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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 153 में से

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५४ विवेक-चूड़ामणि
यह अहंस्वभाववाला विज्ञानमय कोश ही अनादिकालीन जीव और
संसारके समस्त व्यवहारोंका निर्वाह करनेवाला है। यह अपनी पूर्व-
वासनासे पुण्य-पापमय अनेकों कर्म करता और उनके फल भोगता है
तथा विचित्र योनियोंमें भ्रमण करता हुआ कभी नीचे आता और कभी
ऊपर जाता है। जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाएँ, सुख-दुःख आदि भोग,
देहादिसे सम्बन्धित आश्रमादिके धर्म-कर्म, गुणोंका अभिमान और ममता
आदि सर्वदा इस विज्ञानमय कोशमें ही रहते हैं। यह आत्माकी अति निकटताके
कारण अत्यन्त प्रकाशमय है; अतः यह इसकी उपाधि है, जिसमें भ्रमसे
आत्मबुद्धि करके यह जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें पड़ता है।
आत्माकी उपाधिसे असंगता
योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृदि स्फुरत्स्वयंज्योतिः ।
कूटस्थः सन्नात्मा कर्ता भोक्ता भवत्युपाधिस्थः ॥ १९१ ॥
यह जो स्वयंप्रकाश विज्ञानस्वरूप हृदयके भीतर प्राणादिमें स्फुरित
हो रहा है, वह कूटस्थ (निर्विकार) आत्मा होनेपर भी उपाधिवश कर्ता
भोक्ता हो जाता है।
स्वयं परिच्छेदमुपेत्य बुद्धे-
स्तादात्म्यदोषेण परं मृषात्मनः ।
सर्वात्मकः सन्नपि वीक्षते स्वयं
स्वतः पृथक्त्वेन मृदो घटानिव ॥ १९२ ॥
वह परात्मा मिथ्या बुद्धिसे परिच्छिन्न होकर उससे एकीभूत हो जानेके
दोषसे स्वयं सर्वात्मक होते हुए भी मिट्टीसे घड़ेके समान अपनेको
अपनेहीसे पृथक् देखता है।
उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा
ह्युपाधिधर्माननु भाति तद्गुणः ।
अयोविकारानविकारिवह्निवत्
सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥ १९३ ॥