विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २३७
अजहूँ विंचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं ।
भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुर-नायकं ॥
बिनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं।
कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥
१०
रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी
बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलैं द्रवै जब सोई ॥
जब द्रवैं दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये।
जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥
जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये।
मद-मोह-लोभ-विषाद-क्रोध सुबोध तें सहजहिं गये ॥
११
सेवत साधु द्वैत-भय भागै । श्री रघुवीर-चरन लौ लागै ॥
देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥
अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये।
संतोष, सम, सीतल सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥
निरमल, निरामय, एक रस, तेहि हरष-सोक न व्यापई।
त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥
१२
जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई ॥
जो मारग श्रुति-साधु दिखावैं। तेहि पथ चलत सबै सुख पावैं ॥
पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहै।
सपनेहुँ नहीं दुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥
द्विज, देव, गुरु, हरि संत बिनु संसार-पार न पाइये।
यह जानि तुलसीदास त्रास हरन रमापति गाइये ॥
शब्दार्थ—विलगान्यो = अलग हुआ। जरा = बुढ़ापा। मज्जसि = स्नान कर रहा है।
संसृति = संसार। हेठ = नीचे। शोनित = रक्त। पुरीष = मल, विष्ठा। कर्दमावृत = कीचसे
ढँका हुआ। निकाय = समूह। सिसु = बालक। व्यतिरेक = अतिरिक्त, सिवा। रात्यो = फँस