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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 153 में से

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पृष्ठ 128

बोधोपलब्धि १३१
आरोपितं नाश्रयदूषकं भवेत्
कदापि मूढैर्मतिदोषदूषितैः ।
नार्द्रीकरोत्यूषरभूमिभागं
मरीचिकावारिमहाप्रवाहः ॥ ४९९ ॥
बुद्धि-दोषसे दूषित अज्ञानियोंद्वारा आरोपित की हुई वस्तु अपने
आश्रयको दूषित नहीं कर सकती; जैसे मृगतृष्णाका महान् जल-प्रवाह
अपने आश्रय ऊषर भूमि-खण्डको [ तनिक भी ] गीला नहीं करता।
आकाशवल्लेपविदूरगोऽह-
मादित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम् ।
अहार्यवन्नित्यविनिश्चलोऽह-
मम्भोधिवत्पारविवर्जितोऽहम् ॥ ५०० ॥
मैं आकाशके समान निर्लेप हूँ, सूर्यके समान अप्रकाश्य हूँ, पर्वतके
समान नित्य निश्चल हूँ और समुद्रके समान अपार हूँ।
न मे देहेन सम्बन्धो मेघेनेव विहायसः।
अतः कुतो मे तद्धर्मा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः॥ ५०१ ॥
जैसे मेघसे आकाशका कोई सम्बन्ध नहीं है वैसे ही मेरा भी शरीरसे
कोई सम्बन्ध नहीं है; तो फिर इस शरीरके धर्म जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
आदि मुझमें कैसे हो सकते हैं?
उपाधिरायाति स एव गच्छति
स एव कर्माणि करोति भुङ्क्ते ।
स एव जीर्यन्म्रियते सदाहं
कुलाद्रिवन्निश्चल एव संस्थितः ॥ ५०२ ॥
उपाधि ही आती है, वही जाती है तथा वही कर्मोंको करती और
उनके फल भोगती है तथा वृद्धावस्थाके प्राप्त होनेपर वही मरती है। मैं
तो कुल पर्वतके समान नित्य निश्चल-भावसे ही रहता हूँ।
133 विवेक-चूडामणि-5 C