विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० विवेक-चूडामणि
नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं
पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः ।
अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी
निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ ४९५ ॥
मैं [ क्षीरसमुद्रशायी ] नारायण हूँ, नरकासुरका विघातक हूँ, त्रिपुर-
दैत्यका नाश करनेवाला हूँ, परम पुरुष हूँ और ईश्वर हूँ। मैं अखण्डबोधस्वरूप
हूँ, सबका साक्षी हूँ, स्वतन्त्र हूँ तथा अहंता और ममतासे रहित हूँ।
सर्वेषु भूतेष्वहमेव संस्थितो
ज्ञानात्मनान्तर्बहिराश्रयः सन्।
भोक्ता च भोग्यं स्वयमेव सर्वं
यद्यत्पृथग्दृष्टमिदन्तया पुरा ॥ ४९६ ॥
ज्ञानस्वरूपसे सबका आश्रय होकर समस्त प्राणियोंके बाहर और
भीतर मैं ही स्थित हूँ तथा पहले जो-जो पदार्थ इदंवृत्तिद्वारा भिन्न-भिन्न
देखे गये थे वह भोक्ता और भोग्य सब कुछ स्वयं मैं ही हूँ।
मय्यखण्डसुखाम्भोधौ बहुधा विश्ववीचयः ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ ४९७ ॥
मुझ अखण्ड आनन्द-समुद्रमें विश्वरूपी नाना तरंगें मायारूपी वायुके
वेगसे उठती और लीन होती रहती हैं।
स्थूलादिभावा मयि कल्पिता भ्रमा-
दारोपिता नु स्फुरणेन लोकैः।
काले यथा कल्पकवत्सराय-
नर्त्वादयो निष्कलनिर्विकल्पे ॥ ४९८ ॥
जैसे निष्कल (हानि-वृद्धि-शून्य) और निर्विकल्प कालमें स्वरूपसे
कोई कल्प, वर्ष, अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन) और ऋतु आदिका
विभाग नहीं है, उसी प्रकार लोगोंने भ्रमवश केवल स्फुरणमात्रसे ही
आरोपित करके मुझमें स्थूल-सूक्ष्म आदि भावोंकी कल्पना कर ली है।
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