याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 743, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणी ( नोट्स ) ६८७
यद्यपि मनु ने कहा है कि—
द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्याद् यस्तु कारयेत् ।
तान्सर्वान् घातयेद्राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गिनः ॥
तथापि यह नियम राजपुरुषानधिष्ठित द्यूत आदि के विषय में है। अत
एव बृहस्पति का कथन है :—
द्यूतं निषिद्धम्मनुना सत्यशौचधनापहम् ।
तत्प्रवर्तितमन्यैश्च राजभागसमन्वितम् ॥
श्लो० २११—वाक्पारुष्यप्रकरणोक्त दण्ड में ह्रास का कारण उशना
ने बतलाया है :—
मोहात् प्रमादात् संहर्षात् प्रीत्या चोक्तं मयेति यः ।
नाहमेवं पुनर्वक्ष्ये दण्डार्धं तस्य कल्पयेत् ॥
श्लो० २१२—यह दण्ड-पारुष्य का प्रकरण है। दण्ड-पारुष्य का लक्षण
बृहस्पति ने बतलाया है :—
दण्ड-पाषाण-लगुडैर्भस्म-कर्दम-पांसुभिः ।
आयुधैश्च प्रहरणं दण्ड-पारुष्यमुच्यते ॥
श्लो० १२२—समुत्थानजं व्ययम्—तात्पर्य यह है कि उस व्यक्ति का
व्रण आदि निवृत्त जब तक होता है तब तक का सारा खर्च व्रणकर्त्ता को देना
होता है । अत एव कात्यायन का कथन है :—
समुत्थानव्ययं चासौ दद्यादाव्रणरोपणात् ॥
इस नियम के अपवाद नारद के द्वारा निर्दिष्ट हुए हैं :—
अनुशास्यो गुरुणां तु न चेदनुविधीयते ।
अवधेनाथ वा हन्याद् रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥
भृशं न ताडयेदेनं नोत्तमाङ्गे न चोरसि ।
अनुशास्य च विश्वास्यः शास्यो राज्ञाऽन्यथा गुरुः ॥
पुत्राऽपराधे न पिता शववान्न शुनि दण्डभाक् ।
न मर्कटे च तत्स्वामी तेनैव प्रहतो नु चेत् ॥
अवधेन = अहिंसया !
श्लो० २२८—चैत्यः = मनोहर स्थान—( अपरार्कः ) चैत्यः उद्देशवृक्षः—
( शूलपाणिः )
श्लो० २२९—यहाँ विष्णु का वचन अवधान देने योग्य है :—फलोपभोग-
द्रुमच्छेदी तूत्तमसाहसं दण्ड्यः । पुष्पोपभोगच्छेदी मध्यमम् । वल्लीगुल्मलता-
च्छेदी कार्षापण-शतम् । तृणच्छेद्येकम् ॥