यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय २९
इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी
श्रेयस्कर समझता हूँ। यहाँ भिक्षा का अर्थ उदर-पोषण के लिये भीख माँगना
नहीं बल्कि सत्पुरुषों की टूटी-फूटी सेवा द्वारा उनसे कल्याण की याचना ही
भिक्षा है। 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीय उप०, भृगुबल्ली २)
अन्न एकमात्र परमात्मा है, जिसे प्राप्त करके आत्मा सदा के लिये तृप्त हो
जाता है, कभी अतृप्त नहीं रहता। हम महापुरुषों की सेवा और याचना द्वारा
शनैः-शनैः ब्रह्मपीयूष प्राप्त करें; किन्तु यह परिवार न छूटे, यही अर्जुन के
भिक्षान्न की कामना है। संसार में अधिकांश लोग ऐसा ही करते हैं। वे चाहते
हैं कि पारिवारिक स्नेह-सम्बन्ध न मारना पड़े और मुक्ति भी शनैः-शनैः मिल
जाय। किन्तु चलनेवाले पथिक के लिये, जिसके संस्कार इनसे ऊपर हैं,
जिसमें संघर्ष की क्षमता है, स्वभाव में क्षत्रियत्व प्रवाहित है, उसके लिये इस
भिक्षान्न का विधान नहीं है। स्वयं न करके याचना करना भिक्षान्न है। गौतम
बुद्ध ने भी मज्झिम निकाय के धम्मदायाद सुत्त (१/१/३) में इस भिक्षान्न को
आमिष-दायाद कहकर हेय माना है, जबकि शरीरयापन से सभी भिक्षु थे।
इन गुरुजनों को मारकर मिलेगा क्या? इस लोक में रुधिर से सने अर्थ
और काम के भोग ही तो भोगने को मिलेंगे। अर्जुन कदाचित् सोचता था कि
भजन से भौतिक सुखों की मात्रा में अभिवृद्धि होगी। इतना संघर्ष झेलने के
बाद भी इस शरीर के पोषक अर्थ और काम के भोग ही तो मिलेंगे। वह पुनः
तर्क देता है-
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६॥
यह भी निश्चित नहीं है कि वह भोग मिलेगा ही। यह भी हम नहीं
जानते कि हमारे लिये क्या करना श्रेयस्कर है; क्योंकि जो कुछ हमने कहा,
वह अज्ञान प्रमाणित हो गया। यह भी ज्ञात नहीं है कि हम जीतेंगे अथवा वे ही
जीतेंगे। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे