विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मज्ञान ही मुक्तिका उपाय है ५५
वह परात्मा स्वरूपसे तो सदा एकरूप ही है तथापि उपाधिके
सम्बन्धसे उसके गुणोंसे युक्त-सा होकर उसीके धर्मोंके साथ प्रकाशित
होने लगता है, जिस प्रकार लोहेके विकारोंमें व्याप्त हुआ अविकारी अग्नि
उन्हींके समान प्रकाशित होता है।
मुक्ति कैसे होगी ?
शिष्य उवाच
भ्रमेणाप्यन्यथा वास्तु जीवभावः परात्मनः।
तदुपाधेरनादित्वान्नानादेर्नाश इष्यते ॥ १९४॥
शिष्य—हे गुरुदेव ! भ्रमसे हो अथवा किसी अन्य कारणसे,
परात्माको ही जीव-भावकी प्राप्ति हुई है; और उसकी उपाधि अनादि
है तथा अनादि वस्तुका नाश हो नहीं सकता।
अतोऽस्य जीवभावोऽपि नित्यो भवति संसृतिः ।
न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥ १९५ ॥
इसलिये इस आत्माका जीवभाव भी नित्य है और ऐसा होनेसे इसका
जन्म-मरणरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं हो सकता; तो फिर,
हे श्रीगुरुदेव ! इसका मोक्ष कैसे होगा, सो कहिये ?
आत्मज्ञान ही मुक्तिका उपाय है
श्रीगुरुरुवाच
सम्यक्पृष्टं त्वया विद्वन्सावधानेन तच्छृणु।
प्रामाणिकी न भवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥ १९६ ॥
गुरु—हे वत्स ! तू बड़ा बुद्धिमान् है, तूने बहुत ठीक बात पूछी है।
अच्छा, अब सावधान होकर सुन। देख, मुग्ध पुरुषोंकी भ्रमवश की हुई
कल्पना माननीय नहीं हुआ करती।
भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः।
न घटेतार्थसम्बन्धो नभसो नीलतादिवत् ॥ १९७ ॥