विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ विवेक-चूड़ामणि
न मे प्रवृत्तिर्न च मे निवृत्तिः
सदैकरूपस्य निरंशकस्य।
एकात्मको यो निबिडो निरन्तरो
व्योमेव पूर्णः स कथं नु चेष्टते ॥५०३॥
मुझ सदा एकरस और निरवयवकी न किसी विषयमें प्रवृत्ति है और
न किसीसे निवृत्ति। भला, जो निरन्तर एकरूप घनीभूत और आकाशके
समान पूर्ण है वह किस प्रकार चेष्टा कर सकता है।
पुण्यानि पापानि निरिन्द्रियस्य
निश्चेतसो निर्विकृतेर्निराकृतेः।
कुतो ममाखण्डसुखानुभूते-
र्ब्रूते ह्यनन्वागतमित्यपि श्रुतिः ॥५०४॥
इन्द्रिय, चित्त, विकार और आकृतिसे रहित मुझ अखण्ड आनन्दस्वरूपको
पाप या पुण्य कैसे हो सकते हैं? और 'अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं
पापेन'* (बृह० ४। ३। २२) यह श्रुति भी ऐसा ही बतलाती है।
छायया स्पृष्टमुष्णं वा शीतं वा सुष्ठु दुष्ठु वा।
न स्पृशत्येव यत्किञ्चित्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥५०५॥
न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम्।
अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥५०६॥
जैसे उष्ण-शीत, अच्छी-बुरी-कैसी ही वस्तु छायासे छू जानेपर
भी उससे सर्वथा पृथक् पुरुषका तनिक भी स्पर्श नहीं कर सकती तथा
घरको प्रकाशित करनेवाले दीपकपर जैसे घरके [सुन्दरता, मलिनता
आदि] किसी धर्मका कोई प्रभाव नहीं होता वैसे ही शरीर आदि दृश्य
पदार्थोंके धर्म उनसे विलक्षण उनके साक्षी आत्माको जो विकाररहित एवं
उदासीन है, तनिक भी नहीं छू सकते।
- यह आत्मा पुण्य (शास्त्रविहित कर्म) और पाप (शास्त्रनिषिद्ध कर्म)-से असम्बद्ध है।
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