सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 247

२३६ विनय-पत्रिका
प्रेरथो जो परम प्रचण्ड मारुत, कष्ट नाना तैं सह्यो ।
सो ग्यान, ध्यान, विराग अनुभव जातना पावक दह्यो ॥
अति खेद ब्याकुल, अल्प बल, छिन एक बोलि न आवई ।
तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥
६
बाल-दसा जेते दुख पाये । अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥
छुधा-व्याधि-बाधा भइ भारी । वेदन नहिं जानै महतारी ॥
जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करै ।
सोइ करै विविध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥
कौमार, सैसव अरु किशोर अपार अघ को कहि सकै ।
व्यतिरेक तोहि निर्दय ! महाखल ! आन कहु को सहि सकै॥
७
जोबन जुवती सँग रँग रात्यो । तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥
ताते तजी धरम-मरजादा । बिसरे तब सब प्रथम विषादा ॥
बिसरे विषाद, निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो ।
फिरि गर्भगत-आवर्त्त संसृति चक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥
कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो ।
परदार, परधन, द्रोह पर, संसार बाढ़ै नित नयो ॥
८
देखत ही आई विरुधाई । जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥
ताके गुन कछु कहे न जाहीं । सो अब प्रगट देखु तन माहीं ॥
सो प्रगट तनु जरजर जरावस, व्याधि, सूल सतावई ।
सिर-कंप, इंद्रिय-सक्ति प्रतिहत, वचन काहु न भावई ॥
गृहपालहूतें अति निरादर, खान-पान न पावई ।
ऐसिहु दसा न विराग तहँ, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥
९
कहि को सकै महाभव तेरे । जनम एक के कछुक गनेरे ॥
चारि खानि संतत अवगाहीं । अजहुँ न करु विचार मन माहीं ॥