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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 83

४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।३९।।
पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी है। कौन-सी
बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में इतना ही है कि अपनी हस्ती को देखकर,
लाभ-हानि का भली प्रकार विचार करके कि जीतेंगे तो महामहिम स्थिति और
हारेंगे तो देवत्व, जय में सर्वस्व और पराजय में भी देवत्व- दोनों तरह लाभ
है। युद्ध नहीं करेंगे तो सभी हमें बुरा कहेंगे, भय से उपराम हुआ मानेंगे,
अपकीर्ति होगी। इस प्रकार अपने अस्तित्व को सामने रखकर स्वयं विचार
कर युद्ध में अग्रसर होना ही ज्ञानयोग है।
प्रायः लोगों में भ्रान्ति है कि ज्ञानमार्ग में कर्म (युद्ध) नहीं करना पड़ता।
वे कहते हैं कि ज्ञानमार्ग में कर्म नहीं है। मैं तो 'शुद्ध हूँ', 'चैतन्य हूँ', 'अहं
ब्रह्मास्मि', 'गुण ही गुण में बरतते हैं'- ऐसा मानकर हाथ पर हाथ रखकर
बैठ जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार यह ज्ञानयोग नहीं है। ज्ञानयोग में
भी वही 'कर्म' करना है, जो निष्काम कर्मयोग में किया जाता है। दोनों में
केवल बुद्धि का, दृष्टिकोण का अन्तर है। ज्ञानमार्गी अपनी स्थिति समझकर
अपने पर निर्भर होकर कर्म करता है, जबकि निष्काम कर्मयोगी इष्ट के
आश्रित होकर कर्म करता है। करना दोनों मार्गों में है और वह कर्म भी एक ही
है, जिसे दोनों मार्गों में किया जाना है। केवल कर्म करने के दृष्टिकोण दो हैं।
अर्जुन! इसी बुद्धि को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन,
जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश करेगा। यहाँ
श्रीकृष्ण ने 'कर्म' का नाम पहली बार लिया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म
है क्या? अब कर्म न बताकर पहले कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं-
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।४०।।
इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं होता।
सीमित फलरूपी दोष नहीं है। इसलिये इस निष्काम कर्म का, इस कर्म से
सम्पादित धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मृत्युरूपी महान् भय से उद्धार कर

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