदाचित् सोचता था कि
भजन से भौतिक सुखों की मात्रा में अभिवृद्धि होगी। इतना संघर्ष झेलने के
बाद भी इस शरीर के पोषक अर्थ और काम के भोग ही तो मिलेंगे। वह पुनः
तर्क देता है-
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६॥
यह भी निश्चित नहीं है कि वह भोग मिलेगा ही। यह भी हम नहीं
जानते कि हमारे लिये क्या करना श्रेयस्कर है; क्योंकि जो कुछ हमने कहा,
वह अज्ञान प्रमाणित हो गया। यह भी ज्ञात नहीं है कि हम जीतेंगे अथवा वे ही
जीतेंगे। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे

३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
सामने खड़े हैं। जब अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र से उत्पन्न मोह इत्यादि स्वजन-समुदाय
मिट ही जायेंगे, तब हम जी कर ही क्या करेंगे? अर्जुन पुनः सोचता है कि जो
कुछ हमने कहा, कदाचित् यह भी अज्ञान हो; अतः प्रार्थना करता है-
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७॥
कायरता के दोष से नष्ट स्वभाववाला, धर्म के विषय में सर्वथा मोहितचित्त
हुआ मैं आपसे पूछता हूँ। जो कुछ निश्चित परम कल्याणकारी हो, वह साधन
मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे साधिये।
केवल शिक्षा न दीजिये, बल्कि जहाँ लड़खड़ाऊँ वहाँ सँभालिये। 'लाद दे
लदाय दे और लदानेवाला साथ चले- कदाचित् गट्ठर गिर पड़ा, तब कौन
लदवायेगा?'-ऐसा ही समर्पण अर्जुन का है।
यहाँ अर्जुन ने पूर्ण समर्पण कर दिया। अभी तक वह श्रीकृष्ण को अपने
स्तर का ही समझता था, अनेक विद्याओं में अपने को कुछ आगे ही मानता
था। यहाँ उसने अपनी बागडोर श्रीकृष्ण को वस्तुतः सौंप दी। सद्गुरु पूर्तिपर्यन्त
हृदय में रहकर साधक के साथ चलते हैं। यदि वे साथ न रहें तो साधक पार
न हो। युवा कन्या के परिवारवाले जिस प्रकार शादी-विवाह तक उसको संयम
की शिक्षा देते हुए सँभाल ले जाते हैं, ठीक इसी प्रकार सद्गुरु अपने शिष्य की
अन्तरात्मा से रथी होकर उसे प्रकृति की घाटियों से निकालकर पार कर देते
हैं। अर्जुन निवेदन करता है कि- भगवन्! एक बात और है-
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८॥
भूमि पर निष्कण्टक धन-धान्यसम्पन्न राज्य को और देवताओं के
स्वामीपन इन्द्रपद को पाकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो मेरी इन्द्रियों

द्वितीय अध्याय ३१
को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। जब शोक बना ही है तो यह सब लेकर
ही मैं क्या करूँगा? यदि इतना ही मिलना है तो क्षमा करें। अर्जुन ने सोचा,
अब इसके आगे बतायेंगे भी क्या?
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।।
संजय बोला- हे राजन्! मोहनिशाजयी अर्जुन ने हृदय के सर्वज्ञ श्रीकृष्ण
से यह कहकर कि ‘गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा’ चुप हो गया। अभी तक
अर्जुन की दृष्टि पौराणिक है, जिसमें कर्मकाण्डों के साथ भोगों की उपलब्धि
का विधान है, जिसमें स्वर्ग ही सब कुछ माना जाता है- जिस पर श्रीकृष्ण
प्रकाश डालेंगे कि यह विचारधारा भी गलत है।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।१०।।
उसके उपरान्त हे राजन्! अन्तर्यामी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं
के बीच में उस शोकयुक्त अर्जुन को हँसते हुए-से यह वचन कहा-
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।११।।
अर्जुन! तू न शोक करने योग्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों
के-से वचन कहता है; किन्तु बुद्धिसम्पन्न पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं
उनके लिये तथा जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी शोक नहीं करते;
क्योंकि वे भी मर जायेंगे। तू पण्डितों-जैसी बातें भर करता है, वस्तुतः ज्ञाता
है नहीं; क्योंकि-
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।१२।।

३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
न तो ऐसा ही है कि मैं अर्थात् सद्गुरु किसी काल में नहीं था अथवा
तू अनुरागी अधिकारी अथवा ‘जनाधिपाः’– राजा लोग अर्थात् राजसी वृत्ति
में पाया जानेवाला अहं नहीं था और न ऐसा ही है कि आगे हम सब नहीं रहेंगे।
सद्गुरु सदैव रहता है, अनुरागी सदैव रहते हैं। यहाँ योगेश्वर ने योग की
अनादिता पर प्रकाश डालते हुए भविष्य में भी उसकी विद्यमानता पर बल
दिया। मरनेवालों के लिये शोक न करने के लिये कारण बताते हुए उन्होंने
कहा-
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।
जैसे जीवात्मा की इस देह में कुमार, युवा और वृद्ध अवस्था होती है,
वैसे ही अन्य-अन्य शरीरों की प्राप्ति में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है। कभी
आप बालक थे, शनैः-शनैः युवा हुए, तब आप मर तो नहीं गये? पुनः वृद्ध
हुए। पुरुष एक ही है, उसी प्रकार लेशमात्र भी दरार नये देह की प्राप्ति पर नहीं
पड़ती। कलेवर का यह परिवर्तन तब तक चलेगा, जब तक परिवर्तन से परे
की वस्तु नहीं मिल जाती।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।
हे कुन्तीपुत्र! सुख, दुःख, सर्दी और गर्मी को देनेवाले इन्द्रियों और
विषयों के संयोग तो अनित्य हैं, क्षणभंगुर हैं। अतः भरतवंशी अर्जुन! तू इनका
त्याग कर। अर्जुन इन्द्रिय और विषय के संयोगजन्य सुख का स्मरण करके ही
विकल था। कुलधर्म, कुलगुरुओं की पूज्यता इत्यादि इन्द्रियों के लगाव के
अन्तर्गत हैं। ये क्षणिक हैं, झूठे हैं, नाशवान् हैं। विषयों का संयोग न सदैव
मिलेगा और न सदैव इन्द्रियों में क्षमता ही रहेगी। अतः अर्जुन! तू इनका त्याग
कर, सहन कर। क्यों? क्या हिमालय की लड़ाई थी जो अर्जुन सर्दी सहन
करता अथवा क्या यह रेगिस्तान की लड़ाई है जहाँ अर्जुन गर्मी सहन करे?
‘कुरुक्षेत्र’ जैसा कि लोग बाहर बताते हैं, समशीतोष्ण स्थली है। कुल अठारह
दिन तो लड़ाई हुई, इतने में कहाँ जाड़ा-गर्मी बीत गया? वस्तुतः सर्दी-गर्मी,

द्वितीय अध्याय ३३
दुःख-सुख, मान-अपमान को सहन करना एक योगी पर निर्भर करता है। यह
हृदय-देश की लड़ाई का चित्रण है। बाहर युद्ध के लिये गीता नहीं कहती। यह
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है, जिसमें आसुरी सम्पद् का सर्वथा शमन कर परमात्मा
में स्थिति दिलाकर दैवी सम्पद् भी शान्त हो जाती है। जब विकार हैं ही नहीं
तो सजातीय प्रवृत्तियाँ किस पर आक्रमण करें? अतः पूर्णत्व के साथ वे भी
शान्त हो जाती हैं, इससे पहले नहीं। गीता अन्तर्देश की लड़ाई का चित्रण है।
इस त्याग से मिलेगा क्या? इससे लाभ क्या है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझनेवाले जिस धीर
पुरुष को इन्द्रियों और विषयों के संयोग व्यथित नहीं कर पाते, वह मृत्यु से परे
अमृत-तत्त्व की प्राप्ति के योग्य हो जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने एक उपलब्धि
‘अमृत’ की चर्चा की। अर्जुन सोचता था कि युद्ध के परिणाम में स्वर्ग मिलेगा
या पृथ्वी; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि न स्वर्ग मिलेगा और न पृथ्वी, बल्कि
अमृत मिलेगा। अमृत क्या है?-
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६॥
अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है, वह है ही नहीं, उसे रोका नहीं
जा सकता और सत्य का तीनों काल में अभाव नहीं है, उसे मिटाया नहीं जा
सकता। अर्जुन ने पूछा- क्या भगवान होने के नाते आप कहते हैं? श्रीकृष्ण ने
बताया- मैं तो कहता ही हूँ, इन दोनों का यह अन्तर हमारे साथ-साथ
तत्त्वदर्शियों द्वारा भी देखा गया है। श्रीकृष्ण ने वही सत्य दोहराया, जो तत्त्वदर्शियों
ने कभी देख लिया था। श्रीकृष्ण भी एक तत्त्वदर्शी महापुरुष थे। परमतत्त्व
परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन करके उसमें स्थितिवाले तत्त्वदर्शी कहलाते हैं। सत्
और असत् हैं क्या? इस पर कहते हैं-
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥१७॥

३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
नाशरहित तो वह है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस
'अव्ययस्य'- अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं है। किन्तु इस
'अविनाशी', 'अमृत' का नाम क्या है? वह है कौन?-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।१८।।
अविनाशी, अप्रमेय, नित्यस्वरूप आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान्
कहे गये हैं, इसलिये भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर। आत्मा ही अमृत है।
आत्मा ही अविनाशी है, जिसका तीनों काल में नाश नहीं होता। आत्मा ही सत्
है। शरीर नाशवान् है यही असत् है, जिसका तीनों काल में अस्तित्व नहीं है।
'शरीर नाशवान् है, इसलिये तू युद्ध कर'- इस आदेश से यह स्पष्ट नहीं
होता कि अर्जुन केवल कौरवों को मारे। पाण्डव-पक्ष में भी तो शरीर ही खड़े
थे, क्या पाण्डवों के शरीर अविनाशी थे? यदि शरीर नाशवान् है तो श्रीकृष्ण
किसकी रक्षा में खड़े थे? क्या अर्जुन कोई शरीरधारी था? शरीर जो असत् है,
जिसका अस्तित्व नहीं है, जिसे रोका नहीं जा सकता, क्या श्रीकृष्ण उस शरीर
की रक्षा में खड़े हैं? यदि ऐसा है तो वे भी अविवेकी और मूढ़ हैं; क्योंकि आगे
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि जो केवल शरीर के लिये ही पचता है, श्रम करता
है वह अविवेकी और मूढ़बुद्धि है। वह पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। (३/
१३) अन्ततः अर्जुन कौन था?
वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। अनुरागी के लिये इष्ट सदैव रथी बनकर
साथ में रहते हैं। सखा की भाँति उसका मार्गदर्शन करते हैं। आप शरीर नहीं हैं।
शरीर तो आवरण है, रहने का मकान है। उसमें रहनेवाला अनुरागपूरित आत्मा
है। भौतिक युद्ध, मारने-काटने से शरीरों का अन्त नहीं होता। यह शरीर
छूटेगा तो आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेगा। इसी सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कह
चुके हैं कि जिस प्रकार बाल्यकाल से युवा या वृद्धावस्था आती है, उसी प्रकार
देहान्तर की प्राप्ति होती है। शरीर काटेंगे तो जीवात्मा नया वस्त्र बदल लेगा।
शरीर संस्कारों के आश्रित है और संस्कार मन पर आधारित हैं। 'मन
एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।' (पंचदशी, ५/६०) मन का

द्वितीय अध्याय ३५
सर्वथा निरोध होना, अचल-स्थिर ठहरना और अन्तिम संस्कार का विलय
एक ही क्रिया है। संस्कारों की सतह का टूट जाना ही शरीरों का अन्त है। इसे
तोड़ने के लिये आपको आराधना करनी होगी, जिसे श्रीकृष्ण ने कर्म या
निष्काम कर्मयोग की संज्ञा दी है। श्रीकृष्ण ने स्थान-स्थान पर अर्जुन को युद्ध
की प्रेरणा दी; किन्तु एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो भौतिक युद्ध या मारकाट
का समर्थन करता हो। यह युद्ध सजातीय-विजातीय प्रवृत्तियों का है, अन्तर्देश
में है।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।१९।।
जो इस आत्मा को मारनेवाला मानता है तथा जो इस आत्मा को मरा
हुआ समझता है, वे दोनों ही आत्मा को नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो
मारता है और न मारा ही जाता है। पुनः इसी पर बल देते हैं-
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।२०।।
यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है; क्योंकि यह
वस्त्र ही तो बदलता है। न यह आत्मा होकर अन्य कुछ होनेवाला है; क्योंकि
यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी
इसका नाश नहीं होता। आत्मा ही सत्य है, आत्मा ही पुरातन है, आत्मा ही
शाश्वत और सनातन है। आप कौन हैं? सनातन-धर्म के अनुयायी। सनातन
कौन है? आत्मा। आप आत्मा के अनुयायी हैं। आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म एक
दूसरे के पर्याय हैं। आप कौन हैं? शाश्वत-धर्म के उपासक। शाश्वत कौन है?
आत्मा। अर्थात् हम-आप आत्मा के उपासक हैं। यदि आप आत्मिक पथ को
नहीं जानते तो आपके पास शाश्वत-सनातन नाम की कोई वस्तु नहीं है।
उसके लिये आप आहें भरते हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं; किन्तु सनातनधर्मी नहीं
हैं। सनातन-धर्म के नाम पर किसी कुरीति के शिकार हैं।

३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
देश-विदेश में, मानवमात्र में आत्मा एक ही जैसा है। इसलिये विश्व में
कहीं भी कोई आत्मा की स्थिति दिलानेवाली क्रिया जानता है और उस पर
चलने के लिये प्रयत्नशील है तो वह सनातनधर्मी है, चाहे वह अपने को
ईसाई, मुसलमान, यहूदी या कुछ भी क्यों न कह ले।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।२१।।
पार्थिव शरीर को रथ बनाकर ब्रह्मरूपी लक्ष्य पर अचूक निशाना
लगानेवाला पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा
और अव्यक्त जानता है, वह पुरुष कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी
को मारता है? अविनाशी का विनाश असम्भव है। अजन्मा जन्म नहीं लेता।
अतः शरीर के लिये शोक नहीं करना चाहिये। इसी को उदाहरण से स्पष्ट
करते हैं-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।२२।।
जैसे मनुष्य ‘जीर्णानि वासांसि’ - जीर्ण-शीर्ण पुराने वस्त्रों को त्यागकर
नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही यह जीवात्मा पुराने शरीरों को
त्यागकर दूसरे नये शरीरों को धारण करता है। जीर्ण होने पर ही नया शरीर
धारण करना है तो शिशु क्यों मर जाते हैं? यह वस्त्र तो और विकसित होना
चाहिये। वस्तुतः यह शरीर संस्कारों पर आधारित है। जब संस्कार जीर्ण होते
हैं तो शरीर छूट जाता है। यदि संस्कार दो दिन का है तो दूसरे दिन ही शरीर
जीर्ण हो गया। इसके बाद मनुष्य एक श्वास भी अधिक नहीं जीता। संस्कार ही
शरीर है। आत्मा संस्कारों के अनुसार नया शरीर धारण कर लेता है। ‘अथ
खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य
भवति।’ (छान्दोग्योपनिषद्, ३/१४) अर्थात् यह पुरुष निश्चय ही संकल्पमय
है। इस लोक में पुरुष जैसा निश्चयवाला होता है, वैसा ही यहाँ से मरकर जाने

द्वितीय अध्याय ३७
पर होता है। अपने संकल्प से बनाये हुए शरीरों में पुरुष उत्पन्न होता है। इस
प्रकार मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है। आत्मा नहीं मरता। पुनः इसकी
अजरता-अमरता पर बल देते हैं-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥२३॥
अर्जुन! इस आत्मा को शस्त्रादि नहीं काटते, अग्नि इसे जला नहीं
सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और न वायु इसे सुखा ही सकता है।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥२४॥
यह आत्मा अच्छेद्य है- इसे छेदा नहीं जा सकता, यह अदाह्य है- इसे
जलाया नहीं जा सकता, यह अक्लेद्य है- इसे गीला नहीं किया जा सकता,
आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा निःसन्देह अशोष्य,
सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है।
अर्जुन ने कहा कि कुलधर्म सनातन है, ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म
नष्ट हो जायेगा; किन्तु श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान माना और आत्मा को ही सनातन
बताया। आप कौन हैं? सनातन-धर्म के अनुयायी। सनातन कौन है? आत्मा।
यदि आप आत्मपर्यन्त दूरी तय करानेवाली विधि-विशेष से अवगत नहीं हैं तो
आप सनातन-धर्म नहीं जानते। इसका कुपरिणाम साम्प्रदायिकता में फँसे
धर्मभीरु लोगों को भोगना पड़ रहा है। मध्यकालीन भारत में बाहर से आनेवाले
मुसलमान मात्र बारह हजार थे, आज अट्ठाइस करोड़ हैं। बारह हजार से
बढ़कर लाखों हो जाते, अधिक-से-अधिक करोड़ के लगभग हो जाते, और
कितने हो जाते? यह अट्ठाइस करोड़ से भी आगे बढ़ रहे हैं। सब हिन्दू ही तो
हैं। आपके सगे भाई हैं, जो छूने और खाने से नष्ट हो गये। वे नष्ट नहीं हुए
बल्कि उनका सनातन अपरिवर्तनशील धर्म नष्ट हो गया।
जब मैटर (Matter) क्षेत्र में पैदा होनेवाली कोई वस्तु इस सनातन का
स्पर्श नहीं कर सकती, तो छूने-खाने से सनातन-धर्म नष्ट कैसे हो सकता है?
यह धर्म नहीं, एक कुरीति-परिस्थिति थी, जिससे भारत में साम्प्रदायिक

३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वैमनस्य बढ़ा, देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता की आज भी समस्या
बनी हुई है।
इन कुरीतियों के कथानक इतिहास में भरे पड़े हैं। हमीरपुर जिले में
पचास-साठ परिवार कुलीन क्षत्रिय थे। आज वे सब मुसलमान हैं। न उन पर
तोप का हमला हुआ, न तलवार का। हुआ क्या? अर्द्धरात्रि में दो-एक मौलवी
उस गाँव के एकमात्र कुएँ के समीप छिप गये कि कर्मकाण्डी ब्राह्मण सबसे
पहले यहाँ स्नान करने आयेगा। जहाँ वे आये तो उन्हें पकड़ लिया, उनका मुँह
बन्द कर दिया। उनके सामने उन्होंने कुएँ से पानी निकाला, मुँह लगाकर पिया
और बचा हुआ पानी कुएँ में डाल दिया। रोटी का एक टुकड़ा भी डाल दिया।
पण्डितजी देखते ही रह गये, विवश थे। तत्पश्चात् पण्डितजी को भी साथ
लेकर वे चले गये। अपने घर में उन्हें बन्द कर दिया।
दूसरे दिन उन्होंने हाथ जोड़कर पण्डितजी से भोजन के लिये निवेदन
किया तो वे बिगड़ पड़े- “अरे, तुम यवन हो मैं ब्राह्मण, भला कैसे खा सकता
हूँ?” उन्होंने कहा- “महाराज! हमें आप-जैसे विचारवान् लोगों की बड़ी
आवश्यकता है। क्षमा करें।” पण्डितजी को छोड़ दिया गया।
पण्डितजी अपने गाँव आये। देखा, लोग कुएँ का प्रयोग पूर्ववत् कर रहे
थे। वे अनशन करने लगे। लोगों ने कारण पूछा तो बोले- यवन इस कुएँ की
जगत पर चढ़ गये थे। मेरे सामने उन्होंने इस कुएँ को जूठा किया और इसमें
रोटी का टुकड़ा भी डाल दिया। गाँव के लोग स्तब्ध रह गये। पूछा- “अब
क्या होगा?” पण्डित जी ने बताया- “अब क्या? धर्म तो नष्ट हो गया।”
उस समय लोग शिक्षित नहीं थे। स्त्रियों और शूद्रों से पढ़ने का अधिकार
न जाने कब से छीन लिया गया था। वैश्य धनोपार्जन ही अपना धर्म मान बैठे
थे। क्षत्रिय चारणों के प्रशस्ति-गायन में खोये थे कि अन्नदाता की तलवार
चमकी तो बिजली कौंधने लगी, दिल्ली का तख्त डगमगाने लगा। सम्मान वैसे
ही प्राप्त है तो पढ़ें क्यों? धर्म से उन्हें क्या लेना-देना? धर्म केवल ब्राह्मणों की
वस्तु बनकर रह गया था। वे ही धर्मसूत्रों के रचयिता, वे ही उसके व्याख्याकार
और वही उसके झूठ-सच के निर्णायक थे- जबकि प्राचीनकाल में स्त्रियों,

द्वितीय अध्याय ३९
शूद्रों, वैश्यों, क्षत्रियों और ब्राह्मणों को, सबको वेद पढ़ने का अधिकार था।
प्रत्येक वर्ग के ऋषियों ने वैदिक मन्त्रों की रचना की है, शास्त्रार्थ-निर्णय में
भाग लिया है। प्राचीन राजाओं ने धर्म के नाम पर आडम्बर फैलानेवालों को
दण्ड दिया, धर्मपरायणों का समादर किया था। किन्तु मध्यकालीन भारत में
सनातन-धर्म की यथार्थ जानकारी न रखने से उपर्युक्त गाँव के निवासी भेड़
की तरह एक कोने में खड़े होते गये कि धर्म नष्ट हो गया। कई लोगों ने इस
अप्रिय शब्द को सुनकर आत्महत्या कर ली; किन्तु सब कहाँ तक प्राणान्त
करते। अटूट श्रद्धा के पश्चात् भी विवश होकर अन्य हल खोजना पड़ा। आज
भी वे बाँस गाड़कर, मूसल रखकर हिन्दुओं की तरह विवाह करते हैं, बाद में
एक मौलवी निकाह पढ़ाकर चला जाता है। सब-के-सब शुद्ध हिन्दू हैं, सब-
के-सब मुसलमान बन गये।
हुआ क्या था? पानी पिया था, अनजाने में मुसलमानों का छुआ खा
लिया था इसलिये धर्म नष्ट हो गया। धर्म तो हो गया छुईमुई (लाजवन्ती)। यह
एक पौधा होता है। आप छू दें तो उसकी पत्तियाँ संकुचित हो जाती हैं और हाथ
हटाते ही पुनः विकसित हो जाती हैं। यह पौधा हाथ हटाने पर विकसित हो
जाता है; किन्तु धर्म तो ऐसा मुरझाया कि कभी विकसित नहीं होगा। वे मर
गये, सदा के लिये उनके राम, कृष्ण और परमात्मा मर गये। जो शाश्वत थे,
वे मर गये। वास्तव में वह शाश्वत के नाम पर कोई कुरीति थी, जिसे लोग धर्म
मान बैठे थे।
धर्म की शरण हम क्यों जाते हैं? क्योंकि हम मरणधर्मा (मरने-
जीनेवाले) हैं और धर्म कोई ठोस चीज है, जिसकी शरण जाकर हम भी अमर
हो जायें। हम तो मारने से मरेंगे और यह धर्म केवल छूने और खाने से मर
जायेगा, तो हमारी क्या रक्षा करेगा? धर्म तो आपकी रक्षा करता है, आपसे
शक्तिशाली है। आप तलवार से मरेंगे और धर्म? वह छूने से नष्ट हो गया। कैसा
है आपका धर्म? कुरीतियाँ नष्ट होती हैं, न कि सनातन। सनातन तो ऐसी ठोस
वस्तु है जिसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं
कर सकता। खानपान तो दूर, प्रकृति में उत्पन्न कोई वस्तु उसका स्पर्श भी नहीं
कर पाती तो वह सनातन नष्ट कैसे हो गया?

४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ऐसी ही कतिपय कुरीतियाँ अर्जुनकाल में भी थीं। उनका शिकार अर्जुन
भी था। उसने विलाप करते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि कुलधर्म सनातन है।
युद्ध से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। कुलधर्म नष्ट होने से हम अनन्तकाल
तक नरक में चले जायेंगे। किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा- "तुझे यह अज्ञान कहाँ से
उत्पन्न हो गया?" सिद्ध है कि वह कोई कुरीति थी, तभी तो श्रीकृष्ण ने उसका
निराकरण किया और बताया कि आत्मा ही सनातन है। यदि आप आत्मिक
पथ नहीं जानते तो सनातन-धर्म में आपका अभी तक प्रवेश नहीं हुआ है।
जब यह सनातन-शाश्वत आत्मा सबके अन्दर व्याप्त है तो खोजा
किसे जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५॥
यह आत्मा अव्यक्त अर्थात् इन्द्रियों का विषय नहीं है। इन्द्रियों के द्वारा
इसे समझा नहीं जा सकता। जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, तब
तक आत्मा है तो; किन्तु उसे समझा नहीं जा सकता। वह अचिन्त्य है। जब
तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह शाश्वत है तो; किन्तु हमारे
दर्शन, उपभोग और प्रवेश के लिये नहीं है। अतः चित्त का निरोध करें।
पीछे श्रीकृष्ण बता आये हैं कि असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और
सत् का तीनों काल में अभाव नहीं है। वह सत् है आत्मा। आत्मा ही
अपरिवर्तनशील, शाश्वत, सनातन और अव्यक्त है। तत्त्वदर्शियों ने आत्मा को
इन विशेष गुणधर्मों से युक्त देखा। न दस भाषाओं के ज्ञाता ने देखा, न किसी
समृद्धिशाली ने देखा, बल्कि तत्त्वदर्शियों ने देखा। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि
तत्त्व है परमात्मा। मन के निरोधकाल में साधक उसका दर्शन और उसमें
प्रवेश पाता है। प्राप्तिकाल में भगवान मिलते हैं और दूसरे ही क्षण वह अपनी
आत्मा को ईश्वरीय गुणधर्मों से विभूषित देखता है। वह देखता है कि आत्मा
ही सत्य, सनातन और परिपूर्ण है। यह आत्मा अचिन्त्य है। यह विकाररहित
अर्थात् न बदलनेवाला कहा जाता है। अतः अर्जुन ! आत्मा को ऐसा जानकर

द्वितीय अध्याय ४१
तू शोक करने योग्य नहीं है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों में विरोधाभास
दिखाते हैं, जो सामान्य तर्क है-
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।२६।।
यदि तू इसे सदैव जन्मनेवाला और सदा मरनेवाला माने तब भी तुझे
शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि-
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।२७।।
ऐसा मान लेने पर भी जन्मनेवाले की निश्चित मृत्यु और मरनेवाले का
निश्चित जन्म सिद्ध होता है। इसलिये भी तू बिना उपायवाले इस विषय में
शोक करने लायक नहीं है। जिसका कोई इलाज नहीं, उसके लिये शोक करना
एक अन्य दुःख को आमन्त्रित करना है।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२८।।
अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले बिना शरीरवाले और मरने के बाद
भी बिना शरीरवाले हैं। जन्म के पूर्व और मृत्यु के पश्चात् भी दिखायी नहीं
पड़ते, केवल जन्म-मृत्यु के बीच में ही शरीर धारण किये हुए दिखायी देते हैं।
अतः इस परिवर्तन के लिये व्यर्थ की चिन्ता क्यों करते हो? इस आत्मा को
देखता कौन है? इस पर कहते हैं-
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।२९।।
पहले श्रीकृष्ण ने कहा था कि इस आत्मा को तत्त्वदर्शियों ने देखा है,
अब तत्त्वदर्शन की दुर्लभता पर प्रकाश डालते हैं कि कोई विरला महापुरुष ही
इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है। सुनता नहीं, प्रत्यक्ष देखता है और

४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्त्व को कहता है।
जिसने देखा है, वही यथार्थ कह सकता है। दूसरा कोई विरला साधक इसे
आश्चर्य की भाँति सुनता है। सब सुनते भी नहीं; क्योंकि यह अधिकारी के
लिये ही है। हे अर्जुन ! कोई-कोई तो सुनकर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते;
क्योंकि साधन पार नहीं लगता। आप लाख ज्ञान की बातें सुनें, समझें- बाल
की खाल निकालकर समझें, लालायित भी रहें; किन्तु मोह बड़ा प्रबल है,
थोड़ी देर बाद ही आप अपनी सांसारिक व्यवस्थाओं में लिप्त मिलेंगे।
अन्त में श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं-
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।३०।।
अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीर में सदैव अवध्य है, अकाट्य है।
इसलिये सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये तू शोक करने योग्य नहीं है।
'आत्मा ही सनातन है'- इस तथ्य का प्रतिपादन करके, इसका प्रभुतासहित
वर्णन करके यह प्रश्न यहीं पूरा हो जाता है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि इसकी
प्राप्ति कैसे हो? सम्पूर्ण गीता में इसके लिये दो ही मार्ग हैं- पहला निष्काम
कर्मयोग और दूसरा ज्ञानयोग। दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म एक ही है।
उस कर्म की अनिवार्यता पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञानयोग के विषय
में कहते हैं-
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।३१।।
अर्जुन ! स्वधर्म देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है; क्योंकि धर्मसंयुक्त
युद्ध से बढ़कर अन्य कोई परमकल्याणकारी मार्ग क्षत्रिय के लिये नहीं है।
अभी तक तो 'आत्मा शाश्वत है', 'आत्मा सनातन है', 'वही एकमात्र धर्म है'
कहा गया है। अब यह स्वधर्म कैसा? धर्म तो एकमात्र आत्मा ही है। वह तो
अचल स्थिर है तो धर्माचरण क्या? वस्तुतः इस आत्मपथ में प्रवृत्त होने की
क्षमता हर व्यक्ति की अलग-अलग होती है। स्वभाव से उत्पन्न इस क्षमता को
स्वधर्म कहा गया है।

द्वितीय अध्याय ४३
इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरुष ने
स्वभाव की क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा- शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और
ब्राह्मण। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात् अल्पज्ञ
होता है। घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता।
वह प्रकृति के मायाजाल को काट नहीं पाता। इस अवस्था में महापुरुष की
सेवा से उसके स्वभाव में सद्गुण आते हैं। वह वैश्य श्रेणी का साधक बन
जाता है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसका वह शनैः-शनैः संग्रह
और गोपालन अर्थात् इन्द्रियों की सुरक्षा करने में सक्षम हो जाता है। काम,
क्रोध इत्यादि से इन्द्रियों की हिंसा होती है तथा विवेक, वैराग्य से इनकी सुरक्षा
होती है; किन्तु प्रकृति को निर्बीज करने की क्षमता उसमें नहीं होती। क्रमशः
उन्नति करते-करते साधक के अन्तःकरण में तीनों गुणों को काटने की क्षमता
अर्थात् क्षत्रियत्व आ जाता है। इसी स्तर पर प्रकृति और उसके विकारों को
नाश करने की क्षमता आ जाती है, इसलिये युद्ध यहीं से आरम्भ होता है।
क्रमशः साधन करके साधक ब्राह्मणत्व की श्रेणी में बदल जाता है। इस समय
मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, धारावाही चिन्तन, सरलता, अनुभव, ज्ञान
इत्यादि लक्षण साधक में स्वाभाविक प्रवाहित होते हैं। इन्हीं के अनुष्ठान से
चलकर क्रमशः वह ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है, जहाँ वह ब्राह्मण भी नहीं
रह जाता।
विदेह राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चाक्रायण, उषस्ति,
कहोल, आरुणि, उद्दालक और गार्गी के प्रश्नों का समाधान करते हुए बताया
कि आत्मसाक्षात्कार का पूर्णतया सम्पादन करनेवाला ही ब्राह्मण होता है। यह
आत्मा ही लोक, परलोक और समस्त प्राणियों को भीतर से नियमित करता
है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, तारागण, अन्तरिक्ष, आकाश एवं
प्रत्येक क्षण इस आत्मा के ही प्रशासन में हैं। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी
अमृत है। आत्मा अक्षर है, इससे भिन्न सब नाशवान् हैं। जो कोई इसी लोक में
इस अक्षर को न जानकर हवन करता है, तप करता है, हजारों वर्षों तक यज्ञ
करता है, उसका यह सब कर्म नाशवान् है। जो कोई भी इस अक्षर को जाने
बिना इस लोक से मरकर जाता है वह दयनीय है, कृपण है और जो इस अक्षर

४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है। (बृहदारण्यकोपनिषद्,
तृतीय अध्याय, अष्टम ब्राह्मण)
अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी
के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहीं।
प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्या? प्रायः लोग इसका आशय समाज में जन्मना
उत्पन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातियों से लेते हैं। इन्हें ही चार वर्ण मान
लिया जाता है। किन्तु नहीं, शास्त्रकार ने स्वयं बताया है कि क्षत्रिय क्या है,
वर्ण क्या है? यहाँ उन्होंने केवल क्षत्रिय का नाम लिया और आगे अठारहवें
अध्याय तक इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया कि वस्तुतः ये वर्ण हैं क्या
और कैसे इनमें परिवर्तन होता है?
श्रीकृष्ण ने कहा, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’ (गीता, ४/१३)- चार
वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को बाँटा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं,
‘गुणकर्मविभागशः।’- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा।
अब यह देखना है कि वह कर्म क्या है, जिसे बाँटा गया? गुण परिवर्तनशील
हैं। साधना की उचित प्रक्रिया द्वारा तामसी से राजसी और राजसी से सात्त्विक
गुणों में प्रवेश मिलता जाता है। अन्ततः ब्राह्मण स्वभाव बन जाता है। उस
समय ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ उस साधक में रहती हैं।
वर्ण-सम्बन्धी प्रश्न यहाँ से आरम्भ होकर अठारहवें अध्याय में जाकर पूर्ण
होता है।
श्रीकृष्ण की मान्यता है- ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्व-
नुष्ठितात्।’ (गीता, १८/४७) स्वभाव से उत्पन्न इस धर्म में प्रवृत्त होने की
क्षमता जिस स्तर की हो, भले ही वह गुणरहित शूद्र श्रेणी की हो, तब भी
परमकल्याण करती है; क्योंकि आप क्रमशः वहीं से उत्थान करते हैं। उससे
ऊपरवालों की नकल करके साधक नष्ट हो जाता है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का
साधक था, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि- अर्जुन! अपने स्वभाव से उत्पन्न
इस युद्ध में प्रवृत्त होने की अपनी क्षमता को देखकर भी तू भय करने योग्य
नहीं है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य क्षत्रिय के लिये नहीं है।
इसी पर प्रकाश डालते हुए पुनः योगेश्वर कहते हैं-

द्वितीय अध्याय ४५
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥
पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर अचूक लक्ष्यवेधी अर्जुन ! स्वतः प्राप्त
स्वर्ग के खुले हुए द्वाररूपी इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं।
क्षत्रिय श्रेणी के साधक में तीनों गुणों को काट देने की क्षमता रहती है। उसके
लिये स्वर्ग का द्वार खुला है; क्योंकि उसमें दैवी सम्पद् पूर्णतः अर्जित रहती है,
स्वर में विचरने की उसमें क्षमता रहती है। यही खुला हुआ स्वर्ग का द्वार है।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय ही पाते हैं; क्योंकि उनमें ही इस
संघर्ष की क्षमता है।
दुनिया में लड़ाइयाँ होती हैं। विश्व सिमटकर लड़ता है, प्रत्येक जाति
लड़ती है; किन्तु शाश्वत विजय जीतनेवाले को भी नहीं मिलती। ये तो बदले
हैं। जो जिसको जितना दबाता है, कालान्तर में उसे भी उतना ही दबना पड़ता
है। यह कैसी विजय है, जिसमें इन्द्रियों को सुखानेवाला शोक बना ही रहता है,
अन्त में शरीर भी नष्ट हो जाता है? वास्तविक संघर्ष तो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का है,
जिसमें एक बार विजय हो जाने पर प्रकृति का सदा के लिये निरोध और
परमपुरुष परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यह ऐसी विजय है, जिसके पीछे
हार नहीं है।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।।३३।।
और यदि तू इस 'धर्मयुक्त संग्राम' अर्थात् शाश्वत-सनातन परमधर्म
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाला धर्मयुद्ध नहीं करेगा तो 'स्वधर्म' अर्थात् स्वभाव
से उत्पन्न संघर्ष करने की क्षमता, क्रिया में प्रवृत्त होने की क्षमता को खोकर
पाप अर्थात् आवागमन और अपकीर्ति को प्राप्त होगा। अपकीर्ति पर प्रकाश
डालते हैं-
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।३४।।

४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
सब लोग बहुत काल तक तेरी अपकीर्ति का कथन करेंगे। आज भी
पदच्युत होनेवाले महात्माओं में विश्वामित्र, पराशर, निमि, शृङ्गी इत्यादि की
गणना होती है। बहुत से साधक अपने धर्म पर विचार करते हैं, सोचते हैं कि
लोग हमें क्या कहेंगे? ऐसा भाव भी साधना में सहायक होता है। इससे साधना
में लगे रहने की प्रेरणा मिलती है। कुछ दूरी तक यह भाव भी साथ देता है।
माननीय पुरुषों के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर होती है।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५॥
जिन महारथियों की निगाह में तू बहुत माननीय होकर अब तुच्छता को
प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे।
महारथी कौन? इस पथ पर महान् परिश्रम से आगे बढ़नेवाले साधक महारथी
हैं। इसी प्रकार इतने ही परिश्रम से अविद्या की ओर खींचनेवाले काम, क्रोध,
लोभ, मोहादि भी महारथी हैं। जो तुझे बहुत सम्मान देते थे कि साधक
प्रशंसनीय है, तुम उनकी निगाह से गिर जाओगे। इतना ही नहीं, बल्कि-
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६॥
वैरी लोग तेरे पराक्रम की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य
वचनों को कहेंगे। एक दोष आता है तो चारों ओर से निन्दा और बुराइयों की
झड़ी लग जाती है। न कहने योग्य वचन भी कहे जाते हैं। इससे बड़ा दुःख
क्या होगा? अतः-
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७॥
इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे- स्वर में विचरने की क्षमता
रहेगी। श्वास के बाहर प्रकृति में विचरने की धाराएँ निरुद्ध हो जायेंगी। परमदेव
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली दैवी सम्पद् हृदय में पूर्णतः प्रवाहित रहेगी
अथवा इस संघर्ष में जीतने पर महामहिम स्थिति को प्राप्त करोगे। इसलिये
अर्जुन! युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो।

द्वितीय अध्याय ४७
प्रायः लोग इस श्लोक के अर्थ में समझते हैं कि इस युद्ध में मरोगे तो
स्वर्ग जाओगे और जीतोगे तो पृथ्वी का भोग भोगोगे; किन्तु आपको स्मरण
होगा, अर्जुन कह चुका है- “भगवन्! पृथ्वी ही नहीं अपितु त्रैलोक्य के
साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन अर्थात् इन्द्रपद प्राप्त होने पर भी मैं उस
उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे शोक को दूर कर सके।
यदि इतना ही मिलना है, तो गोविन्द! मैं युद्ध कदापि नहीं करूँगा।” यदि इतने
पर भी श्रीकृष्ण कहते कि- अर्जुन! लड़ो। जीतोगे तो पृथ्वी पा जाओगे, हारोगे
तो स्वर्ग के नागरिक बन जाओगे, तो श्रीकृष्ण देते ही क्या हैं? अर्जुन इससे
आगे का सत्य, श्रेय (परमकल्याण) की कामनावाला शिष्य था, जिसे सद्गुरुदेव
श्रीकृष्ण ने बताया कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस संघर्ष में यदि शरीर का समय पूरा
हो जाता है और लक्ष्य तक नहीं पहुँच सके तो स्वर्ग प्राप्त करोगे अर्थात् स्वर
में ही विचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे, दैवी सम्पद् हृदय में ढल
जायेगी और इस शरीर के रहते-रहते संघर्ष में सफल हो जाते हो तो ‘महीम्’-
सबसे महान् ब्रह्म की महिमा का उपभोग करोगे, महामहिम की स्थिति प्राप्त
कर लोगे। जीतोगे तो सर्वस्व; क्योंकि महामहिमत्व को पाओगे और हारोगे तो
देवत्व- दोनों हाथों में लड्डू रहेंगे। लाभ में भी लाभ और हानि में भी लाभ ही
है। पुनः इसी पर बल देते हैं-
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।३८।।
इस प्रकार सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर
तू युद्ध के लिये तैयार हो। युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। अर्थात्
सुख में सर्वस्व और दुःख में भी देवत्व है। लाभ में महीम् की स्थिति अर्थात्
सर्वस्व और हानि में देवत्व है। जय में महामहिम स्थिति और पराजय में भी
दैवी सम्पद् पर अधिकार है। इस प्रकार अपने लाभ-हानि को भली प्रकार
स्वयं समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। लड़ने में ही दोनों वस्तुएँ हैं।
लड़ोगे तो पाप अर्थात् आवागमन को प्राप्त नहीं होओगे। अतः तू युद्ध के लिये
तैयार हो।

४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।३९।।
पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी है। कौन-सी
बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में इतना ही है कि अपनी हस्ती को देखकर,
लाभ-हानि का भली प्रकार विचार करके कि जीतेंगे तो महामहिम स्थिति और
हारेंगे तो देवत्व, जय में सर्वस्व और पराजय में भी देवत्व- दोनों तरह लाभ
है। युद्ध नहीं करेंगे तो सभी हमें बुरा कहेंगे, भय से उपराम हुआ मानेंगे,
अपकीर्ति होगी। इस प्रकार अपने अस्तित्व को सामने रखकर स्वयं विचार
कर युद्ध में अग्रसर होना ही ज्ञानयोग है।
प्रायः लोगों में भ्रान्ति है कि ज्ञानमार्ग में कर्म (युद्ध) नहीं करना पड़ता।
वे कहते हैं कि ज्ञानमार्ग में कर्म नहीं है। मैं तो 'शुद्ध हूँ', 'चैतन्य हूँ', 'अहं
ब्रह्मास्मि', 'गुण ही गुण में बरतते हैं'- ऐसा मानकर हाथ पर हाथ रखकर
बैठ जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार यह ज्ञानयोग नहीं है। ज्ञानयोग में
भी वही 'कर्म' करना है, जो निष्काम कर्मयोग में किया जाता है। दोनों में
केवल बुद्धि का, दृष्टिकोण का अन्तर है। ज्ञानमार्गी अपनी स्थिति समझकर
अपने पर निर्भर होकर कर्म करता है, जबकि निष्काम कर्मयोगी इष्ट के
आश्रित होकर कर्म करता है। करना दोनों मार्गों में है और वह कर्म भी एक ही
है, जिसे दोनों मार्गों में किया जाना है। केवल कर्म करने के दृष्टिकोण दो हैं।
अर्जुन! इसी बुद्धि को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन,
जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश करेगा। यहाँ
श्रीकृष्ण ने 'कर्म' का नाम पहली बार लिया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म
है क्या? अब कर्म न बताकर पहले कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं-
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।४०।।
इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं होता।
सीमित फलरूपी दोष नहीं है। इसलिये इस निष्काम कर्म का, इस कर्म से
सम्पादित धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मृत्युरूपी महान् भय से उद्धार कर