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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
सब लोग बहुत काल तक तेरी अपकीर्ति का कथन करेंगे। आज भी
पदच्युत होनेवाले महात्माओं में विश्वामित्र, पराशर, निमि, शृङ्गी इत्यादि की
गणना होती है। बहुत से साधक अपने धर्म पर विचार करते हैं, सोचते हैं कि
लोग हमें क्या कहेंगे? ऐसा भाव भी साधना में सहायक होता है। इससे साधना
में लगे रहने की प्रेरणा मिलती है। कुछ दूरी तक यह भाव भी साथ देता है।
माननीय पुरुषों के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर होती है।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५॥
जिन महारथियों की निगाह में तू बहुत माननीय होकर अब तुच्छता को
प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे।
महारथी कौन? इस पथ पर महान् परिश्रम से आगे बढ़नेवाले साधक महारथी
हैं। इसी प्रकार इतने ही परिश्रम से अविद्या की ओर खींचनेवाले काम, क्रोध,
लोभ, मोहादि भी महारथी हैं। जो तुझे बहुत सम्मान देते थे कि साधक
प्रशंसनीय है, तुम उनकी निगाह से गिर जाओगे। इतना ही नहीं, बल्कि-
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६॥
वैरी लोग तेरे पराक्रम की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य
वचनों को कहेंगे। एक दोष आता है तो चारों ओर से निन्दा और बुराइयों की
झड़ी लग जाती है। न कहने योग्य वचन भी कहे जाते हैं। इससे बड़ा दुःख
क्या होगा? अतः-
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७॥
इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे- स्वर में विचरने की क्षमता
रहेगी। श्वास के बाहर प्रकृति में विचरने की धाराएँ निरुद्ध हो जायेंगी। परमदेव
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली दैवी सम्पद् हृदय में पूर्णतः प्रवाहित रहेगी
अथवा इस संघर्ष में जीतने पर महामहिम स्थिति को प्राप्त करोगे। इसलिये
अर्जुन! युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो।