विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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जो असंग, निष्क्रिय और निराकार है, उस आत्माका पदार्थोंसे,
नीलता आदिसे आकाशके समान भ्रमके अतिरिक्त और किसी प्रकार
सम्बन्ध नहीं हो सकता।
स्वस्य द्रष्टुर्निर्गुणस्याक्रियस्य
प्रत्यग्बोधानन्दरूपस्य बुद्धेः।
भ्रान्त्या प्राप्तो जीवभावो न सत्यो
मोहापाये नास्त्यवस्तुस्वभावात् ॥ १९८ ॥
साक्षी, निर्गुण, अक्रिय और प्रत्यग्ज्ञानानन्दस्वरूप उस आत्मामें बुद्धिके
भ्रमसे ही जीव-भावकी प्राप्ति हुई है, वह वास्तविक नहीं है; क्योंकि वह
अवस्तुरूप होनेसे, मोह दूर हो जानेपर स्वभावसे ही नहीं रहता।
यावद् भ्रान्तिस्तावदेवास्य सत्ता
मिथ्याज्ञानोज्जृम्भितस्य प्रमादात्।
रज्ज्वां सर्पो भ्रान्तिकालीन एव
भ्रान्तेर्नाशे नैव सर्पोऽपि तद्वत् ॥ १९९ ॥
जैसे भ्रमकी स्थितिपर्यन्त ही रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है, भ्रमके
नाश होनेपर फिर सर्प प्रतीत नहीं होता, वैसे ही जबतक भ्रम है, तभीतक
प्रमादवश मिथ्या ज्ञानसे प्रकट हुए इस (जीव-भाव)-की सत्ता है।
अनादित्वमविद्यायाः कार्यस्यापि तथेष्यते।
उत्पन्नायां तु विद्यायामाविद्यकमनाद्यपि ॥ २०० ॥
प्रबोधे स्वप्नवत्सर्वं सहमूलं विनश्यति।
लोकमें अविद्या और उसके कार्य जीव-भावका अनादित्व माना
जाता है। किन्तु जग पड़नेपर जैसे सम्पूर्ण स्वप्न-प्रपंच अपने मूलसहित
नष्ट हो जाता है उसी प्रकार ज्ञानोदय होनेपर अविद्या-जनित जीव-भावका
नाश हो जाता है।
अनाद्यपीदं नो नित्यं प्रागभाव इव स्फुटम् ॥ २०१ ॥
अनादेरपि विध्वंसः प्रागभावस्य वीक्षितः।