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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 782 में से

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पृष्ठ 742

६८६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० १८५- इस प्रसंग में बृहस्पति के निम्नलिखित वचन अवधान
योग्य हैं :-
राजा वेदविदो विप्रान् श्रोत्रियानग्निहोत्रिणः ।
आकृष्य स्थापयेत्तत्र तेषां वृत्तिं प्रकल्पयेत् ।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं शान्तिकं पौष्टिकन्तथा ।
पौराणां कर्म कुर्युस्ते सन्दिग्धौ निर्णयस्तथा ॥
श्लो० १९३- कर्म त्यजन् = समर्थ होकर भी कर्म नहीं करने वाला
भृत्य ।
श्लो० १९४- दशमं भागम् - यह नियम अल्पश्रमकारी भृत्यों के
विषय में है। यदि श्रमाधिक्य हो तो निम्नलिखित बृहस्पति-वचनों के आधार
पर विधान करना चाहिए:-
त्रिभागं पञ्चभागं वा गृह्णीयात्सीरवाहकः ।
भक्ताच्छादभृतः सीराद्भागं गृहीत पञ्चमम् ।
जातसस्यात् त्रिभागन्तु प्रगृह्णीयादथाऽभृतः ॥
भक्त = भोजन, आच्छाद = वस्त्र, आवास आदि, अभृतः = भोजनादि-
रहित भृत्य ।
श्लो० १९७-भाण्डम् = वणिग्धनम् कुङ्कुमादिकम् ।
श्लो० २००- जेत्रे दद्यात् - यहाँ निम्न-निर्दिष्ट बृहस्पति-वचन अवधान-
योग्य है :-
रहो-जितोऽनभिज्ञश्च कूटाक्षैः कपटेन वा ।
मोच्योऽभिज्ञोऽपि सर्वस्वं जितः सर्वं न दाप्यते ॥
श्लो० २०२-सचिह्नं निर्वास्याः- नारद के अनुसार चिह्न का अर्थ है:-
कूटाक्षवेदिनः पापान् राजा राष्ट्राद्दिवासयेत् ।
कण्ठेऽक्षमालामासज्य स ह्येषां विनयः स्मृतः ॥
यहाँ द्वितीय पाद में शूलपाणि के अनुसार "निर्हरेद् द्यूतमण्डलात्" पाठ
है, न कि 'राष्ट्राद्दिवासयेत्' (यह पाठ मिताक्षरा में है)। विनयः = दण्ड ।
विष्णु के अनुसार चिह्न का अर्थ निम्नलिखित है :-
द्यूते च कपटाक्षदेविनां करच्छेदः, उपधिदेविनां संदंशच्छेदः ।
उपधिः = हस्तचातुरी से यथेच्छ रूप में अक्ष का देवन-प्रकार । संदंश =
अङ्गुष्ठ ।