सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 741, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 741

टिप्पणी ( नोट्स ) ६८५
श्लो० १७१—यहाँ मनु ने विशेषता बतलाई है :—
सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् ।
आगमः कारणं तत्र न संभोग इति स्थितिः ॥
श्लो० १७३—अर्वाक् संवत्सरात्—मनु के द्वारा “राजा ड्यब्दं निधा-
पयेत् ।” जो कहा गया है वह सुवर्णादि स्थिर वस्तुओं के विषय में है, ऐसा
शूलपाणि का मत है ।
श्लो० १७५—नान्वये सति सर्वस्वम्—एतच्च प्राग्दायविभागात् ,
विभक्तदायेषु तु पुत्रेषु सर्वस्वदानमनिषिद्धम्—( अपरार्कः )
श्लो० १७६—दत्त्वा नापहरेत्—अपहरण करने पर दोष का निर्देश
हारीत ने किया है :—
प्रतिश्रुताऽप्रदानेन दत्तसंश्लेहनेन च ।
विविधान्नरकान्याति तिर्यग्योनौ च जायते ॥
श्लो० १७७—परीक्षण के पहले दोष निकलने पर कृत्य का निर्देश
बृहस्पति ने किया है :—
अतोऽर्वाक् पण्यदोषस्तु यदि संजायते क्वचित् ।
विक्रेतुः प्रतिदेयं तत् क्रेता मूल्यमवाप्नुयात् ॥
मूल्य का तात्पर्य है कि विना सूद का ही मूलधनमात्र प्रत्यर्पणीय
होता है ।
श्लो० १८३—आमरणान्तिकम्—अत एव नारद का कथन है :—
राज्ञ एव तु दासः स्यात् प्रव्रज्याऽवसितो नरः ।
न तस्य प्रतिमोक्षोऽस्ति न विशुद्धिः कथञ्चन ॥
द्वावेव कर्मचाण्डालौ लोके दूरबहिष्कृतौ ।
प्रव्रज्योपनिवृत्तश्च वृथा प्रव्रजितश्च यः ॥
‘वृथा प्रव्रजितः’ का अर्थ है प्रव्रज्या का अनधिकारी शूद्र यदि प्रव्रज्या का
ग्रहण करे तो उससे भी आमरण दास्य करवाना चाहिए । परन्तु ब्राह्मण के
प्रव्रज्याच्युत होने पर भी दास्य विहित नहीं है । ब्राह्मण के दण्ड का निरूपण
दक्ष ने किया है :—
पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।
श्वपादेनाङ्कितं तन्तु राजा शीघ्रं विवासयेत् ॥
कात्यायन-कथित प्रकार भी निम्नलिखित है :—
प्रव्रज्याऽवसिता यत्र त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
निर्वासं कारयेद्विप्रं दासत्वं क्षत्रविण्नृपः ॥