विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपायो जो दारुन दुसह दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो।
भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो॥
बहु जोनि जनम, जरा-बिपत्ति, मतिमन्द ! हरि जान्यो नहीं।
श्री राम बिनु विश्राम मूढ़ ! विचारु, लखि पायो कहीं ॥
२
आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥
मृग-भ्रम वारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥
तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ।
निज सहज अनुभव रूप तव खल ! भूलि अब आयो तहाँ ॥
निरमल निरञ्जन, निर्विकार, उदार सुख तैं परिहरयो।
निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ॥
३
तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गँहि दीन्हीं ॥
ताते परबस परयो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥
आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यो सोऊ।
सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥
सोनित-पुरीष, जो मूत्र-मल कृमि-कर्द्दमावृत सोवई।
कोमल सरीर, गंभीर वेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥
४
तू निज करम-जाल जहँ घेरो। श्री हरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥
बहु बिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों॥
तोहि दियो ज्ञान-विवेक, जनम अनेक की तव सुधि भई।
तेहि ईस की हौं सरन, जाकी विषम माया गुनमई ॥
जेहि किये जीव-निकाय बस रस-हीन, दिन-दिन अति नई।
सो करौ बेगि सँभार श्रीपति, विपति महँ जेहि मति दई ॥
५
धुनि बहु विधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥
ऐसेहि करि विचारि चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥