याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 782 में से
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श्लो० २३९–साक्षिणाम्—जो व्यक्ति विरोध का समाधान करने में
समर्थ होकर भी ईर्ष्या-द्वेषादि के कारण समाधान नहीं करता है अपि तु
पिता-पुत्र के विवाद में साक्षित्व को स्वीकार करता है, उस वर्ग के लोगों
के लिए ‘त्रिपणो दमः’ कहा गया है । यह नियम भी मध्यम अपराध के लिए
है । यदि अपराध अधिक हो तो निम्न-लिखित विष्णु के वचन के अनुसार
दण्ड करना चाहिए :—
पितृ-पुत्र-विरोधसाक्षिणां दशपणो दण्डः ।
यस्तयोरन्तरे तस्योत्तमसाहसो दण्डः ॥
श्लो० २४१—नाणकपरीक्षी = टङ्कक-परीक्षक । यहाँ निम्न-निर्दिष्ट
बृहस्पति-वचन को देखना चाहिए :—
अल्पमूल्यं तु संस्कृत्य नयन्ति बहुमूल्यताम् ।
स्त्रीबालकान् वञ्चयन्ति दण्ड्यास्तेऽर्थानुरूपतः ॥
हेम-मुक्ता-प्रवालाद्यं कृत्रिमं कुर्वते तु ये ।
क्रेत्रे मूल्यं प्रदाप्यास्ते राज्ञा तद्द्विगुणं दमम् ॥
श्लो० २४२–तिर्यक्षु = गो आदि पशुओं के विषय में ।
श्लो० २४९–कारुः = तन्तुवाय । सम्भूय = राजा की अनुमति के
विना ही अपने वर्ग में मिलकर ।
श्लो० २५२–सद्यः—इससे यह स्पष्ट है कि विलम्ब होने पर यह
नियम नहीं है । इसी का प्रपञ्च अग्रिम श्लोक में किया गया है, जिससे
अव्यवस्था नहीं हो जाय ।
श्लो० २५४—विष्णु के अनुसार विक्रीयासम्प्रदान में दण्ड भी
निर्दिष्ट है :—
गृहीतमूल्यं यः पण्यं क्रेतुनैव दद्यात् तस्यासौ
सोदयं दाप्यः राज्ञा च पणशतं दण्ड्यः ॥
श्लो० २५५–अत एव नारद का भी कथन है :—
दीयमानं न गृह्णाति क्रीतं पण्यं च यः क्रयी ।
स एवास्य भवेद्दोषो विक्रेतुर्योऽप्रयच्छतः ॥
श्लो० २५९–यहाँ समवाय मे प्रतिषिद्ध तथा विहित व्यक्तियों का
निर्देश बृहस्पति ने किया है :—
अशक्तालसरोगातंमन्दभाग्य-निराश्रयैः ।
वाणिज्याद्याः सहैतैस्तुः न कर्त्तव्या बुधैः क्रियाः ॥